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सावधान  : देर रात तक फोन या कंप्यूटर पर समय बिताना पड़ सकता है महंगा

सावधान : देर रात तक फोन या कंप्यूटर पर समय बिताना पड़ सकता है महंगा

नई दिल्ली (एजेंसी)। गैजेट्स का लगातार बढ़ता चलन, घर और ऑफिस की चार दीवारी में सीमित जीवन, शारीरिक सक्रियता की कमी और जंक फूड्स का बढ़ता चलन हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ही नहीं बल्कि हमारी आंखों की सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पूरे विश्व में मायोपिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, आज विश्वभर में एक अरब चालीस करोड़ लोगों को निकट दृष्टि दोष है, 2050 तक यह आंकड़ा बढ़कर पांच अरब हो जाएगा। इनमें से लगभग दस प्रतिशत लोगों का मायोपिया इतना गंभीर होगा कि उनके लिए दृष्टिहीनता का खतरा अत्यधिक बढ़ जाएगा।

ताजा रिसर्च में सावधान किया गया है कि कंप्यूटर और फोन स्क्रीन को लंबे समय तक घूरने से निकट दृष्टि दोष बच्चों में 80 फीसद तक बढ़ सकता है. शोधकर्ताओं ने 3,000 से ज्यादा शोध पत्र के नतीजों को रिसर्च का हिस्सा बनाया. उन्होंने स्क्रीन और आंख की सेहत पर दूसरी गतिविधियों के तमाम पहलुओं को देखा. नतीजे से पता चला कि सिर्फ स्मार्टफोन्स मायोपिया का जोखिम 30 फीसद तक बढ़ा सकता है. लेकिन कंप्यूटर का ज्यादा इस्तेमाल के साथ साथ जोखिम 80 फीसद तक बढ़ जाता है.

क्या होता है मायोपिया

निकट दृष्टि दोष को चिकित्सीय भाषा में मायोपिया कहते हैं, इसमें दूर की चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में परेशानी आती है। मायोपिया में आंख की पुतली (आई बॉल) का आकार बढ़ने से प्रतिबिंब रेटिना पर बनने के बजाय थोड़ा आगे बनता है। ऐसा होने से दूर की वस्तुएं धुंधली और अस्पष्ट दिखाई देती हैं, लेकिन पास की वस्तुएं देखने में कोई परेशानी नहीं होती है। एक अनुमान के अनुसार भारत की 20-30 प्रतिशत जनसंख्या मायोपिया से पीड़ित है।

मायोपिया तब होता है, जब आंख की पुतली बहुत लंबी हो जाती है या कार्निया (आंखों की सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत) की वक्रता बहुत बढ़ जाती है। इससे जो रोशनी आंखों में प्रवेश करती है वो ठीक प्रकार से फोकस नहीं होती है, जिससे प्रतिबिंब रेटिना के थोड़ा आगे फोकस होते हैं। इससे नज़र धुंधली हो जाती है। जब मायोपिया की समस्या बहुत बढ़ जाती है तो मोतियाबिंद और ग्लुकोमा होने का खतरा बढ़ जाता है।

स्क्रीन टाइम, ज्यादा जोखिम और गंभीर मायोपिया के बीच स्पष्ट संबंध

The Lancet Digital Health में प्रकाशित रिसर्च को सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, चीन और ब्रिटेन के नेत्र विशेषज्ञों ने अंजाम दिया. उन्होंने स्मार्ट डिवास का संपर्क और तीन महीने के बच्चे से लेकर 33 वर्षीय युवाओं के बीच परीक्षण किया.नतीजे से पता चला कि स्क्रीन टाइम, ज्यादा जोखिम और गंभीर मायोपिया के बीच स्पष्ट संबंध था. उन्होंने बताया कि इसका मतलब हो सकता है 2050 तक आधी दुनिया की नजर कमजोर हो सकती है या दृष्टि की हानि से पीड़ित हो सकती है.

देर तक कंप्यूटर और मोबाइल घूरने का खराब नतीजा आया सामने

2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सिफारिश की थी कि दो साल से नीचे के बच्चों का स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए. उसने ये भी बताया था कि दो से पांच वर्षीय बच्चों को एक दिन में एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए. लेकिन उसी साल CensusWide के सर्वे में पाया गया कि 2,000 ब्रिटिश परिवार के बच्चे औसतन 23 घंटे एक सप्ताह में स्क्रीन पर घूरते हुए बिता रहे थे. पूर्व के कई रिसर्च से पता चला है कि कोरोना काल के दौरान संख्या बेतहाशा बढ़ी है क्योंकि लोग काम और स्कूल के लिए घर में रहे.

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