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स्थानीय कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का सवाल

स्थानीय कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का सवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्रीज केवल सिंगल स्क्रीन थिएटर के भरोसे ही चल रही है। मल्टीप्लेक्स में छत्तीसगढ़ी फिल्में न के बराबर ही लगती है। छत्तीसगढ़ी फिल्म न केवल छत्तीसगढ़ में ही देखी जाती है बल्कि प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में भी लगती है। इसके अलावा कुछ बड़े मेलों में घूमते- फिरते सिनेमाघरों के जरिए फिल्में दिखाई जाती हैं। बताया जाता है कि इनसे भी फिल्मों को कुछ कमाई हो जाती है। मोटे तौर पर एक फिल्म जब बनती है तो करीब लगभग 250 से 300 लोगों क ो रोजगार मिल जाते हैं। हालांकि यह कलाकार असंगठित रूप से इस उद्योग में रोजी रोटी कमाते हैं। छत्तीसगढ़ में सिनेमाघरों की कमी के चलते भी यहां फिल्म उद्योग रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है। ऐसे में लंबे समय तक इस इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के सामने नियमित रूप से अपनी जीविका चलाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।  बीते 18 सालों में फिल्म विकास निगम, नया रायपुर में फिल्म सिटी बनाने को लेकर शासन की ओर से कई घोषणाएं हुई। लेकिन जमीनी स्तर पर कोई भी पहल अब तक नहीं हो पाई है। प्रदेश में करीब 35 स्क्रीन है। इसके मद्देनजर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने का भी ऐलान हुआ, जिसके तहत तमाम कस्बों और छोटे शहरों में सिनेमाघर बनाए जाने थे। लेकिन ये काम भी अब तक शुरू नहीं हो पाया है। इस साल करीब 20 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण चल रहा है। यही नहीं 400 म्यूजिक एलबम भी रिलीज हो रहे हैं। ऐसे देखना यह दिलचस्प होगा कि नए सरकार के गठन के बाद छत्तीसगढ़ी सिनेमा उद्योग में क्या बदलाव आता है!

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