Spiritual

गुरु व परमात्मा का दायित्व

गुरु व परमात्मा का दायित्व

परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम्हें जो होना है, हो जाओ। वह तुम्हारे जीवन की किताब को कोरी छोड़ देता है, तुम्हें जो लिखना हो लिख लो। तुम्हें पाप करना है पाप करो, पुण्य करना हो पुण्य करो। तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो व स्वभावत: नीचे उतरना आसान है, ऊपर चढना कठिन है। सो लोग नीचे उतरते हैं। लोग पाप मे उतरते हैं। पाप में प्रबल आकर्षण मालूम होता है, क्योंकि वह सरल मालूम होता है। परमात्मा ने स्वतंत्रता दी है व परिणाम यह है कि लोग गुलाम हो गये हैं-वासनाओं के, संसार के।

गुरु का काम ठीक उलटा है। गुरु अनुशासन देता है। गुरु जीवन को जीने का ढंग, शैली देता है। गुरु शास्ता है, शासन देता है। जीवन को रंग रुप देता है। तुम्हारे अनगढ़ पत्थर को ढालता है, इसलिये ऊपर से तो लगता है कि जो लोग गुरु के पास गये, वे गुलाम हो गये। ऊपर से ये बात ठीक भी मालूम पडती है, क्योंकि अब जो गुरु कहेगा, वैसा वे जियेंगे। गुरु का इशारा अब उनका जीवन होगा। गुरु के सहारे चलेंगे। गुरु की नाव में यात्रा होंगी। गुरु की शर्तें स्वीकार करनी होंगी। गुरु के प्रति समर्पण करना होगा, तो बडा विरोधाभास है। परमात्मा स्वतंत्रता देता है व परिणाम है कि सभी लोग परतंत्र हो गये हैं व गुरु अनुशासन देता है व परिणाम में स्वतंत्रता उपलब्ध होती है। क्योंकि जैसै-जैसै व्यक्ति अनुशासित होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति के जीवन में एक व्यवस्था, एक तंत्र पैदा होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति जीवन में होश संभालता है। जैसै-जैसै व्यक्ति जागरुक जीवन होने लगता है, वैसै-वैसै स्वतंत्रता का नया आयाम खुलता है, स्वच्छंदता पैदा होती है। 'स्वच्छंदता' शब्द का अर्थ उच्छ्रंखलता मत लेना। 
स्वच्छंदता का ठीक वही अर्थ होता है, जो स्वतंत्रता का है। स्वतंत्रता से भी बहूमूल्य शब्द है स्वच्छंदता। 'स्वच्छंद' का अर्थ होता है, जिसके भीतर का छंद जग गया, जिसके भीतर का गीत जग गया यानी जो अपना गीत गाने योग्य हो गया। जो गीत गाने के लिये परमात्मा ने तुम्हें भेजा था व तुम भटक गये थे। जो बनने के लिये तुम्हें परमात्मा ने भेजा था, लेकिन तुम विपरीत चले गये थे, क्योंकि वह हजार आकर्षण थे व तुम्हें कुछ होश न था।