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मुलायम का पुराना दांव मैं नहीं तो मायावती भी नहीं

मुलायम का पुराना दांव मैं नहीं तो मायावती भी नहीं

सैयद कासिम  
लोकसभा के सत्रावसान में भाषण देते हुए समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री बने इस बात की कामना की साथ साथ सभी वर्तमान सांसदों को चुनाव जीत कर आने क८ी भी शुभकामना दी। मुलायम सिंह यादव के इस बयान को लोग उनके बड़प्पन के रूप में ले रहे हैं और समाजवादी समर्थक समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इस बयान को गंभीरता से लेते नही दिखाई दे रहे हैं मगर मेरा अपना मानना है कि मुलायम सिंह यादव का बयान बहुत सोच समझ कर और खीझ कर दिया गया बयान है।

नेता जी के रूप में पुकारे जाने वाले मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समाज मे मुल्ला मुलायम सिंह के रूप में भी पुकारा जाता रहा है मगर मुलायम सिंह की राजनीतिक सोच को समझने के किये हमे 1989 के बाद के घटनाक्रम को देखना होगा । 1989 में जनता दल के गठन के बाद मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्य मंत्री बन तो गए थे मगर उनको विधायको की वोटिंग का सामना करना पड़ा था खुद को चरण सिंह का वारिस कहने वाले नुलायम सिंह यादव को चरण सिंह के पुत्र से चुनौती मिली थी जिसे कहीं ना कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का समर्थन प्राप्त था।

इस टीस को मुलायम सिंह यादव ने मंडल मसीहा कहे  जाने वाले वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को गिरा कर चंद्रशेखर सिंह को समर्थन देकर जनतादल को तोड़ कर मिटाया था।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि मुलायम सिंह यादव जनतादल में विभाजन ना करते तो देश मे मंडल राजनीति का कबाड़ा ना ह७ोता। मुलायम सिंह यादव पिछड़े वर्ग से आने के बावजूद कभी खुद को पिछड़ों का नेता नही बना पाए एक विशेष जाति के नेता के रूप में उनकी पहचान रही वो भी केवल कुछ जनपदों तक ही सीमित रहे। कांशीराम की बसपा से गठबंधन अपना अस्तित्व बचाने के लिए किया क्योंकि जनता दल के विभाजन के बाद जनता दल ही मुख्य विपक्षी दल बना और उसके 89 विधायक 1991 में चुनकर आय और मुलायम सिंह यादव चंद्रशेखर की सजपा को तीन दर्जन सीट भी नही मिल पाई थी।

कांशीराम से गठबंधन के बाद भी मुलायम सिंह यादव अपनी तोड़ो नीति पर काम करते रहे जिसे कांशीराम ने समय रहते समझ लिया जिसके नतीजे में गेस्ट हाउस कांड और मायावती की शपथ के रूप में सामने आया। मुलायम सिंह यादव को पुत्र भाई किसी का मोह नही उनका सपना प्रधानमंत्री बनने का था जिसे लालू यादव जे पूरा होने से रोक दिया नतीजा ये हुवा की बिहार में समाजवादी पार्टी को लड़ाकर लालू यादव को सत्ता से बाहर करने का पूरा प्रयास किया अंतत: उसमे सफल भी हुए।

अखिलेश यादव के मायावती के साथ गठबंधन को मुलायम पचा नही पा रहे हैं उसी का दर्द आज लोकसभा में उनके भाषण में झलक गया मुलायम चाहते  हैं कि शिवपाल के अलग होने और उनके इस बयान के बाद मायावती अखिलेश से पिता के बयान पटलर प्रतिक्रिया देंगी जिससे दोनों के बीच खटास पैदा होगी और गठबंधन पर असर पड़ेगा, यदि ऐसा नही होता है तब भी मुस्लिम मतदाता और मुलायम का घोर समर्थक मतदाता मोदी को वोट कर सकता है। मुलायम सिंह ये इस बयान से राजनीति  कई करवट बदलेगी इससे इनकार नही किया जा सकता।

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