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प्रियंका गांधी: कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र

प्रियंका गांधी: कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र

प्रियंका गांधी की राजनीति में औपचारिक एंट्री, कांग्रेस के लिए जरूर ब्रह्मास्त्र साबित  होगी लेकिन यूपी की घोर जातिवादी राजनीति में मोदी-योगी और माया-अखिलेश के खिलाफ प्रियंका की राह आसान भी नहीं होगी।

2019 लोकसभा चुनाव में महज दो महीने का समय ही बचा है. मगर जिस तरह से राजनीतिक ताने बाने बुने जा रहे हैं, इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि जीत के लिए सभी दल साम, दाम, दंड, भेद सब एक करने वाले हैं. कांग्रेस ने शुरूआत कर दी है. प्रियंका को पार्टी की ओर से पूर्वी उत्तर प्रदेश का महासचिव नियुक्त किया गया है. वे फरवरी के पहले सप्ताह से यह जिम्मेदारी संभालेंगी. उन्हें ये जिम्मेदारी ऐसे समय दी गई है, जब 2014 की हार के बाद कांग्रेस इस आम चुनाव में वापसी की कोशिश कर रही है. यूपी में तो उसके पास दो ही सीटें (अमेठी और रायबरेली) हैं. और मोदी विरोधी सपा-बसपा गठबंधन में उसे जगह भी नहीं मिली है. सियासी रूप से प्रियंका के सामने भले कड़ी चुनौती हो, लेकिन उनकी इस नियुक्ति से कांग्रेस के लिए ब्रम्हास्त्र जरूर साबित होगी। प्रियंका की इस नियुक्ति पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है कि, प्रियंका जी को दी गई जिम्मेदारी काफी अहम है. इसका असर केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश पर ही नहीं, बल्कि अन्य जगहों पर भी पड़ेगा.ये तो ठीक है कि प्रियंका गांधी वाड्रा अब आधिकारिक तौर पर कांग्रेस की नेता हो चुकी हैं - लेकिन इस घोषणा से क्या कुछ बदलेगा और उनकी नयी भूमिका का क्या प्रभाव होगा यही गौर करने वाली बात होगी.

कांग्रेस की राजनीति में प्रियंका गांधी वाड्रा की आॅफिशियल एंट्री ऐसे वक्त हुई है जब राहुल गांधी उन सारी बातों को झुठला चुके हैं जिन्हें लेकर उनकी काबिलियत को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा. राहुल गांधी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनवाकर ये भी साबित कर दिया कि वो चुनाव भी जिता सकते हैं.कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की ताजपोशी की पूरी तैयारी प्रियंका गांधी की निगरानी में ही हुई थी. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पसंदीदा साथ को भी प्रियंका गांधी ने ही अमली जामा पहनाया था. कठुआ और उन्नाव गैंगरेप के विरोध में इंडिया गेट पर कैंडल मार्च के पीछे भी प्रियंका गांधी का ही दिमाग माना जाता है. हाल ही की तो बात है - तीन राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री चुने जाने थे और कोई नतीजा नहीं निकल रहा था और फिर प्रियंका गांधी जुटीं मुख्यमंत्रियों के नाम फाइनल हो गये.

प्रियंका गांधी अब तक रायबरेली और अमेठी में चुनाव प्रबंधन तक सीमित रही हैं. चुनाव भी सोनिया गांधी और राहुल गांधी लड़ते थे और प्रियंका सारे इंतजाम देखती रहीं. अब तो उनका चेहरा भी दाव पर है. निश्चित रूप से प्रियंका गांधी एक बड़ा फेस हैं. प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गयी है. ये वो इलाका है जहां कांग्रेस के सामने चुनौतियां पहाड़ बन कर खड़ी हैं. ये ठीक है कि रायबरेली और अमेठी में काम करने के कारण प्रियंका इलाके के रग-रग से वाकिफ हैं, लेकिन मामला महज इतना ही नहीं है.

कांग्रेस ने प्रियंका को जिस इलाके का प्रभारी बनाया है वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. उसी इलाके में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का कर्मक्षेत्र भी आता है. सबसे बड़ी बात वही वो इलाका है जहां यूपी गठबंधन का सबसे सफल प्रयोग हुआ है. वही इलाका जहां के चुनावी नतीजे मायावती और अखिलेश यादव के बीच चुनावी गठबंधन का आधार बने हैं.पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में बरसों से योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी का दबदबा रहा है - और योगी आदित्यनाथ के यूपी के सीएम की कुर्सी पर बैठने में बड़ी भूमिका रही है. ये इलाका बीजेपी का गढ़ भी है और यूपी गठबंधन की मजबूती का गवाह भी.

एससी-एसटी एक्ट, सवर्ण आरक्षण, तीन तलाक और राम मंदिर निर्माण में उलझी यूपी की चुनावी राजनीति में प्रियंका कांग्रेस की झोली में कितना डाल पाती हैं - इसका लेखा जोखा चुनाव नतीजे ही दे पाएंगे. कयास तो कुछ भी लगाये जा सकते हैं.अब भी ये नहीं कहा जा सकता कि रायबरेली सीट अब पूरी तरह प्रियंका गांधी के हवाले हो जाएगी. पूरी तरह इसलिए क्योंकि चुनावी राजनीति में सोनिया गांधी रायबरेली का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन लोगों के बीच तो प्रियंका ही रहती हैं. एक वक्त तो प्रियंका गांधी दिल्ली में ही रायबरेली के लोगों का जनता दरबार भी लगाती रहीं.

जहां तक प्रियंका के चुनाव क्षेत्र का सवाल है तो जरूरी नहीं कि वो रायबरेली से ही मैदान में उतरें. राजनीति में अगर किसी बड़े नेता को नया चुनाव क्षेत्र चुनना होता है तो उसके लिए पार्टी का गढ़ होना तो जरूरी होता ही है, लेकिन ध्यान इस बात का भी रखा जाता है कि जिस क्षेत्र विशेष से वो खड़ा होगा उसके आस पास की सीटों पर उसका क्या असर होगा. 2014 में नरेंद्र मोदी ने गुजरात से आकर वाराणसी को चुनावी क्षेत्र बनाया - और यूपी में 72 सीटें आने में एक बड़ा फैक्टर ये भी रहा. प्रियंका अपने लिए भी खुद ऐसे ही तरीकों से चुनाव क्षेत्र का चयन करेंगी.

वैसे अब इतना तो लगता है कि प्रियंका लोक सभा में मौजूद रहना चाहेंगी. करीब करीब वैसे ही जैसे अमित शाह राज्य सभा पहुंचे हुए हैं. सीनियर कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा ने भी कुछ ऐसी ही उम्मीद जतायी है, 'प्रियंका को दी गयी जिम्मेदारी बेहद अहम है. इसका असर केवल पूर्वी यूपी पर ही नहीं, बल्कि अन्य इलाकों पर भी होगा.संभव है बीजेपी और उसके साथी वाड्रा विवाद को हवा देने की पूरी कोशिश करें. मगर, बीजेपी और उसके साथियों को ये भी समझाना होगा कि जब केंद्र और हरियाणा दोनों जगह सरकारें रहने के बावजूद वाड्रा की फाइल दबाकर क्यों बैठे हुए थे - और अब कर भी क्या सकते हैं - कुछ ठिकानों की तलाशी के सिवा. क्या इस मामले में भी सत्ताधारी पार्टी वैसे ही सवाल उठाने का मौका देगी जैसे मायावती-अखिलेश यादव की मुलाकात होते ही उनसे संबंधित ठिकानों पर छापेमारी शुरू हो जाती है. 

कांग्रेस प्रियंका को दी गयी जिम्मेदारी को जैसे भी परिभाषित करे, चुनौती तो तकरीबन वैसी ही है. कांग्रेस का मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव जीतना यूपी में संभावनाएं भले बढ़ाये, जीत की गारंटी नहीं है.देखा जाये तो बीजेपी बनाम यूपी गठबंधन की लड़ाई में कांग्रेस को अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए मुकाबले को त्रिकोणीय बनाना होगा. एक बात तो साफ है कि प्रियंका के मोर्चे पर खड़े रहने से कांग्रेस कार्यकतार्ओं का जोश चौगुना हो जाएगा, लेकिन क्या क्या यूपी की जनता भी जाति और धर्म से ऊपर उठ कर प्रियंका के नाम पर वोट देने को तैयार है.

प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि
प्रियंका गांधी वाड्रा में कांग्रेस समर्थक इंदिरा गांधी की छवि देखते रहे हैं. राजनीतिक जमीन पर प्रियंका गांधी कितने पानी में हैं ये अभी साबित होना है. सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दो लोक सभा चुनाव जीतकर केंद्र में दस साल सरकार भी चलायी है, राहुल गांधी भी लगातार फील्ड में बने हुए हैं.

एक छोटी सी मुश्किल भी है
प्रियंका गांधी के अब तक परहेज बरतने को लेकर एक तरह का खास संकोच भी माना जाता रहा. इस संकोच की वजह भी उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के विवादित कारोबार रहे हैं. अब तक बीजेपी सरकारें रॉबर्ट वाड्रा का नाम तो लेती रही हैं, लेकिन सरकारी एजेंसियों का एक्शन ज्यादातर उनके सहयोगियों के खिलाफ रहा है. सरकारी एजेंसियों की जांच पड़ताल हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए भी परेशानियां पैदा करता रहा है. बहरहाल, प्रियंका गांधी के कांग्रेस ज्वाइन करने के साथ अब उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के चुनाव प्रचार और यहां तक कि चुनाव लड़ने की भी चर्चा होने लगी है.

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