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अत्याधिक चिंता और तनाव से बढ़ता है अलसर का खतरा

हेल्थ डेस्क। सन् 1956 में रूसी वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयागों के द्वारा यह सिद्ध कर दिया था कि चिंता और अत्याधिक तनाव के फलस्वरूप ही पेट में अलसर या घाव होते है। निरंतर भय, तनाव तथा चिंता का शरीर पर भयानक प्रभाव होता है। इनके फलस्वरूप रोग से शरीर की रक्षा करने वाली श्वेत रक्त कणिकाओं का काफी नुकसान हो जाता है। इसके विपरीत सकारात्मक चिंतन, प्रसन्नता, मानसिक बल और आनंद से श्वेत रक्त कणिकाओं में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होने लगती है। नकारात्मक भावनाएं हमें ठेस पहुंचाती है। चिंता बढ़ जाने पर पेट में अलसर से रक्तस्त्राव आरंभ हो सकता है। डॉक्टर अलवारिस द्वारा मेयो क्लीनिक में किए गए प्रयोगों ने यह बात सिद्ध कर दी है। डॉ. अलवारिस ने विभिन्न प्रकार के उदर-रोग से पीडि़त 15 हजार रोगियों का निरीक्षण किया। जिसमें उन्होंने उनके पेट दर्द का कारण पता किया। इसमें सबसे रोचक बात यही रही कि लगभग 12 हजार रोगियों की पीड़ा का मूल कारण उनके शरीर में नहीं बल्कि उनके मन में था। रोगियों की समस्या का कारण प्रदूषित जल या वातावरण आदि नहीं थे । भय, चिंता, असुरक्षा की भावना, ईष्र्या और बदलती परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थता ही एक साथ मिलकर उनके पेट में दर्द उत्पन्न कर रहे थे।
डॉ. जॉन शिलडर ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने 20 वर्षों तक हजारों रोगियों का उपचार किया और चिंता, दु:ख एवं तनाव के कारण हुई उनकी शारीरिक क्षति के आंकड़े एकत्र किए।अपने दीर्घकाल के अनुभाव की सहायता से उन्होंने नकारात्मक विचारों से मुक्त होने में रोगियों की मदद की। उनके अनुसार हमारी आधी बीमारियों का मूल हमारे मन में ही विद्यवान है। डॉ. ब्लेथ ने अपनी तनाव संबंधी रोग: एक बढ़ती महामारी नामक पुस्तक में बताया कि उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा, मधुमेह, दमा, गठिया, वातरोग, मस्तिष्क में रक्त अवरोध, एलर्जी, भूख न लगना तथा त्वचा संबंधी बीमारियां मनोदैहिक गड़बडिय़ों से ही उत्पन्न होती है। हम में से अधिकांश लोग नकारात्मक विचारों और भावनाओं के हानिकारक प्रभावों को जानते तक नहीं है। सुखी, स्वास्थ्य और सर्थक जीवन जीनके लिए हमें चिंता, भय, तनाव से छुटकारा पाना ही होगा।

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कई रोगों से निजात दिलाएगा ततांबे के बर्तन में रखा पानी

हेल्थ डेस्क (bangbandhu patrika )। आयुर्वेद में तांबे के बर्तन को काफी महत्व दिया गया है. हमारे प्राचीन काल में तांबे से बना वर्तन का अधिक उपयोग होता था. क्योकि  तांबे के बर्तन में रखे पानी में जीवाणुरोधी, एंटीऑक्सीडेट , कैंसररोधी (anti-cancer) और एंटीइन्फ्लेमेटरी  गुण आ जाते हैं. तांबे का पानी शरीर में तीनों दोषों (वात, कफ और पित्त) को संतुलित रखने में सक्षम है। यह पानी शरीर के कई रोग बिना दवा के ठीक करने की क्षमता रखता हैं और शरीर के जहरीले तत्वों को बाहर निकालता हैं। हालांकि इस पानी का स्वाद थोड़ा अलग होता है लेकिन यह पानी कभी बासी नहीं होता। आइये है तांबे के बर्तन में पानी पीने के क्या फायदे हैं.

ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता (Controls blood pressure)
तांबे का पानी पीने से हार्ट अटैक का खतरा कम हो जाता है। यह ब्लड प्रेशर प्रैशर को नियंत्रित रखता है और बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मददगार है। जिससे दिल से जुडी बीमारियां दूर हो जाती हैं।
कैंसर लड़ने में सहायक (Helpful in fighting cancer)
इस पानी में एंटी-आक्सीडेंट गुण कैंसर से लडऩे की शक्ति प्रदान करते हैं। अध्य्यन के अनुसार, तांबे में कैंसर विरोधी प्रभाव मौजूद होते है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं।
पाचन क्रिया बेहतर ( Improved digestion)
रात के समय तांबे के बर्तन में पानी डालकर रख दें और सुबह खाली पेट इसका सेवन करने से पाचन क्रिया में सुधार होता है। रोजाना इस पानी को पीने से पेट दर्द, गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी परेशानियां भी दूर हो जाती हैं।
यादाशत मजबूत (improved Memory )
हर रोज तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना दिमाग के लिए बहुत लाभकारी होता है। इस पानी से याददाशत तेज होता है।
इसके अलावा तांबे की अंगूठी पहनने से हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता( increases our immunity) बढ़ती है और त्वचा की चमक (brightness of the skin) बढ़ती है।यह खून को साफ करने में भी मदद करती है साथ ही पेट की बीमारियां डायरिया और पीलिया मे लाभकारी है। तांबे को धारण करने से शरीर में खून की कमी नहीं होती ऐसे में तांबा आपके लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकता I 

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सफेद बालों से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो रोज़ खाये लौकी

हेल्थ डेस्क । लौकी में एक या दो नहीं बल्कि कई तरह के न्यूट्रिशन्स मौजूद होते हैं जो सेहत से जुड़ी कई सारी समस्याओं को दूर करने में कारगर हैं। तो आइए जानते हैं इनके अनगिनत फायदों के बारे में। 100 ग्राम लौकी में लगभग 96% पानी और 1 ग्राम फैट होता है। फाइबर, विटामिन, राइबोफ्लेविन, जिंक, थायमीन, आयरन, मैग्नीशियम और मैग्नीज़ जैसे न्यूट्रिशन से भरपूर लौकी को पकाकर खाएं या इसका जूस पीएं, दोनों ही बहुत फायदेमंद है। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के साथ ही ये मोटापा कम करने में भी है कारगर। 

पाचन में बेहतर
कब्ज होने की एक वजह भोजन में फाइबर की कमी भी होती है। लौकी को अपनी डाइट में शामिल कर आप काफी हद तक कब्ज से निजात पा सकते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पेट की अंदरूनी सफाई करता है। इसके साथ ही अगर आपको एसिडिटी की प्रॉब्लम है तो लौकी का जूस पीना फायदेमंद रहेगा।

वजन कम करने में कारगर
लौकी में 96 प्रतिशत पानी होता है और प्रति 100 ग्राम लौकी में मात्र 12 कैलोरी। फाइबर की मौजूदगी बार-बार भूख लगने की समस्या को दूर करती है। तो अगर आप जल्द वजन कम करने की सोच रहे हैं तो लौकी को अपनी डाइट में करें शामिल और साथ ही इसका जूस भी पिएं।

रखें तरोताजा
लौकी का जूस पीने से सोडियम की कमी, मोटापे की समस्या, धूप में बार-बार प्यास लगने की समस्या को भी दूर किया जा सकता है। बहुत ज्यादा देर तक धूप में ट्रैवल करते हैं तो लौकी का सेवन आपको रखेगा तरोताजा और एक्टिव। 

तनाव करता है कम 
बिजी लाइफस्टाइल के साथ काम का प्रेशर बढ़ते तनाव की सबसे बड़ी वजहें हैं जिसे कम करने के लिए लोग तमाम तरह के ट्रीटमेंट्स पर डिपेंड हो रहे हैं लेकिन, क्या आप जानते हैं खानपान में भी जरूरी बदलाव करके इसे दूर किया जा सकता है। लौकी में मौजूद पानी की मात्रा बॉडी को रिफ्रेश रखता है जिससे तनाव में राहत मिलती है। इसके साथ ही कई सारे न्यूट्रिएंट्स शरीर को अंदरूनी रूप से स्ट्रॉन्ग रखते हैं। इससे तनाव और चिंता जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

सफेद बालों की समस्या करे दूर
रोजाना सुबह एक गिलास लौकी का जूस पीना बहुत ही फायदेमंद होता है। इससे बालों के असमय सफेद होने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

खूबसूरत स्किन के लिए
लौकी का जूस पेट की अंदरूनी सफाई करता है जिससे चेहरे पर धूप, धूल, और प्रदूषण से होने वाले कील-मुहांसों से छुटकारा मिलता है। जिससे स्किन खिली-खिली और खूबसूरत नजर आती है।

ब्लड प्रेशर करे कंट्रोल
खाने को पका कर खाना या इसका जूस पीना, दोनों ही सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। ब्लड प्रेशर ही नहीं डायबिटीज़ के मरीजों के लिए भी लौकी है लाभकारी।

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वात, पित्त एवं कफ दोष से भी बढ़ता है मोटापा, आयुर्वेद में छिपा है निदान

हेल्थ डेस्क । सुन्दर छरहरी काया किसे अच्छी नहीं लगती। लोग मोटापा कम करने के लिए घंटों जिम में पसीना बहाते हैं। डायटिंग करते हैं और सप्लीमेंट पर जीने लगते हैं। इसके बाद भी वह परिणाम नहीं आते, जिनकी उन्हें अपेक्षा होती है। आयुर्वेद (दीर्घ जीवन का विज्ञान) मोटापे के लिए कुछ अन्य कारकों को भी जिम्मेदार मानता है। आयुर्वेद के अनुसार अन्य रोगों की तरह मोटापा भी वात-पित्त-कफ के अंसतुलन से उत्पन्न होता है। इस संतुलन को ठीक किए बिना मोटापा से मुक्ति पाना संभव नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार भोजन और चयापचय के बीच असंतुलन के कारण वजन बढ़ने या घटने लगता है। कुछ अन्य रोग भी मोटापे का कारण हो सकते हैं। कफ दोष वाले लोगों में मोटापा या अधिक वजन की समस्या होती है। वात दोष होने पर वजन कम हो जाता है। आयुर्वेद में शरीर की प्रकृति का आकलन करने के बाद ही उसका उपचार किया जाता है। आधुनिक नाड़ी वैद्य-वेदा पल्स (रशियन तकनीक) से मन, शरीर एवं आत्मा का आकलन करते हैं और इसीके आधार पर चिकित्सा की जाती है।

आयुर्वेद में मोटापे का इलाज
आयुर्वेद का मानना है कि कफ उद्दीप्त होने पर शरीर का वजन बढ़ने लगता है। मेद में वृद्धि होती है जबकि ऊतक कुपोषित रह जाते हैं। कफ संचय से चयापचय कमजोर पड़ जाती है जिसके कारण मोटापा बढ़ने लगता है। ऐेसे लोगों को वजन कम करने के लिए नियमित रूप से भोजन करना चाहिए। वात प्रकृति के लोग आम तौर पर दुबले पतले होते हैं और उनके लिए वजन बढ़ाना एक समस्या होती है। पित्त (अग्नि) प्रकृति का शरीर गठीला होता है। ऐसे लोगों में खान पान का असंतुलन वजन बढ़ने का कारण बन सकता है।

वजन घटाने का आदर्श तरीका
वजन कम करने के साथ बेहतर स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद पंचकर्म, योग, प्राणायाम, पावर योगा, साइको न्यूरोबिक्स, हेल्थ डायट प्लान, कसरत, वाष्प स्नान, आयुर्वेदाचार्य परामर्श एवं औषधि का उपयोग किया जाता है। इस चिकित्सा पद्धति का कोई साइड इफेक्ट नहीं है।

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पाचन क्रिया को कमजोर करती हैं नकारात्मक विचार

हेल्थ न्यूज़ 
जब भी हम कोई नकारात्मक विचार करते हैं या उग्र, तनाव में रहता है तब हमारे शरीर के मस्तिष्क में स्थित न्यूरोकेमिकल्स सही तरह से काम नहीं करते लिहाजा पाचन क्रिया सहित शरीर की अन्य क्रिया में भी गड़बड़ी शूरू हो जाती है। इस पीरियड में आंतों में खून की आपूर्ति घट जाती है और एसिड का तनाव बढ़ जाता है। जिससे एसिडीटी, पेट में दर्द, गैस बनना, अपच, कब्ज आदि की समस्या पैदा होती है। अधिक्तर लोग किसी मुसिबत के बारे में सोचकर या फिर किसी जिम्मेदारी से घबराकर नकारात्मक विचारों से घिर जाते हैं तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें पेट में गैस बनना, भोजन का न पचना, कब्ज बनना, भूख न लगना, कमजोरी लगना आदि कई समस्या उत्पन्न होती हैं। हो जाता है। कुछ लोग अपने विचारों को नियत्रित न कर पाने और बार-बार एक ही विचार करने जैसी समस्या से ग्रसित हो जाते है और इस समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए हमेशा डॉक्टर, बैद्य से परामर्श करते रहते है। और काई न कोई दवा का सेवन करते रहना है। फिर भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है। दिनों दिन उनकी बीमारी और भी गंभीर हो जाती है। आपको ज्ञात होना चाहिए कि आज मेडिकल साइंस भी मानती है ज्यादा तनाव की स्थिति में पेट में उल तक होने की अधिक संभवना बनी रहती है।

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बढ़ती उम्र में लाभदायक फाइबर का सेवन

हेल्थ न्यूज़ 
पाचन से लेकर त्वचा की चमक तक अक्सर विशेषज्ञ फाइबर्स के सेवन की सलाह देते हैं। अब एक शोध कह रहा है कि लंबे समय तक फोइबर-रिच डाइट लेने से बढ़ती उम्र के साथ भी स्वस्थ रहने में मदद मिल सकती है। जानें कैसे?

किसी भी व्यक्ति के लिए उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक क्रिया है। इसके साथ ही शरीर के अंगों का कमजोर होना और सफेद बालों, झुर्रियों आदि के साथ बढ़ती उम्र का दिखाई देने लगना भी स्वाभाविक है लेकिन यदि प्रारंभ से प्रयास किए जाएं, तो बढ़ती उम्र के इन लक्षणों को लंबे समय तक टाला जा सकता है और उम्र संबंधी तकलीफों के असर को कम किया जा सकता है। भोजन भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आॅस्ट्रेलिया में हुए एक शोध ने यह साबित किया कि फाइबर से भरपूर भोजन, जोकि असल में काबोर्हाइड्रेट का ही एक प्रकार होता है, और जिसे शरीर पचा नहीं सकता, वह असल में बढ़ती उम्र में स्वस्थ रखकर हमें फायदा पहुंचाता है। 

स्वस्थ रहकर उम्रदराज होने और काबोर्हाइड्रेट का सेवन करने के बीच की इस कड़ी को शोधकतार्ओं ने लाभकारी माना है। शोधकर्ता कहते हैं कि फाइबर्स की बदौलत, उम्र बढ़ने के साथ आने वाली मुश्किलों जैसे डिसेबिलिटी, डिप्रेशन के लक्षण, दिमागी अक्षमताओं, श्वास संबंधी तकलीफों से लेकर कैंसर और कोरोनरी आर्टरी डिसीज जैसी गंभीर अवस्थाओं तक से बचाव हो सकता है।

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हार्ट अटैक के खतरे से बचाते हैं ड्राय-फू्रट्स

हेल्थ न्यूज़।  ड्राई फ्रूटस न सिर्फ कई गंभीर बीमारियां दूर करती है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है। लंबे समय तक ड्राई फ्रूटस लेना बेहद फायदेमंद होता है। ड्राई फ्रूटस को रोजाना अपनी डाइट में शामिल करने से न सिर्फ उम्र्र बढ़ती है बल्कि उम्र्र के प्रभाव कोो भी कम किया जा सकता है। तो आईए जानते है ड्राई फ्रूटस से होने वाले लाभ..

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स्ट्रेस डिसऑर्डर: नई थेरेपी से मिटेगा दिमाग का डर

हेल्थ न्यूज़ 
वैज्ञानिकों ने ऐसी एक नई उपचार प्रक्रिया विकसित की है जो व्यक्ति के दिमाग में बैठे किसी खास डर को मिटा सकती है। इस प्रक्रिया में मस्तिष्क की स्कैनिंग तकनीक और कृत्रिम बुद्धि का इस्तेमाल किया गया है। शोधकतार्ओं ने कहा, इस उपचार से किसी हादसे से गुजर चुके व्यक्ति के दिमाग से हादसे के कारण पैदा हुए डर या तनाव को दूर किया जा सकेगा।किसी हादसे या अवांछित परिस्थिति से गुजरने के कई मामलों में व्यक्ति के दिमाग में उसकी डरावनी यादें जड़ जमा लेती हैं। इससे वह अपने रोजमर्रा के जीवन में सामान्य नहीं रह पाता। वह आशंका और तनाव से पीड़ित हो जाता है, जिसे डॉक्टरी भाषा में पोस्ट ट्राउमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर कहते हैं। 

मस्तिष्क के इस हिस्से में पैदा होता है डर 
इस समस्या को देखते हुए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकतार्ओं ने डिकोडेड न्यूरो फीडबैक नामक एक नई तकनीक विकसित की। इसका इस्तेमाल कर दिमाग को पढ़कर उसमें अवचेतन रूप से बैठे डर को पहचान कर मिटाया जा सकता है। इसमें मस्तिष्क की स्कैनिंग कर गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। यह देखा जाता है कि किसी डर या आशंका के जिक्र के प्रति मस्तिष्क की गतिविधियों में क्या और कैसी जटिलता पैदा होती है।

फिलहाल ऐसे मरीजों को आम तौर पर उस डर का सामना कराया जाता है, जिससे वे पीड़ित होते हैं। ताकि उन्हें यह भरोसा हो जाए कि इस डर से उनको कोई हानि नहीं होने वाली है। इसे एवर्सन थेरेपी कहते हैं, जो मरीज को कतई सहज नहीं लगती। इस अध्ययन में शोधकतार्ओं ने बिजली का झटका देकर 17 स्वस्थ प्रतिभागियों के मस्तिष्क में डर की एक याद पैदा कराई। इसके बाद उनके मस्तिष्क की स्कैनिंग कर उस हिस्से को पहचाना, जहां डर की याद अंकित हुई थी। उन्होंने इसका भी पता लगाया कि इस डर को लेकर मस्तिष्क की गतिविधियों में क्या बदलाव आया। इस तरह उन्होंने मस्तिष्क में डर से जुड़ी गतिविधियों के पैटर्न का पता लगाया।  प्रतिभागियों के मस्तिष्क में डर की याद वाले हिस्से में गतिविधि शुरू होते ही शोधकतार्ओं ने उन्हें कुछ पैसे दिए। इस तरह प्रतिभागियों के मस्तिष्क में डर से जुड़ी याद की जगह पैसे पाने की बात अंकित हो गई। तीन दिन तक यह प्रक्रिया दोहराने के बाद शोधकतार्ओं ने प्रतिभागियों के मस्तिष्क की दोबारा स्कैनिंग की। पता चला कि मस्तिष्क में पहले जिस स्थान पर डर की याद अंकित थी, उसकी गतिविधियां थम-सी गई थीं। अर्थात प्रतिभागी उस डर को भूल चुके थे। यह अध्ययन नेचर ह्यूमन बिहेवियर जर्नल में छपा है।

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YOGA अपनाएं और स्वास्थ व सुखी जीवन जीयें

योग का अर्थ है जोड़ना, जीवात्मा का परमात्मा से मिल जाना, पूरी तरह से एक हो जाना ही योग है। योगाचार्य महर्षि पतंजली ने सम्पूर्ण योग के रहस्य को अपने योगदर्शन में सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है.उनके अनुसार, चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है।

हमारे ऋषि मुनियों ने योग के द्वारा शरीर मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताएँ हैं, जिसे अष्टांग योग कहते हैं. इस अंक में हम कुछ आसान और प्राणायाम के बारे में बात करेंगे जिसे आप घर पर बैठकर आसानी से कर सकते हैं और अपने जीवन को निरोगी बना सकते हैं। आसान से तात्पर्य शरीर की वह स्थिति है जिसमें आप अपने शरीर और मन को शांत स्थिर और सुख से रख सकें. आसनों को अभ्यास शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से स्वास्थ्य लाभ एवं उपचार के लिए किया जाता है।

सर्वांगासन 
विधि: दोनों पैरों को धीरे-धीरे उठाकर 90 अंश तक लाएं. बाहों और कोहनियों की सहायता से शरीर के निचले भाग को इतना ऊपर ले जाएं की वह कन्धों पर सीधा खड़ा हो जाए। पीठ को हाथों का सहारा दें .. हाथों के सहारे से पीठ को दबाएं . कंठ से ठुड्ठी लगाकर यथाशक्ति करें। फिर धीरे-धीरे पूर्व अवस्था में पहले पीठ को जमीन से टिकाएं फिर पैरों को भी धीरे-धीरे सीधा करें।

लाभ: थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है। मोटापा, दुर्बलता, कद वृद्धि की कमी एवं थकान आदि विकार दूर होते हैं। एड्रिनल, शुक्र ग्रंथि एवं डिम्ब ग्रंथियों को सबल बनाता है।

स्वस्तिकासन 
विधि: बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिने जंघा और पिंडली ( घुटने के नीचे का हिस्सा) और के बीच इस प्रकार स्थापित करें की बाएं पैर का तल छिप जाये उसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे से जांघ और पिंडली के मध्य स्थापित करने से स्वस्तिकासन बन जाता है। ध्यान मुद्रा में बैठें तथा रीढ़  सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें।इसी प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें।

लाभ: पैरों का दर्द, पसीना आना दूर होता है। पैरों का गर्म या ठंडापन दूर होता है.. ध्यान हेतु बढ़िया आसन है।

गोमुखासन 
विधि: दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब के पास रखें।दायें पैर को मोड़कर बाएं पैर के ऊपर इस प्रकार रखें की दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर हो जाएँ।दायें हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मुडिए तथा बाएं हाथ को पीठ के पीछे नीचे से लाकर दायें हाथ को पकडिये .. गर्दन और कमर सीधी रहे।
एक ओ़र से लगभग एक मिनट तक करने के पश्चात दूसरी ओ़र से इसी प्रकार करें। जिस ओ़र का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओ़र का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें.

लाभ: अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभप्रद है। धातुरोग, बहुमूत्र एवं स्त्री रोगों में लाभकारी है।यकृत, गुर्दे एवं वक्ष स्थल को बल देता है। संधिवात, गाठिया को दूर करता है।

स्थिरसुखमासनम
 सुखपूर्वक बिना कष्ट के एक ही स्थिति में अधिक से अधिक समय तक बैठने की क्षमता को आसन कहते हैं। योग शास्त्रों के परम्परानुसार चौरासी लाख आसन हैं और ये सभी जीव जंतुओं के नाम पर आधारित हैं। इन आसनों के बारे में कोई नहीं जानता इसलिए चौरासी आसनों को ही प्रमुख माना गया है. और वर्तमान में बत्तीस आसन ही प्रसिद्ध हैं। आसनों को दो समूहों में बांटा गया है। एक गतिशील आसान दूसरा स्थिर आसान । गतिशील आसन- वे आसन जिनमे शरीर शक्ति के साथ गतिशील रहता है. स्थिर आसन- वे आसन जिनमे अभ्यास को शरीर में बहुत ही कम या बिना गति के किया जाता है. आइये अपने शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए इन आसनों के बारे में जानते हैं 

गोरक्षासन 
विधि: दोनों पैरों की एडी तथा पंजे आपस में मिलाकर सामने रखिये। अब सीवनी नाड़ी (गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के मध्य) को एडियों पर रखते हुए उस पर बैठ जाइए। दोनों घुटने भूमि पर टिके हुए हों।हाथों को ज्ञान मुद्रा की स्थिति में घुटनों पर रखें।

लाभ: मांसपेशियो में रक्त संचार ठीक रूप से होकर वे स्वस्थ होती है.मूलबंध को स्वाभाविक रूप से लगाने और ब्रम्हचर्य कायम रखने में यह आसन सहायक है।
इन्द्रियों की चंचलता समाप्त कर मन में शांति प्रदान करता है. इसीलिए इसका नाम गोरक्षासन है।

अर्द्धमत्स्येन्द्रासन 
विधि: दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें. बाएं पैर को मोड़कर एडी को नितम्ब के पास लगाएं।बाएं पैर को दायें पैर के घुटने के पास बाहर की ओ़र भूमि पर रखें। बाएं हाथ को दायें घुटने के समीप बाहर की ओ़र सीधा रखते हुए दायें पैर के पंजे को पकडें। दायें हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर पीछे की ओ़र देखें। इसी प्रकार दूसरी ओ़र से इस आसन को करें।

लाभ: पृष्ठ देश की सभी नस नाड़ियों में  रक्त संचार को सुचारू रूप से चलाता है।उदर (पेट) विकारों को दूर कर आंखों को बल प्रदान करता है।

योगमुद्रासन 
विधि: बाएं पैर को उठाकर दायीं जांघ पर इस प्रकार लगाइए की बाएं पैर की एडी नाभि केनीचे आये।दायें पैर को उठाकर इस तरह लाइए की बाएं पैर की एडी के साथ नाभि के नीचे मिल जाए।दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाएं हाथ की कलाई को दाहिने हाथ से पकडें. फिर श्वास छोड़ते हुए सामने की ओ़र झुकते हुए नाक को जमीन से लगाने का प्रयास करें. हाथ बदलकर क्रिया करें।

शंखासन
विधि: हाथों को घुटनों पर रखते हुए पंजों के बल कागासन बैठ जाइए। श्वास अंदर भरते हुए दायें घुटने को बाएं पैर के पंजे के पास टिकाइए तथा बाएं घुटने को दायीं तरफ झुकाइए। गर्दन को बाईं ओ़र से पीछे की ओ़र घुमाइए व पीछे देखिये। थोड़े समय रुकने के पश्चात श्वास छोड़ते हुए बीच में आ जाइये. इसी प्रकार दूसरी ओ़र से करें।
लाभ: सभी प्रकार के उदर रोग तथा कब्ज मंदागिनी, गैस, अम्ल पित्त, खट्टी-खट्टी डकारों का आना एवं बवासीर आदि दूर होते हैं। आंत, गुर्दे, अग्नाशय तथा तिल्ली सम्बन्धी सभी रोगों में लाभप्रद है।

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डायबिटीज: सिर्फ खाने-पीने से नहीं होती 8 कारण भी हैं जिम्मेदार..

आम धारणा है कि डायबिटीज खाने-पीने या लाइफस्टाइल के कारण होती है और इसलिए जिसे भी शुगर की बीमारी होती है उसने जरूर अपने खाने-पीने में गड़बड़ की होगी, लेकिन ऐसा है नहीं. डायबिटीज होने के और भी कई कारण हो सकते हैं. अगर भारत को दुनिया का डायबिटीज कैपिटल बोला जाए तो गलत नहीं होगा. 2015 तक भारत में करीब 69.2 मिलियन डायबिटिक मरीज थे. WHO के मुताबिक 2030 तक 80 मिलियन लोग भारत में डायबिटीज का शिकार हो जाएंगे. क्या इस बीमारी के इतनी तेजी से फैलने की वजह भारतीयों की लाइफस्टाइल और खाने की आदतें हैं? आम धारणा है कि डायबिटीज खाने-पीने या लाइफस्टाइल के कारण होती है और इसलिए जिसे भी शुगर की बीमारी होती है उसने जरूर अपने खाने-पीने में गड़बड़ की होगी, लेकिन ऐसा है नहीं. डायबिटीज होने के और भी कई कारण हो सकते हैं.

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