Spiritual

बोधि वृक्ष: इस पेड़ को दो बार नष्ट करने की कोशिश की गई थी, लेकिन हर बार चमत्कारिक रूप से यह पेड़ फिर से उग आया

Date : 02-May-2020

बोधि वृक्ष के बारे में तो आपने सुना ही होगा। वहीं बोधि वृक्ष, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। पहले तो आप ये जान लीजिए कि 'बोधि' का मतलब 'ज्ञान' होता है और वृक्ष का मतलब पेड़ यानी 'ज्ञान का पेड़'। दरअसल, बोधि वृक्ष बिहार के गया जिले में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का पेड़ है। इसी पेड़ के नीचे ईसा पूर्व 531 में भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस पेड़ की भी बड़ी विचित्र कहानी है, जिसके बारे में शायद ही आप जानते होंगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस पेड़ को दो बार नष्ट करने की कोशिश की गई थी, लेकिन हर बार चमत्कारिक रूप से यह पेड़ फिर से उग आया था। 
बोधि वृक्ष को नष्ट करने का पहला प्रयास ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में किया गया था। वैसे तो सम्राट अशोक बौद्ध अनुयायी थे, लेकिन कहते हैं कि उनकी एक रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे वृक्ष को कटवा दिया था। उस समय सम्राट अशोक दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर गए हुए थे। हालांकि उनका ये प्रयास विफल रहा था। बोधि वृक्ष पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। कुछ ही सालों के बाद बोधि वृक्ष की जड़ से एक नया पेड़ उग आया था। उस पेड़ को बोधि वृक्ष की दूसरी पीढ़ी का वृक्ष माना जाता है, जो करीब 800 साल तक रहा था। 
तीसरी बार तो बोधि वृक्ष वर्ष 1876 में प्राकृतिक आपदा की वजह से नष्ट हो गया था, जिसके बाद एक अंग्रेज लॉर्ड कनिंघम ने वर्ष 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरा से बोधिवृक्ष की शाखा मंगवाकर उसे बोधगया में फिर से स्थापित कराया था। यह बोधि वृक्ष की पीढ़ी का चौथा पेड़ है, जो बोधगया में आज तक मौजूद है। 
दरअसल, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए बोधि वृक्ष की टहनियां देकर उन्हें श्रीलंका भेजा था। उन्होंने ही अनुराधापुरा में उस वृक्ष को लगाया था, जो आज भी वहां मौजूद है। आपको बता दें कि अनुराधापुरा दुनिया की सबसे प्राचीन नगरियों में से एक है। इसके अलावा यह श्रीलंका की आठ विश्व विरासत स्थलों में से भी एक है। 

View More...

ज्ञान-विज्ञान युक्त मान्यताओं के कारण संसार के सब मनुष्यों के लिये महान धर्म है वैदिक धर्म

Date : 20-Feb-2020

-मनमोहन कुमार आर्य
संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं जो विगत पांच सौ से पांच हजार वर्षों में उत्पन्न हुए हैं। इन मतों ने अपने से पूर्व प्रचलित अवैदिक मतों वा वैदिक धर्म के प्रचलित कुछ सिद्धान्तों व मान्यताओं को भी अपनाया है। वैदिक धर्म संसार का सबसे प्राचीन मत है। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को चार वेदों का ज्ञान दिया था। इन चार ऋषियों ने इस ज्ञान को ब्रह्मा जी नाम के ऋषि को दिया। ब्रह्मा जी से ही वेदों के प्रचार की परम्परा आरम्भ हुई। वेद सर्वांगीण धर्मग्रन्थ है अर्थात् इसमें मनुष्य के लिए आवश्यक व उपयोगी सभी विषयों का ज्ञान है। वेद का अध्ययन कर मनुष्य का आध्यात्मिक एवं भौतिक सभी प्रकार का विकास होता है। वेदों का अध्ययन कर तथा वेद की शिक्षाओं को अपनाकर मनुष्य का जीवन आदर्श जीवन बनता है। इससे वह स्वस्थ एवं निरोग रहता है और जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होता है। अन्य मतों में तो मतों में धर्म की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है। अन्य मत अपने अपने आचार्य, गुरु व मत के संस्थापक की शिक्षाओं के पालन को ही अपना कर्तव्य मानते हैं। वह अपने मत की मान्यताओं के सत्यासत्य होने की परीक्षा नहीं करते। हमारे ऋषि-मुनि वेदों की मान्यताओं को सत्य की कसौटी पर कस कर ही उनका प्रचार करते थे और उन वैदिक परम्पराओं से ही समाज तथा मानव मात्र का कल्याण व हित सिद्ध होता आया है। अनेक मत ऐसे हैं जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण अपने मत के अनुयायियों की संख्या बढ़ाना है। वोट के भिक्षुक राजनीतिक दल इस प्रवृत्ति पर आंखें मूंदे रहते हैं। भारत में जो वेदेतर मतानुयायी हैं वह सब इसी प्रकार से मतान्तरित वा धर्मान्तरित होकर अस्तित्व में आये हैं। सभी मतों में अपनी मान्यताओं व सिद्धान्तों की गुणवत्ता व दोषों को जानकर असत्य के त्याग तथा उनमें संशोधन कर उन्हें समयानुकूल उपयोगी व जनहितकारी बनाने पर ध्यान नहीं दिया जाता। वह सब वर्तमान में भी उसी स्थिति में हैं, जो उनके प्रचलन व आरम्भ के समय में थी।

               विचार करने पर अनुभव किया जाता है कि धर्म व विज्ञान की मान्यताओं को परस्पर पूरक होना चाहिये। किसी मत व धर्म कि जो मान्यतायें ज्ञान व विज्ञान के विरुद्ध होती हैं वह अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त होती हैं। अज्ञान व अन्धविश्वास मनुष्य की उन्नति में बाधक होते हैं जो मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाते हैं। भारत की पराधीनता व पतन का कारण भी धार्मिक अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त सामाजिक परम्परायें ही थीं। ज्ञान व विज्ञान मनुष्य को जगत के सत्य नियमों से परिचित कराते हैं। पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद विज्ञान का आरम्भ विगत तीन चार सौ वर्ष पूर्व माना जा सकता है और इस अल्प अवधि में विज्ञान के प्रायः सभी सिद्धान्तों व मान्यताओं में उत्तरोत्तर आवश्यकतानुसार परिवर्तन व संशोधन हुआ है। किसी मान्यता व सिद्धान्त में चाहे व धर्म हो या विज्ञान, इसके प्रवर्तकों का अल्पज्ञ होना है। विज्ञान का आरम्भ व उन्नति मनुष्यों ने अपने ज्ञान, अनुभूतियों तथा तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार की है। सभी परवर्ती वैज्ञानिकों ने पूर्व खोजे गये वैज्ञानिक रहस्यों वा सिद्धान्तों की परीक्षा की और उनमें अपेक्षित सुधार व संशोधन किये। यह क्रम वर्तमान में भी जारी है। वैज्ञानिक जगत में कोई नया या पुराना, अनुभवहीन व अनुभवी वैज्ञानिक यह नहीं कहता कि पूर्व का अमुक वैज्ञानिक बहुत बड़ा वैज्ञानिक था इसलिये उसके खोजे गये किसी सिद्धान्तों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। हम विज्ञान व वैज्ञानिकों को अपने नियमों व सिद्धान्तों पर सतत विचार, चिन्तन-मनन व परीक्षण करने तथा उसमें किसी पूर्व वैज्ञानिक की त्रुटि या न्यूनता ज्ञात होने पर उसकी उपेक्षा न करने के स्वभाव वा प्रवृत्ति की प्रशंसा करते हैं और उनके प्रति नतमस्तक हैं। किसी वेदेतर वा अर्वाचीन मत में ऐसे विचार, मनन, परीक्षण एवं सशोधन की परम्परा नहीं है। यदि वह ऐसा करें तो उनके अस्तित्व पर ही खतरा बन सकता है। वैदिक धर्म ही अपने अनुयायियों को विचार, चिन्तन, मनन, परीक्षण एवं आवश्यकता पड़ने पर संशोधन का अधिकार देता है। इस कारण से वैदिक घर्म पुरातन व आधुनिक दोनों समयों में सबके लिये ग्राह्य एवं पालनीय धर्म बना हुआ है। सत्यार्थप्रकाश में प्राकशित यही वैदिक सद्धर्म भविष्य के सभी मनुष्यों का धर्म हो सकता है वा होगा। इसका कारण यह है कि इसकी नींव सत्य पर, ईश्वर के ज्ञान पर तथा प्रकृति के अनुकूल ज्ञान व विज्ञान के नियमों पर आधारित है। वैदिक धर्म अपनी ज्ञान-विज्ञान युक्त मान्यताओं के कारण ही संसार के सब मनुष्यों के लिये महान धर्म है। वेदों की शिक्षायें किसी एक मत-विशेष, उसके आचार्य व अनुयायियों के लिये न होकर मानव मात्र के लिये हैं और यह सभी मनुष्यों एवं प्राणीमात्र के लिये हितकारी एवं कल्याणप्रद भी हैं। वेदों की कोई मान्यता सत्य नियमों व वैज्ञानिक सिद्धान्तों के विपरीत नहीं है। वेद और विज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। वेद की शिक्षाओं से मनुष्यों का सर्वांगीण विकास व उन्नति होती है। वेद-धर्म का पालन करने से ही मनुष्य का अभ्युदय अर्थात् सांसारिक उन्नति होने सहित पारलौकिक उन्नति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। मोक्ष के विषय में वेदेतर मतों को ज्ञान ही नहीं है। वेदेतर मतों में स्वर्ग की कल्पना है परन्तु उसका ज्ञान व विज्ञान पर आधारित स्वरूप जिसे आत्मा व बुद्धि स्वीकार करे, उपलब्ध नहीं होता। वेदों में स्वर्ग नाम का कोई स्थान इस अनन्त ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। स्वर्ग सुख विशेष को कहते हैं जो हमें इस मनुष्य जीवन में सत्य धर्म का आचरण करने से प्राप्त होता है। 

View More...

पंचतत्व में छिपा है सेहत का महामंत्र, हमें शारीरिक और मानसिक पोषण देते हैं यह पांच तत्व

Date : 12-Sep-2019

सुश्री संध्या श्रीवास्तव। कहा गया है कि जो ब्रह्मांड में है वही पिंड में है। पंचतत्वों का आपसी समन्वय, सामंजस्य, विश्वास ही इकोलाजी है जिससे इकोसिस्टम चलता है। प्रकृति बचाने के लिये हर तत्व को हृदय से जानना होगा, समझना होगा, उनके साथ एक सामंजस्य बना कर रखना होगा। 

क्षिति 
क्षिति अर्थात मिट्टी  का तत्व। ये मानव शरीर जो मिट्टी का पुतला कहलाता है अन्न उसका पोशण करता है। इस तत्व का गुण गंध है। इसी तरह हम फूलों की क्यारी के पास से गुजरते हैं तो उसकी खुशबू से मन प्रसन्न हो जाता है तो वहीं अगर बदबू नाक में जाती है तो हाल बेहाल हो जाता है। इस तरह गंध हमारे शरीर पर गहरा असर छोड़ती है। यदि पर्यावरण दूषित दुर्गंध युक्त होता है तो हमें रक्त विकार एवं चर्मरोग का सामना करना पड़ता है। वहीं एरोमा थेरेपी में फल फूल की खुशबू से ही सारे रोगों के उपचार हो जाते। अथात् प्रकृति की सुगंध में ही हमारी सेहत का राज छिपा है। 

जल तत्व 
यह दूसरा तत्व है ,जल ही जीवन है। श्रृग्वेद में कहा गया है कि जल ही औशधि है, इसलिये यह तुम्हारे भी समस्त रोग दूर करे। इसकी प्रकृति षीतल, गुण -रस है। किडनी में सभी द्रव्य का परिचालन और शुद्धिकरण होता है। 
यह जल दो गेैसों के संयोग से बना है इसीलिये जल तत्व ही एक ऐसा तत्व है जिसमें लय और प्रलय के गुण एक साथ हैं। 

पावक
यह तीसरा तत्व अर्थात अग्नि तत्व वह तत्व है जो कि जीवन का उत्पादक है। इससे जठराग्नि उत्पन्न होती है, क्षुधा जागृत होती है पाचनसंस्थान कार्य करता है। जिसके तीन प्रकार शरीर में होते हैं। प्रथम जठराग्नि, जिसका संबंध हमारी क्षुधा तथा पाचन संस्थान से है। दूसरी चित्ताग्नि जिससे हमारे व्यक्तित्व में प्रभाव रहता है। तीसरी भूताग्नि है जो षरीर और मन पर नियंत्रण रखती है।इसका गुण रूप है। हम जो भी देखते हैं उसे दिल में वैसा अनुभूत करते है। इसीलिये अपने मन को आनंदमय बनाने के लिये वातावरण स्वच्छ और प्रकाशवान बनाना आवश्यक है ।

समीरा 
यह चैथा तत्व यानि वायुतत्व  है, जिसे हम त्वचा में स्पर्श के माध्यम से अनुभूत करते ष्वसन के माध्यम से वायु शरीर में प्रवाहित होती है। इसलिये षुद्ध वायु का होना आवश्यक है। जो कि हमें जंगल, वन उपवन वृक्षों से प्राप्त होती है। वृक्षारोपण आवष्यक है।

आकाश
जिसका गुण शब्द है मान्यता है जब से ब्रहृांड है तब से षब्द ऊॅं ब्रहृांड में गुंजायमान है जिसके सकारात्मक प्रभावों के वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं। जिससे संगीत बना है। यही कारण है कि संगीत की रागात्मकता मन प्राण में आनंद की हिलोरें उत्पन्न करतीं हैं। वहीं शोर शराबा मानसिक शांति भंग करता है। यहां हम देखते हैं कि किस तरह पांचों तत्व हमारे भीतर हमारे शरीर में समाये हैं जो हमारा शारीरिक और मानसिक पोषण करते हैं। जिसका संरक्षण आवश्यक है।
View More...

गुरु व परमात्मा का दायित्व

Date : 16-Mar-2019

परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम्हें जो होना है, हो जाओ। वह तुम्हारे जीवन की किताब को कोरी छोड़ देता है, तुम्हें जो लिखना हो लिख लो। तुम्हें पाप करना है पाप करो, पुण्य करना हो पुण्य करो। तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो व स्वभावत: नीचे उतरना आसान है, ऊपर चढना कठिन है। सो लोग नीचे उतरते हैं। लोग पाप मे उतरते हैं। पाप में प्रबल आकर्षण मालूम होता है, क्योंकि वह सरल मालूम होता है। परमात्मा ने स्वतंत्रता दी है व परिणाम यह है कि लोग गुलाम हो गये हैं-वासनाओं के, संसार के।

गुरु का काम ठीक उलटा है। गुरु अनुशासन देता है। गुरु जीवन को जीने का ढंग, शैली देता है। गुरु शास्ता है, शासन देता है। जीवन को रंग रुप देता है। तुम्हारे अनगढ़ पत्थर को ढालता है, इसलिये ऊपर से तो लगता है कि जो लोग गुरु के पास गये, वे गुलाम हो गये। ऊपर से ये बात ठीक भी मालूम पडती है, क्योंकि अब जो गुरु कहेगा, वैसा वे जियेंगे। गुरु का इशारा अब उनका जीवन होगा। गुरु के सहारे चलेंगे। गुरु की नाव में यात्रा होंगी। गुरु की शर्तें स्वीकार करनी होंगी। गुरु के प्रति समर्पण करना होगा, तो बडा विरोधाभास है। परमात्मा स्वतंत्रता देता है व परिणाम है कि सभी लोग परतंत्र हो गये हैं व गुरु अनुशासन देता है व परिणाम में स्वतंत्रता उपलब्ध होती है। क्योंकि जैसै-जैसै व्यक्ति अनुशासित होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति के जीवन में एक व्यवस्था, एक तंत्र पैदा होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति जीवन में होश संभालता है। जैसै-जैसै व्यक्ति जागरुक जीवन होने लगता है, वैसै-वैसै स्वतंत्रता का नया आयाम खुलता है, स्वच्छंदता पैदा होती है। 'स्वच्छंदता' शब्द का अर्थ उच्छ्रंखलता मत लेना। 
स्वच्छंदता का ठीक वही अर्थ होता है, जो स्वतंत्रता का है। स्वतंत्रता से भी बहूमूल्य शब्द है स्वच्छंदता। 'स्वच्छंद' का अर्थ होता है, जिसके भीतर का छंद जग गया, जिसके भीतर का गीत जग गया यानी जो अपना गीत गाने योग्य हो गया। जो गीत गाने के लिये परमात्मा ने तुम्हें भेजा था व तुम भटक गये थे। जो बनने के लिये तुम्हें परमात्मा ने भेजा था, लेकिन तुम विपरीत चले गये थे, क्योंकि वह हजार आकर्षण थे व तुम्हें कुछ होश न था।

View More...

प्रेरणा/ खुश रहना मेरी आदत है!

Date : 16-Mar-2019


हर मानुष्य में वह असीम शक्ति छिपी हुई है जो दुनिया की  किसी भी समस्या को सुलझा  सकती है। सच्ची खुशी आपको उस दिन मिलेगी जिस दिन आप यह जान लेंगे कि आप किसी भी कमजोरी से पार पा सकते है और आपका अवचेतन मन आपकी हर समस्या को सुलझा  सकता है उस दिन आपको अपेक्षा से कहीं अधिक समृद्ध बना सकता है। आपको उस दिन सबसे ज्यादा खुशी हुई होगी जिस दिन आपके घर में आपके चाहते मेहमान आए होंगे या आप स्कूल-कॉलेज में प्रथम स्थान हासिल किए होंगे या आपको बड़ी जीत या पुरस्कार मिला था। आपको उस समय भी बड़ी खुशी हुई होगी जब आपकी सगाई या शादी किसी सुंदर स्त्री/पुरूष  से हुई होगी। ऐसे आपके जीवन में कई अवसर आए होंगे जब आपको खुशी मिली होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि यह खुशी स्थाई नहीं बल्कि क्षणिक ही होगी।

खुशी मन क ी अवस्था है। आप स्वतंत्र है और खुश रहना मनुष्य का  स्वभाव है। आप जितना सरल और सहज रहेंगे आपको उतनी ही खुशी का  अहसास होगा। जीवन की महान वस्तुएं बहुत ही सरल, सहज, गतिशील और रचनात्मक होती है। कई साल पहले मैं अपने गांव के एक किसान को देखता था। वह हमेशा काफी खुश रहता था। वह हमेशा गुनगुनाता और हंसता-मुस्कुराता दिखाई देता था। मैंने उससे अपनी खुशी को राज जानना चाहा तो वह बोला खुश रहना मेरी आदत है। मैं हमेशा सुबह उठकर खेत जाकर फसलों के फलने फूलने की कामना करता हूं और ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझे  बढ़िया फसल की सौगात दी है। पालतू जानवर और परिवार वालों के साथ समय बिताता हूं और अपनी संवेदनाओ को साझा  करता हूं। उस किसान ने कई सालों से ऐसा करने की आदत बना ली थी। अगर किसी विचार को लगातार दोहराते है तो वे आपके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है और आपकी आदत में शामिल हो जाते है। इसलिए उस किसान ने इस बात पता लगा लिया था कि खुश रहना एक आदत है। आपको खुश रहने की इच्छा दिल से करनी चाहिए न कि तर्क से !। 

कुछ लोग होते है जो हमेशा निराश, नाखुश और उदास रहते है और वे नाकारात्मक विचार को अपने आदत में शामिल कर दुख: को अपना साथी बना लिए है। उदाहरण के लिए  मैं आप लोगों को मिलन भाई के बारे में बताना चाहूंगा। जो मेरे पड़ोसी, बड़े भाई और मित्र है। मिलन भाई गांव में मेरे सबसे करीबी और उत्तम साथी है। नाम से ही पता चलता है कि वे मिलानुसार और मृदुभाषी है।  पूरे गांव में वे ही एक ऐसे व्यक्ति जो हमेशा दुसरों के दुख दर्द बांटते है और मद्द के लिए सबसे आगे रहते है। दूसरी ओर पूरे गांव में ही वे एक ऐसी व्यक्ति है जो हमेशा दुखी और उदास रहते है। इसका महत्पूर्ण कारण भी है।  मैं अक्सर लेट उठता हूं पर सुबह मिलन भाई से सबसे पहले मै ही मिलता हूं। अक्सर वे किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा करते है और निराश हो जाते है। अगर पानी कम गिरा तो फसल का क्या होगा ?, अगर धूप ज्यादा निकली तो फसल का क्या होगा? फसल कम हुई तो परिवार का क्या होगा? पालतु जानवर को चारा कहां मिलेगा? पशु-पक्षी का क्या होगा?। जब भी वे किसी सुंदर कन्या या स्त्री को देखता है तो भी निराश! मै कैसा दिखता हूं?। अमीर व्यक्ति को देखे तो मैं कितना गरीब हूं। शादी-विवाह या उत्साव में भी शामिल होने पर दूसरों से तुलना... मेरा कपड़ा अच्छा नहीं है! तो मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं ! बगैरह.....बगैरह..... और फिर निराशा, उदासी। अक्सर देखा गया है कि ऐसे व्यक्ति उन व्यक्ति से ज्याद मिलना पसंद करते है जो हमेशा दुखी और निराश रहते है। अगर आप किसी दूसरे व्यक्ति से मिलते है और वे दुखी और निराश है तो उसे खुश करना आपकी जिम्मेदी है...पर ऐसा न होकर अक्सर लोग स्वयं दुखी हो जाते है । मिलन भाई शिक्षित, बुद्धिमान और कला पे्रमी है और वे सबसे दुखी व्यक्ति भी है। उनके जीवन में यदि अचानक ऐसा कुछ घट जाए जो बहुत खुशी देने वाला हो तो भी वे इसके प्रति इस तरह से प्रतिक्रिया देते है जैसे कि मुॐक्कद्ध  किसी ने कहा है अधिक खुश होना भी ठीक नहीं है। ऐसे लोग अपने मानसिक प्रारूप में रहने के हतने आदी हो जाते है कि वे खुशी के अवसर आने पर भी खुश होना नहीं चाहते है। वे हमेशा उदास, नाखुश और निराशा की अवस्था में ही रहना चाहते है। कई लोग कुछ विचारों को मन में स्थान देकर नाखुश रहने का निश्चय करते है जैसे आज का दिन मेरे लिए शुभ नहीं है! तो आज शनिवार है और शनि की छाया मेरे उपर है आदि..। अगर घर में कोई बच्चा वर्तन गिरा देता है तो - आज का दिन मेरे लिए मनहूस है, आज मेरे साथ सब कुछ गलत होना वाला है। मेरा व्यापार खराब हो रहा! मुॐक्कद्ध सफलता नहीं मिल रही है। यदि आपके मन में विचार इसी तरह का होता है तो आप इन्ही सारे अनुभवों को अपनी और आकर्षित कर रहें होते है और हमेशा दुखी ही रहेंगे।

  जैसे कि मै पहले कह चूका हूं अगर किसी विचार को लगातार दोहराते है तो वे आपके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है और आपकी आदत में शामिल हो जाते है। आपको इस बात का अहसास होना चाहिए कि आपके आसपास जो कुछ भी घटता है, दुनिया का जो स्वरूप और अनुभव आप करते है वह आपके अपने विचारों का ही परिणाम होता है। अमेरिका के महान दार्शनिक इमर्शन के अनुसार मनुष्य दिन भर जो कुछ सोचता है वह उसी विचार के अनुरूप हो जाता है। आदमी के चिवार ही उसके व्यक्तित्व को गढ़ते है। जिन विचारों को आप आदतन अपने मन में स्थान देते है उसमें आने आप को वास्तविकता के भौतिक धरातल पर उतारने की क्षमता होती है। यह सुनिश्चित करें कि आप स्वयं को किसी तरह के नकारात्मक, निराशाजनक, क्रूर विचारों में न घिरने दें। हमेशा अपने मन में सकारात्मक विचार रखें ।आपको पूरे मन से यह इच्छा रखनी होगी कि आप खुश रहना चाहते  और आपकी इच्छा के बिना कुछ भी पूरा नहीं हो सकता। इच्छा वह चाह है जिसके साथ कल्पना और विश्वास के पंख लगे होते है। अपनी इच्छा को कल्पना में पूर्ण होते देखें और इस वास्तविकता को महसूस करें। आपकी इच्छा वास्तविकता में बदल जाएगी। खुश रहने का यही रहस्य है।

View More...