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आज है पितृ पक्ष का आखिरी दिन महालय अमावस्या, जाने इसका क्या महत्व है

Date : 17-Sep-2020

आज महालय है. यानी पितृ पक्ष का आखिरी दिन पितृ विसर्जन अमावस्या। हिन्दू पंचांगों में लिखा है कि आश्विन माह की अमावस्या को ही महालय अमावस्या होता है। इस दिन को सर्व पितृ अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या के अलावा मोक्षदायिनी अमावस्या भी कहते हैं। हर वर्ष महालय अमावस्या के बाद अगले पल से ही नवरात्रि प्रारंभ हो जाती थी लेकिन इस बाद अधिकमास के कारण ऐसा नहीं होगा। इस बार एक माह देरी से यानी 17 अक्टूबर से नवरात्रि प्रारंभ हो रहा है।

महालय अमावस्या पितृ पक्ष का आखिरी दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन माह की अमावस्या को महालय अमावस्या कहते हैं। इसे सर्व पितृ अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या एवं मोक्षदायिनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। इस बार महालय अमावस्या की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्रि आरंभ नहीं हो सकेगा। आमतौर पर महालय अमावस्या के अगले दिन प्रतिपदा पर शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाते हैं। लेकिन इस बार अधिकमास के कारण नवरात्रि पितृपक्ष की समाप्ति के एक महीने बाद आरंभ होगा। इस तरह का संयोग 19 साल पहले 2001 में बना था जब पितृपक्ष के समाप्ति के एक महीने बाद नवरात्रि शुरू हुआ। अधिक मास 18 सितंबर से शुरू हो रहा है जो 16 अक्टूबर को समाप्त होगा।

00 महालय अमावस्या का महत्व
शास्त्रों में महालय अमावस्या का बड़ा महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती है उन पितरों का श्राद्ध कर्म हिमालय अमावस्या के दिन किया दाता है। इस दिन अपने पूर्वजों को याद और उनके प्रति श्रद्धा भाव दिखाने का समय होता है। पितृपक्ष के दौरान पितृलोक से पितरदेव धरती अपने प्रियजनों के पास किसी न किसी रूप में आते हैं। ऐसे में जो लोग इस धरती पर जीवित है वे अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पितृपक्ष में उनका तर्पण करते हैं।
`महालय` शब्द का अर्थ है आनन्दनिकेतन। प्राचीन काल से मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आश्विन कृष्णा पंचदशी यानी अमावस्या तक प्रेतलोक से पितृपुरुषों की आत्माएं मर्त्यलोक यानी धरती पर आती हैं, अपने प्रियजनों की माया में। महालया के दिन पितृ लोगों आना संपूर्ण होता है। गरूड़पुराण, वायुपुराण,अग्निपुराण आदि शास्त्रों के अनुसार:

आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं श्रियम्।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।।
पितरों की कृपा बिना कुछ संभव नहीं है। उन्हें नमन कीजिए, उनकी स्तुति कीजिए। बाधारहित जीवन का मार्ग वे स्वयं प्रशस्त कर देंगे। अतः अपने पितरों को तिलांजलि के साथ-साथ श्रद्धाजंलि करने से पितरों का विशेष आशीर्वाद मिलता है। पितरों की प्रसन्नता से गृहस्थ को दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी,पशुधन, सुख-साधन तथा धन-धान्यादि की प्राप्ति होती है। आलय इस दिन मह (अर्थात् आनंद) मय हो उठता है।

महालया से पितृ पक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष की शुरुआत मानी जाती है। दुर्गतिनाशिनी, दशप्रहरणधारिणी, महाशक्ति स्वरूपिणी मां दुर्गा का आगमन होता है। एक वर्ष बाद मां के धरती पर आने की सूचना पाकर सभी लोग उत्साह व खुशी से झूम उठते हैं। क्योंकि मां के आगमन से सभी अमंगल का विनाश होता है, ऐश्वर्य, धन, सौंदर्य, सौभाग्य, कीर्ति, विद्या, बल, आयु, संतान, सुलक्षणा पत्नी, सुयोग्य पति, स्वर्ग, मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्रीदुर्गासप्तशती में कहा गया है :

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ।।
मां, तुम प्रसन्न होनेपर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।

00 दस विद्याओं के रूप में वरदायिनी हैं मां दुर्गा
मां दुर्गा की पूजा के संबंध में शाक्ततंत्रों में कहा गया है कि मानव जीवन समस्या एवं संकटों की सत्यकथा है। अतः सांसारिक कष्टों के दलदल में फंसे मनुष्यों को मां दुर्गा की उपासना करनी चाहिए। वह आद्याशक्ति एकमेव एवं अद्वितीय होते हुए भी अपने भक्तों को काली, तारा, षोड़शी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मांतगी एवं कमला- इन दस महाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती हैं. और वही जगन्माता अपने भक्तों के दुःख दूर करने के लिए शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री- इन नवदुर्गाओं के रूप में अवतरित होती है. सत्व,रजस्, तमस्- इन तीन गुणों के आधार पर वह महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के नाम से लोक में प्रसिद्ध हैं।

00 आज पितरों को दें श्रद्धांजलि
गुरुवार को दोपहर बाद 4.56 तक अमावस्या रहेगी। जिन पितरों की मृत्युतिथि ज्ञात न हो उन सबका श्राद्ध इस दिन होगा। जो लोग पितृपक्ष के 14 दिनों तक श्राद्ध-तर्पण आदि नहीं कर पाते हैं, वे महालया के दिन ही श्राद्ध करते हैं।

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18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक रहेगा अधिकमास, जानिए क्या है इसका महत्व

Date : 17-Sep-2020

 तीन साल में एक बार आने वाला भगवान विष्णु का प्रिय अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास इस बार 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक रहेगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास का आधार सूर्य और चंद्रमा की चाल से है। सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। इन दोनों वर्षों के बीच 11 दिनों का अंतर होता है और यही अंतर तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास आता है व इसी को मलमास कहा जाता है। अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। शास्त्रों में इस मास में भगवान विष्णु का पूजन कई गुना फलदाई बताया गया है।

00 अधिक मास में शालिग्राम के पूजन का महत्व
प्राचीन धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में विष्णु स्वरुप शालिग्राम के साथ महालक्ष्मी स्वरूपा श्री-यंत्र का पूजन सयुंक्त रूप से करने का काफी महत्व बताया गया है। पुराणों में शालिग्राम को ब्रह्माण्डभूत नारायण का प्रतीक माना जाता है। पदम पुराण के अनुसार जो शालिग्राम का दर्शन करता है उसे मस्तक झुकाता, स्नान कराता और पूजन करता है वह कोटि यज्ञों के समान पुण्य तथा कोटि गोदानों का फल पाता है। इनके स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन और प्रणाम करने पर अनेक पाप दूर हो जाते हैं। जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी होते हैं। वहां भगवान श्रीहरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं।

पदमपुराण के अनुसार जहां शालिग्राम शिलारुपी भगवान केशव विराजमान हैं वहां सम्पूर्ण देवता, असुर, यक्ष तथा चौदह भुवन मौजूद हैं। जो शालिग्राम शिला के जल से अपना अभिषेक करता है,उसे सम्पूर्ण तीर्थों में स्न्नान के बराबर और समस्त यज्ञों को करने समान ही फल प्राप्त होता है। शिवजी ने बताया शालिग्राम की महिमा भगवान कार्तिकेय के पूछने पर भगवान शिव ने शालिग्राम की महिमा का गान करते हुए कहा है कि करोड़ों कमल पुष्पों से मेरी पूजा करने पर जो फल प्राप्त होता है वही शालिग्राम शिला के पूजन से कोटि गुना होकर मिलता है। मेरे कोटि-कोटि लिंगों का दर्शन, पूजन और स्तवन करने से जो फल मिलता है वह एक ही शालिग्राम के पूजन से प्राप्त हो जाता है। जहां इनका पूजन होता है वहां पर किया हुआ दान, स्नान काशी से सौ गुना अधिक फल देने वाला माना गया है। शालिग्राम को अर्पित किया हुआ थोड़ा सा तुलसीपत्र, पुष्प, फल, जल, मूल और दूर्वादल भी मेरुपर्वत के समान महान फल देने वाला होता है।

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समृद्धि और कारोबार में वृद्धि चाहिए तो विधि विधान से कीजिये भगवान विश्वकर्मा का पूजन

Date : 16-Sep-2020

रायपुर। भगवान विश्‍वकर्मा के जन्‍मदिन को विश्‍वकर्मा जयंती के नाम से जाना जाता है। इस दिन हिंदू धर्म के लोग अपने कार्य स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की विशेष पूजा अर्चना करते हैं।  हर साल कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा की जाती है। विश्वकर्मा जयंती पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कारोबार में वृद्धि होती है। धन-धान्य और सुख-समृद्धि के लिए भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है। आइए जानें राशि अनुसार विश्वकर्मा पूजन में क्या करें। भगवान विश्वकर्मा यंत्रों के देवता हैं। विश्वकर्मा पूजा का कारोबारियों के लिए विशेष महत्व रखता है।

क्या है पूजा महत्व :-
विश्वकर्मा की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि उन्हें पहला वास्तुकार माना गया था, मान्यता है कि हर साल लोहे और मशीनों की पूजा करते हैं तो वो जल्दी खराब नहीं होते है। मशीनें अच्छी चलती हैं क्योंकि भगवान उनपर अपनी कृपा बनाकर रखते है। विश्वकर्मा जयंती भारत के कई हिस्से में बेहद धूम धाम से मनाया जाता है।

पूजा विधि :-
विश्वकर्मा जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके श्वेत वस्त्र पहनकर तैयार हो जाए।
निर्धारित पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की फोटो या मूर्ति स्थापित करें।
पीले ये सफेद फूलों की माला भगवान विश्वकर्मा को पहनावें।
सुगंधित धूप और दीपक भी जलावें।
अपने सभी औजारों की एक-एक करके विधिवत पूजा करें।
भगवान विश्वकर्मा को पंचमेवा प्रसाद का भोग लगाएं।
हाथ में फूल और अक्षत लेकर शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा देव का ध्यान करें।
अब भगवान विश्‍वकर्मा को फूल चढ़ाकर आशीर्वाद ले। 
अंत में भगवान विश्‍वकर्मा की आरती कर ले।

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सूर्य करेंगे राशि परिवर्तन, कन्या राशि में प्रवेश कहलाती है कन्या संक्रांति

Date : 16-Sep-2020

रायपुर। कन्या राशि में सूर्यदेव का प्रवेश कन्या संक्रांति के नाम से जाना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार 12 राशियां हैं और जब भी सूर्यदेव एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं तो उस राशि की संक्रांति आरंभ हो जाती है। संक्रांति का पुण्यकाल बेहद विशेष माना जाता है। सूर्य का प्रत्येक माह राशि में परिवर्तन करना संक्रांति कहलाता है और इस संक्रांति को स्नान, दान और पितरों के तर्पण आदि के लिए शुभ माना जाता है। आज सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश कर रहे हैं। ज्योतिष में सूर्य की इस घटना को कन्या संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

कन्या संक्रांति भी अपने आप में विशेष है। कन्या संक्रांति के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की उपासना की जाती है। भगवान विश्वकर्मा की उपासना से कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। कार्यक्षेत्र और व्यापार में आने वाली परेशानियां दूर हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति को सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त हो जाए तो उसे समाज में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और सरकारी नौकरी आदि प्राप्त होती है।

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अगर आपके घर हैं मनिप्लांट का पौधा तो शुक्रवार को करें ये काम

Date : 11-Sep-2020

आम तौर पर सभी लोगों के घरों में या फिर घर के बाहर आपको मनी प्लांट का पौधा लगा हुआ दिख जाएगा। मनी प्लांट के पौधे को घर की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता के मुताबिक जिसके भी घर में यह पौधा होता है उसके घर में धन से संबंधित परेशानियां नहीं आता हैं।
लेकिन कई बार इसके उलट भी देखा जाता है। कभी कभी ऐसा भी देखा जाता है कि जिनके घर में यह पौधा लगा है उनके घर में भी घन से संबंधी परेशानियां बनी रहती है। यानी घर में लगे मनी प्लॉट का कोई फायदा नहीं होता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मनीमनी प्लांट होने के बाद भी आखिर घन की परेशानियां लगातार क्यों बनी रहती है।

00 ऐसे घर में होगी पैसों की बारिश.
माना जाता है कि जिसके घर में मनी प्लांट का पौधा जितना आगे बढ़ता है उनके घर में उतना धन आता है। लेकिन हमें मनी प्लांट के पौधे को लगाने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। इसका रख रखाव ठीक से होना चाहिए और इसे घर में सही तरीके से साफ-सुथरी जगह पर ही लगाना चाहिए। ऐसा करने से घर बरकत आती है।
मान्यता के मुताबिक शुक्रवार के दिन मनी प्लांट के ऊपर लाल रंग का धागा या फिर रिबन बांधना शुभ माना जाता है। दरअसल लाल रंग को प्रेम, स्नेह, उन्नति और यश का प्रतिक माना जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि लंल रंग के रिंबन से पौधे को बांधने से घर में साकात्मकता आती हैं। इस साकात्मकता के कारण घर में मां लक्ष्मी का प्रवेश होता है।

00 ऐसे बांधे लाल धागा या रिबन...
शुक्रवार के दिन सुबह जल्दी उठे और नहा धोकर मां लक्ष्मी की पूजा करें
- उनके सामने घर की दीया जलाएं
- लाल रंग का धागा या रिबन को मां लक्ष्मी के पैरों में रखे
- फिर मां लक्ष्मी की आरती करके इस लाल धागे या रिबन पर कुमकुम लगाएं
- मां लक्ष्मी का ध्यान करके मनी प्लांट की जड़ों में चारों ओर इसे बांध दे
- यदि बोतल में मनी प्लांट तो बोतल में नीचे की और इस लाल धंगे को बाधें
इसे बांधने के बाद ही आपको कुछ दिन में अंतर दिखने लगेगा। घर में मां लक्ष्मी का प्रवेश होगा, धन की बरसात होने लगेगी।

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आज है जितिया का नहाए खाए, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Date : 09-Sep-2020

रायपुर। जितिया का व्रत आज से शुरू हो रहा है। आज नहाए खाए है। तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत का मुख्य पूजा 10 सितंबर को है। इसे जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, सेहत और सुखमयी जीवन के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत की शुरुआत सप्तमी से नहाय-खाय के साथ हो जाती है और नवमी को पारण के साथ इसका समापन होता है।
तीज की तरह जितिया व्रत भी बिना आहार और निर्जला किया जाता है। छठ पर्व की तरह जितिया व्रत पर भी नहाय-खाय की परंपरा होती है। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है। सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के बाद अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नत के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद नवमी तिथि यानी अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है यानी व्रत खोला जाता है।
ऐसी मान्यता है कि जो महिलाएं जितिया व्रत को रखती हैं उनके बच्चों के जीवन में सुख शांति बनी रहती है और उन्हें संतान वियोग नहीं सहना पड़ता। इस दिन महिलाएं पितृों का पूजन कर उनकी लंबी आयु की भी कामना करती हैं। इस व्रत में माता जीवित्पुत्रिका और राजा जीमूतवाहन दोनों पूजा एवं पुत्रों की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना की जाती है। सूर्य को अर्घ्‍य देने के बाद ही कुछ खाया पिया जाता है। इस व्रत में तीसरे दिन भात, मरुवा की रोटी और नोनी का साग खाए जानें की परंपरा है।
जितिया व्रत की कथा के अनुसार यह माना जाता है कि इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण व्रती स्त्रियों की संतानों की रक्षा करते हैं।
00 जितिया व्रत का महत्व
एक समय की बात है, एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी। उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वहीं लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था। चील के संतानों और उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची, लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची। इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता हैं।
00 प्राचीण मान्यता
जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं। महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवों के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगों को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी।
उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था।
उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तभी से संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल जितिया व्रत रखने की परंपरा को निभाया जाता है।

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165 साल बाद बना ऐसा संयोग, अधिकमास के कारण पितृपक्ष के 1 महीने बाद आएगी नवरात्रि

Date : 30-Aug-2020

रायपुर । हर साल पितृ पक्ष के समापन के अगले दिन से नवरात्र का आरंभ हो जाता है और घट स्‍थापना के साथ 9 दिनों तक नवरात्र की पूजा होती है। यानी पितृ अमावस्‍या के अगले दिन से प्रतिपदा के साथ शारदीय नवरात्र का आरंभ हो जाता है जो कि इस साल नहीं होगा। इस बार श्राद्ध पक्ष समाप्‍त होते ही अधिकमास लग जाएगा। अधिकमास लगने से नवरात्र और पितृपक्ष के बीच एक महीने का अंतर आ जाएगा। आश्विन मास में मलमास लगना और एक महीने के अंतर पर दुर्गा पूजा आरंभ होना ऐसा संयोग करीब 165 साल बाद होने जा रहा है।
लीप वर्ष होने के कारण ऐसा हो रहा है। इसलिए इस बार चातुर्मास जो हमेशा चार महीने का होता है, इस बार पांच महीने का होगा। ज्योतिष की मानें तो 160 साल बाद लीप ईयर और अधिकमास दोनों ही एक साल में हो रहे हैं। चातुर्मास लगने से विवाह, मुंडन, कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इस काल में पूजन पाठ, व्रत उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान देव सो जाते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद ही देव जागृत होते हैं।
इस साल 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे। इसके अगले दिन अधिकमास शुरू हो जाएगा, जो 16 अक्टूबर तक चलेगा। इसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि व्रत रखे जाएंगे। इसके बाद 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी होगी। जिसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होंगे। इसके बाद ही शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि शुरू होंगे।
पंचांग के अनुसार इस साल आश्विन माह का अधिकमास होगा। यानी दो आश्विन मास होंगे। आश्विन मास में श्राद्ध और नवरात्रि, दशहरा जैसे त्योहार होते हैं। अधिकमास लगने के कारण इस बार दशहरा 26 अक्टूबर को दीपावली भी काफी बाद में 14 नवंबर को मनाई जाएगी।
00 क्‍या होता है अधिक मास?
एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास का नाम दिया गया है।
अधिकमास को कुछ स्‍थानों पर मलमास भी कहते हैं। दरअसल इसकी वजह यह है कि इस पूरे महीने में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस पूरे माह में सूर्य संक्रांति न होने के कारण यह महीना मलिन मान लिया जाता है। इस कारण लोग इसे मलमास भी कहते हैं। मलमास में विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश जैसे कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
पौराणिक मान्‍यताओं में बताया गया है कि मलिनमास होने के कारण कोई भी देवता इस माह में अपनी पूजा नहीं करवाना चाहते थे और कोई भी इस माह के देवता नहीं बनना चाहते थे, तब मलमास ने स्‍वयं श्रीहरि से उन्‍हें स्‍वीकार करने का निवेदन किया। तब श्रीहर‍ि ने इस महीने को अपना नाम दिया पुरुषोत्‍तम। तब से इस महीने को पुरुषोत्‍तम मास भी कहा fजाता है। इस महीने में भागवत कथा सुनने और प्रवचन सुनने का विशेष महत्‍व माना गया है। साथ ही दान पुण्‍य करने से आपके लिए मोक्ष के द्वार खुलते हैं।

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जानें क्या है गणेश विसर्जन की विधि व मुहूर्त

Date : 29-Aug-2020

रायपुर । गणेश जी के विसर्जन की तैयारियां आरंभ हो गई हैं। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी को घर में लाया जाता है। उनकी पूजा की जाती है और गणेश जी को प्रिय चीजों का भोग लगाया जाता है। 10 दिन तक गणेश जी को घर में रखने के बाद 11 वें दिन बप्पा को भक्तिभाव से विदाई दी जाती है। दस दिन तक चलने वाले गणेश महोत्सव का इस दिन समापन हो जाता है।
00 गणपति बप्पा विघ्नहर्ता हैं
गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है। जिस घर में गणेश जी की पूजा होती है और गणेश महोत्सव के दौरान नित्य पूजा पाठ और अनुष्ठान किया जाता हैं वहां पर गणेश जी का विशेष आर्शीवाद प्राप्त होता है। गणेश जी बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि के दाता हैं, इसलिए जो भी सच्चे मन से गणेश जी की आराधना करता है उसपर गणेश जी की विशेष कृपा होती है।
00 अनंत चतुर्दशी को दी जाएगी गणपति बप्पा को विदाई
पंचांग के अनुसार अनंत चतुर्दशी 1 सितंबर को है। इस दिन से पितृ पक्ष का भी आरंभ हो रहा है। अनंत चतुर्दशी पर गणेश जी का विसर्जन करने की परंपरा है। इस दिन गणेश जी का विधि पूर्वक विसर्जन करना चाहिए। गणेश जी का आर्शीवाद मिलने से घर में सुख और समृद्धि आती है। जिस प्रकार से गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की विधि पूर्वक स्थापना की जाती है उसी प्रकार से विसर्जन के दौरान भी विधि विधान का पालन करना चाहिए।
गणेश विसर्जन 1 सितंबर को अनंत चतुर्दशी की तिथि है। इस दिन सुबह स्नान करने के बाद गणेश जी की पूजा करें और गणेश जी को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाएं। पूजा के दौरान गणेश मंत्र और गणेश आरती का पाठ जरुर करें। पूजा से पूर्व स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं।
00 गणेश विसर्जन का शुभ मुहूर्त
प्रात:काल का मुहूर्त: सुबह 9:10 बजे से दोपहर 1:56 बजे तक
गणेश विसर्जन का दोपहर का मुहूर्त: दोपहर 3:32 बजे से सांय 5:07 बजे तक
गणेश विसर्जन का शाम का मुहूर्त: शाम 8:07 बजे से 9:32 बजे तक
गणेश विसर्जन का रात्रिकाल मुहूर्त: रात्रि 10:56 बजे से सुबह 3:10 बजे तक है।

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हरतालिका तीज पूजा विधि

Date : 21-Aug-2020

1. सुबह जल्दी उठें और स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।

2. अब बालू रेत से भगवान गणेश, शिव जी और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं। 

3. एक चौकी पर अक्षत (चावल) से अष्टदल कमल की आकृति बनाएं।

4. एक कलश में जल भरकर उसमें सुपारी, अक्षत, सिक्के डालें।

5. उस कलश की स्थापना अष्टदल कमल की आकृति पर करें।

6. कलश के ऊपर आम के पत्ते लगाकर नारियल रखें। 

7. चौकी पर पान के पत्तों पर चावल रखें।

8. माता पार्वती, गणेश जी, और भगवान शिव को तिलक लगाएं। 

9. घी का दीपक, धूप जलाएं।

10. उसके बाद भगवान शिव को उनके प्रिय बेलपत्र धतूरा भांग शमी के पत्ते आदि अर्पित करें।

11. माता पार्वती को फूल माला चढ़ाएं गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें।

12. भगवान गणेश, माता पार्वती को पीले चावल और शिव जी को सफेद चावल अर्पित करें ।

13. पार्वती जी को श्रंगार का सामान भी अवश्य अर्पित करें।

14. भगवान शिव औऱ गणेश जी को जनेऊ अर्पित करें। और देवताओं को कलावा (मौली) चढ़ाएं।

15. हरितालिका तीज की कथा सुनें।
 
16. पूरी पूजा विधिवत् कर लेने के बाद अंत में मिष्ठान आदि का भोग लगाएं और आरती करें।  

 चंद्रमा को अघ्र्य देने की विधि 

 कजरी तीज पर संध्या को पूजा करने के बाद चंद्रमा को अध्र्य दिया जाता है। फिर उन्हें भी रोली, अक्षत और मौली अर्पित करें। चांदी की अंगूठी और गेंहू के दानों को हाथ में लेकर चंद्रमा के अध्र्य देते हुए अपने स्थान पर खड़े होकर परिक्रमा करें। 

हरतालिका तीज व्रत कथा 

एक बार भगवान शिव ने माँ पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। 

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी..! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया। तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

 ????नारदजी ने कहा- गिरिराज..! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे। तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा । तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

 उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब मैं 'तथास्तुÓ कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रात: होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे। गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

 हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए ।

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तीज त्यौहार में इन ​चीजों को करे शामिल, कर्नाटक व तमिलनाडु में गौरीहब्बा के नाम से जाना जाता है

Date : 18-Aug-2020

रायपुर। हरतालिका तीज का त्यौहार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु में हरतालिका तीज को गौरी हब्बा के नाम से जाना जाता है और माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में पूजा जाता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला रहकर अगले दिन व्रत का पारण करती हैं। सबसे पहले इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इनके बिना हरतालिका तीज की पूजा अधूरी मानी जाती है।

हरतालिका तीज की पूजा में शामिल करें ये सभी चीजें : 

लकड़ी का पटला, भगवान शिव और पार्वती की मूर्ति , रखने के लिए प्लेट, लकड़ी के पटले पर बिछाने के लिए लाल कपड़ा, नारियल, कलश (पानी से भरा हुआ), आम के पत्ते, घी, दीपक, धूप , अगरबत्ती, कपूर, पान के पत्ते, सुपारी, केला, बेलपत्र, धतूरा, शमी की पत्तियां, जनेऊ, चंदन, माता के लिए चुनरी, सुहाग का सामान, मेंहदी, काजल सिंदूर, चूडिय़ां, बिंदी, गौर बनाने के लिए मिट्टी और पंचामृत, दक्षिणा।

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