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जानें क्यों मनाया जाता है गोपाष्टमी, भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा और पूजा विधि

Date : 22-Nov-2020

कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गौ-चारण लीला आरंभ की थी।

कैसे करें गोपाष्टमी पूजन, पढ़ें विधि :-

इस दिन बछड़े सहित गाय का पूजन करने का विधान है। इस दिन प्रातः काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो कर स्नान करते है, प्रातः काल ही गौओं और उनके बछड़ों को भी स्नान कराया जाता है।

गौ माता के अंगों में मेहंदी, रोली हल्दी आदि के थापे लगाए जाते हैं, गायों को सजाया जाता है, प्रातः काल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ माता की पूजा की जाती है और आरती उतारी जाती है। पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है।
श्री कृष्ण की गौ-चारण लीला की पौराणिक कथा:-

भगवान ने जब छठे वर्ष की आयु में प्रवेश किया तब एक दिन भगवान माता यशोदा से बोले- मैय्या अब हम बड़े हो गए हैं....

मैय्या यशोदा बोली- अच्छा लल्ला अब तुम बड़े हो गए हो तो बताओ अब क्या करें...

भगवान ने कहा- अब हम बछड़े चराने नहीं जाएंगे, अब हम गाय चराएंगे...

मैय्या ने कहा- ठीक है बाबा से पूछ लेना। मैय्या के इतना कहते ही झट से भगवान नंद बाबा से पूछने पहुंच गए...
बाबा ने कहा- लाला अभी तुम बहुत छोटे हो अभी तुम बछड़े ही चराओ..

भगवान ने कहा- बाबा अब मैं बछड़े नहीं गाय ही चराऊंगा...

जब भगवान नहीं माने तब बाबा बोले- ठीक है लाल तुम पंडित जी को बुला लाओ- वह गौ चारण का मुहूर्त देख कर बता देंगे...

बाबा की बात सुनकर भगवान झट से पंडित जी के पास पहुंचे और बोले- पंडित जी, आपको बाबा ने बुलाया है, गौ चारण का मुहूर्त देखना है, आप आज ही का मुहूर्त बता देना मैं आपको बहुत सारा माखन दूंगा...

पंडित जी नंद बाबा के पास पहुंचे और बार-बार पंचांग देख कर गणना करने लगे तब नंद बाबा ने पूछा, पंडित जी के बात है ? आप बार-बार क्या गिन रहे हैं? पंडित जी बोले, क्या बताएं नंदबाबा जी केवल आज का ही मुहूर्त निकल रहा है, इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त नहीं है... पंडित जी की बात सुन कर नंदबाबा ने भगवान को गौ चारण की स्वीकृति दे दी।

भगवान जो समय कोई कार्य करें वही शुभ-मुहूर्त बन जाता है। उसी दिन भगवान ने गौ चारण आरंभ किया और वह शुभ तिथि थी कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष अष्टमी, भगवान के गौ-चारण आरंभ करने के कारण यह तिथि गोपाष्टमी कहलाई।

माता यशोदा ने अपने लल्ला के श्रृंगार किया और जैसे ही पैरों में जूतियां पहनाने लगी तो लल्ला ने मना कर दिया और बोले मैय्या यदि मेरी गौएं जूतियां नहीं पहनती तो मैं कैसे पहन सकता हूं। यदि पहना सकती हो तो उन सभी को भी जूतियां पहना दो... और भगवान जब तक वृंदावन में रहे, भगवान ने कभी पैरों में जूतियां नहीं पहनी। आगे-आगे गाय और उनके पीछे बांसुरी बजाते भगवान उनके पीछे बलराम और श्री कृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वाल-गोपाल इस प्रकार से विहार करते हुए भगवान ने उस वन में प्रवेश किया तब से भगवान की गौ-चारण लीला का आरंभ हुआ।

जब भगवान गौएं चराते हुए वृंदावन जाते तब उनके चरणों से वृंदावन की भूमि अत्यंत पावन हो जाती, वह वन गौओं के लिए हरी-भरी घास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान बन गया था।

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जानिएं गौ सेवा पूजा से क्या होता है लाभ

Date : 22-Nov-2020

गौमाता के पीठ पर हाथ फेरने से कई बाधाएं दूर होती है।

गौ रक्षा और गौमाता का हमारे जीवन में बहुत ही महत्त्व है। गौमाता की शरीर के सभी अंगों के धार्मिक महत्व और उससे लोगों फायदे जैसे अगर किसी व्यक्ति को बुरी नजर लग जाए तो सिर पर गौमाता के पूंछ से झाड़ा लगाने से बुरी नजर उतर जाती है।

शास्त्र के अनुसार गौमाता जिस जगह खड़ी होकर आनंदपूर्वक चैन की सांस लेती है उस जगह की वास्तुदोष समाप्त हो जाते हैं।

गौ माता में 33 कोटि (33 प्रकार के) देवी-देवताओं का वास होता है। गौ माता के गले में बंधी घंटी बजने से गौ की आरती करने का पुण्य लाभ होता है।

जो व्यक्ति गौमाता की सेवा पूजा करता है, उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौमाता हर लेती है। गौमाता की (बैल) के खुर में नागदेवता का वास होता है। जहां गौमाता विचरण करती है, उस जगह सांप बिच्छू नहीं आते।

पहले के समय में बैलों से खेत जुताई किया जाता था इसी कारण खेतों में उपज के साथ-साथ सांप-बिच्छु भी ना के बराबर में देखने मिलता था।

गौमाता के गोबर में लक्ष्मीजी का वास होता है और गौमाता मूत्र में गंगाजी का वास होता है।

गौ माता के गोबर से बने उपलों (कण्डे) की धूप से दुकान, घर और मंदिर का वातावरण शुद्ध होता है। गौ माता के एक आंख में सूर्य व दूसरी आंख में चन्द्र देव का वास होता है। गौमाता अन्नपूर्णा देवी है। कामधेनू है। मनोकामना पूर्ण करने वाली है।

गौमाता को चारा खिलाने से तैंतीस कोटि देवी-देवताओं को भोग लगाने का पुण्य लाभ होता है। गौ माता से ही मनुष्यों के गौत्र की स्थापना हुई है।

गौमाता के पंचगव्य के बिना पूजा-पाठ व हवन सफल नहीं होते हैं। तन-मन-धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है। वो वैतरणी सहज ही पार कर जाता है। उन्हें गौ लोकधाम में वास मिलता है।

जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा बदलना हो वे अपनी हथेली में गुड़ रखकर गौमाता को जीभ से चटायें तो उसकी भाग्य रेखा बदल जाएगी।

काली गाय की पूजा करने से नवग्रह शांत रहते हैं। जो ध्यानपूर्वक गौ पूजन करता है, उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है।

ग्रहबाधा, पितृदोष, टोटके आदि किसी कारण से आप परेशान हैं… और आपका कार्य सफल नहीं हो रहा है तो डरने की कोई बात नहीं आप कुछ दिन 1 से 2 साल तक कि बछिया को गुड़ खिलाते हुए दाहिने कान में अपना संकल्प (जिसे करना चाहते है वह बोल दें) कुछ दिन में ही आपका कार्य पूर्ण हो जाये…

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धनतेरस : सोना-चांदी खरीदारी करने का क्या है शुभ मुहूर्त

Date : 12-Nov-2020

रायपुर। पांच दिन चलने वाले दिवाली के महापर्व का आगाज धनतेरस से होता है। धनतेरस के पर्व पर माता लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और भगवान कुबेर की पूजा का विधान है। इस पर्व को धन-धान्य और सुख समृद्धि में वृद्धि करने वाला माना जाता है। धनतेरस का पर्व कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है।

00 सोना-चांदी खरीदने का शुभ मुहूर्त
धनतेरस के पर्व पर सोना-चांदी और बर्तन खरीदना काफी शुभ माना जाता है. बता दें कि इस दिन सोना-चांदी भी विशेष मुहुर्त में खरीदा जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस साल धनतेरस (13 नवंबर) पर सुबह 6 बजकर 42 मिनट से शाम के 5 बजकर 59 मिनट तक सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त है। यानी 11 घंटे 16 मिनट की अवधि सोना खरीदने के लिए शुभ है। इस शुभ समय पर सोना खरीदने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। ये भी माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में खरीदारी करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है। जिसकी वजह से धन में 13 गुणा की वृद्धि होती है।

00 सोना-चांदी खरीदने के पीछे है पौराणिक कथा
धनतेरस पर सोना खरीदना काफी शुभ माना गया है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। बताया जाता है कि हिम नाम का एक राजा हुआ करता था, उसके बेटे को श्राप मिला था कि विवाह के चौथे दिन ही उसकी मौत हो जाएगी। एक राजकुमारी, राजा हिम के बेटे से प्रेम करती थी। जब उसे ज्ञात हुआ कि जिसके साथ वह शादी करना चाहती है उसकी मृत्यु हो जाएगी तो उसने शादी तो की लेकिन चौथे दिन पति को जागते रहने के लिए कहा। पति सो न जाए इसलिए वह पूरी रात जागकर उसे कहानियां और गीत सुनाती रही। उसने घर के दरवाजे पर सोना-चांदी और बहुत सारे आभूषण भी रखे और दिए भी जला दिए।

वहीं श्राप के अनुसार जब मृत्यु के देवता यमराज सांप का रूप धर कर हिम के बेटे को डसने के लिए आए तो चारों तरफ चमक-धमक देखकर अंधे हो गए और वह घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाये। वह आभूषणों के ऊपर ही विराजमान होकर कहानी और गीत सुनने लगे। देखते ही देखते रात बीत गई और सुबह हो गई और इसी के साथ राजकुमार की मृत्यु की घड़ी भी बीत गई। इस तरह यमराज को राजकुमार के प्राण लिए बिना वापस लौटना पड़ा। कहा जाता है कि तभी से धनतेरस के पर्व पर सोना चांदी खरीदने की परंपरा चली आ रही है। दरअसल माना जाता है कि ऐसा करने से अशुभ चीजें और नकारात्मक उर्जा घर के अंदर प्रवेश नहीं करती है।

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धनतेरस से भाई दूज तक के शुभ मुहूर्त

Date : 12-Nov-2020

धनतेरस:

धनवंतरी को दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है। यह त्यौहार इस वर्ष 13 नवंबर शुक्रवार को मनाया जाएगा। धनतेरस का मुहूर्त शाम 5 बजकर 34 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 1 मिनट तक है। इस दिन प्रदोष काल शाम 5 बजकर 28 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 7 मिनट तक है। वृषभ काल मुहूर्त शाम 5 बजकर 34 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 29 मिनट तक है।

छोटी दिवाली:

नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली, मुख्य त्यौहार से एक दिन पहले मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने की चतुर्दशी तिथि पर छोटी दिवाली मनाई जाती है। इस दिन को नरक चौदस या रूप चौदस भी कहा जाता है। यह त्यौहार 14 नवंबर शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन अभयदान (दीवाली स्नान अनुष्ठान) का शुभ समय सुबह 5:23 से शुरू होकर 6:43 बजे तक का है।

दिवाली:

यह त्यौहार भी इस वर्ष 14 नवंबर शनिवार को मनाया जाएगा। दिवाली के शुभ मुहूर्त की बात करें तो लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त शाम 5 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 25 मिनट तक का है। प्रदोष काल मुहूर्त शाम 5 बजकर 27 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। वृषभ काल मुहूर्त शाम 5 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 25 मिनट तक है।

गोवर्धन पूजा:

गोवर्धन पूजा अमावस्या को की जाती है। इस वर्ष गोवर्धन पूजान 15 नवंबर रविवार को की जाएगी। इस दिन भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर भगवान इंद्र को हराया था। हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। गोवर्धन पूजा का सायंकाल मुहूर्त दोपहर 3 बजकर 18 मिनट से लेकर 15:18:37 से शाम 5 बजकर 27 मिनट तक है।

भाई दूज:

16नवंबर सोमवार
भाई दूज या भैया दूज को भाई टीका, यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया आदि भी कहा जाता है। इसे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व के शुभ मुहूर्त की बात करें तो भाई दूज के तिलक का समय दोपहर 1 बजकर 10 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 18 मिनट तक रहेगा।

जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं

अंक ज्योतिष के अनुसार आपका मूलांक तीन आता है। यह बृहस्पति का प्रतिनिधि अंक है। ऐसे व्यक्ति निष्कपट, दयालु एवं उच्च तार्किक क्षमता वाले होते हैं। अनुशासनप्रिय होने के कारण कभी-कभी आप तानाशाह भी बन जाते हैं। आप दार्शनिक स्वभाव के होने के बावजूद एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति रखते हैं। आपकी शिक्षा के क्षेत्र में पकड़ मजबूत होगी। आप एक सामाजिक प्राणी हैं। आप सदैव परिपूर्णता या कहें कि परफेक्शन की तलाश में रहते हैं यही वजह है कि अकसर अव्यवस्थाओं के कारण तनाव में रहते हैं।

शुभ दिनांक : 3, 12, 21, 30

शुभ अंक : 1, 3, 6, 7, 9

शुभ वर्ष : 2022 2028, 2030, 2031, 2034, 2043, 2049, 2052

ईष्टदेव : देवी सरस्वती, देवगुरु बृहस्पति, भगवान विष्णु

शुभ रंग : पीला, सुनहरा और गुलाबी

कैसा रहेगा यह वर्ष

यह वर्ष आपके लिए अत्यंत सुखद है। किसी विशेष परीक्षा में सफलता मिल सकती है। नौकरीपेशा के लिए प्रतिभा के बल पर उत्तम सफलता का है। नवीन व्यापार की योजना भी बन सकती है। दांपत्य जीवन में सुखद स्थिति रहेगी। घर या परिवार में शुभ कार्य होंगे। मित्र वर्ग का सहयोग सुखद रहेगा। शत्रु वर्ग प्रभावहीन होंगे। महत्वपूर्ण कार्य से यात्रा के योग भी है

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धनतेरस उत्सव पूजन : धनतेरस की सुबह क्या करें ?

Date : 11-Nov-2020

 सूर्य

भगवान को अर्घ्य : भगवान सूर्य को निरोगता की कामना कर लाल फ़ूल डालकर अर्घ्य दें

भगवान घन्वन्तरि की पूजा : सुबह उठकर  स्नान के पश्चात्‌ स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान धन्वतरि
की पूजा कर स्वस्थ जीवन के लिए प्रार्थना करें | यदि धन्‍वतरिजी का चित्र उपलब्ध न हो तो भगवान विष्णु की प्रतिमा में धन्वतरिजी की भावना कर उनकी पूजा करें |

दक्षिणावर्ती शंख की पूजा :

साधक अपने स्रामने गुरुदेव व लक्ष्मीजी के फोटो रखे तथा उनके सामने लाल रंग का ????????वस्त्र बिछाकर उस्र पर दक्षिणावर्ती शंख रख दे | उस पर केसर से सतिया बना लें तथा

 कुमकुम से तिलक कर दें, बाद में स्फ़टिक की माला से मंत्र की 7 मालाएँ करें । तीन दिन तक ऐसा करना योग्य हैं | इतने से ही मंत्र साधना सिद्ध हो जाती है |

"ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नम: ।"

 मंत्रजप पूरा होने के बाद लाल वस्त्र में शंख को बाँधकर घर में रख दें | कहते हैं - जब तक वह शंख घर में रहेगा, तब तक घर में निरंतर  उन्नति होती रहेगी |

 

 धनतेरस के दिन हल्दी और चावल पीसकर उसके घोल से घर के मुख्य दरवाजे पर  बनाने से घर में लक्ष्मीजी (धन) का  आगमन बना ही रहता हैं ।

सांयकाल पूजा :

 कार्तिक के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए इससे दुरमृत्यु का नाश होता है।

 यम-दीपदान सरल विधि

 यमदीपदान प्रदोषकाल में करना चाहिए ।

 इसके लिए आटे का एक बड़ा दीपक लें। गेहूं के आटे से बने दीप में तमोगुणी ऊर्जा तरंगे एवं अपमृत्यु की तरंगे शांत करने की क्षमता रहती है ।

 तदुपरान्त स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं बना लें । उन्हें दीपक में एक -दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें ।

अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें ।

प्रदोषकाल में इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली , अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें ।

 उसके पश्चात् घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी -सी खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को रखना है ।

 दीपक को रखने से पहले प्रज्वलित कर लें और दक्षिण दिशा (दक्षिण दिशा यम तरंगों के लिए पोषक होती है) की ओर देखते हुए चार मुँह के  दीपक को खील आदि की ढेरी के ऊपर रख दें ।

‘ॐ यमदेवाय नमः ’
ॐ यमाय नम:, ॐ धर्मराजाय नम:, ॐ मृत्यवे नम:, ॐ अंतकाय नम:, ॐ कालाय नमः।

कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें ।

 यम दीपदान का मन्त्र :

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह |
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ||

➡ इसका अर्थ है, धनत्रयोदशीपर यह दीप मैं सूर्यपुत्रको, पाश और दंडधारी, मृत्यु तथा काल के अधिष्ठाता देव यमदेवता को अर्पित करता हूं । मृत्युके पाशसे वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें । मैं यमराज के निमित्त ???? दीपदान कर रहा हूँ, भगवान यमराज देवी श्यामासहित मुझ पर प्रसन्न हों ।"

धनतेरस के दिन दीपदान

 पहले बताई विधि के अनुसार यमदीपदान करें।

निर्धनता दूर करने के लिए अपने पूजाघर में धनतेरस की शाम को अखंड दीपक जलाना चाहिए l जो दीपावली की रात तक जरूर जलता रहे l अगर दीपक भैयादूज तक अखंड जलता रहे तो घर के सारे वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं l

घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में रुई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें साथ ही दिए में थोड़ी सी केसर भी डाल दें।

घर में तेल का दीपक प्रज्वलित करें तथा उसमें दो काली गुंजा डाल दें, गन्धादि से पूजन करके अपने घर के मुख्य द्वार पर अन्न की ढ़ेरी पर रख दें। साल भर आर्थिक अनुकूलता बनी रहेगी। स्मरण रहे वह दीप रातभर जलते रहना चाहिये, बुझना नहीं चाहिये ।????????

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आइयें जानते है करवा चौथ की पूजन विधि, आवश्यक सामग्री, महात्मय, कथा, अर्घ्य मुहूर्त और पूजा का समय

Date : 04-Nov-2020

करवा चौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्त्व है। इस दिन पति की लम्बी उम्र के पत्नियां पूर्ण श्रद्धा से निर्जला व्रत रखती है।

सुहागन महिलाओं के लिए चौथ महत्वपूर्ण है। इसलिए इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख की मनोकामना भी पूर्ण हो सकती है।

करवा चौथ महात्म्य 

छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेशजी तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।

महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।

महत्त्व के बाद बात आती है कि करवा चौथ की पूजा विधि क्या है? किसी भी व्रत में पूजन विधि का बहुत महत्त्व होता है। अगर सही विधि पूर्वक पूजा नहीं की जाती है तो इससे पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है।

चौथ की पूजन सामग्री और व्रत की विधि 

करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री

कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।
सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें।

व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।

करवा चौथ पूजन विधि 

प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें। व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें-

प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है-

'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।' अथवा

ॐ शिवायै नमः ' से पार्वती का
'ॐ नमः शिवाय' से शिव का
'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का
'ॐ गणेशाय नमः' से श्रीगणेश का तथा
'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।

शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी अथवा लकड़ी के आसार पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाड़ा बाँधकर देवता की भावना करके स्थापित करें। पश्चात माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें।

भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित करें।
सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। चंद्रोदय के बाद चाँद को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खा कर व्रत खोले।

करवा चौथ प्रथम कथा 

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

करवाचौथ द्वितीय कथा 

इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।
परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

करवा चौथ तृतीय कथा 

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।

यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवाचौथ चौथी कथा 

एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था। पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।

एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी। भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया। भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।

अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं। सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें। पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें।

पूजा एवं चन्द्र को अर्घ्य देने का मुहूर्त 

करवा चौथ पर बन रहे हैं योग
करवा चौथ पर बुध के साथ सूर्य ग्रह भी विद्यमान होंगे, जो बुधादित्य योग बना रहे हैं। इस दिन शिवयोग के साथ ही सर्वार्थसिद्धि, सप्तकीर्ति, महादीर्घायु और सौख्य योग

चार नवंबर को प्रातः 3:24 बजे से कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि सर्वार्थ सिद्धि योग एवं मृगशिरा नक्षत्र में चतुर्थी तिथि का समापन 5 नवंबर को प्रातः 5:14 बजे होगा।
4 नवंबर को शाम 5:34 बजे से शाम 6:52 बजे तक करवा चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त है प्राचीन मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ के दिन शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है।

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करवाचौथ कल, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Date : 03-Nov-2020

करवाचौथ का त्योहार आने वाला है. हिन्दू धर्म ग्रंथ के अनुसार करवाचौथ सुहागन औरतों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. यह हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पड़ता है. अर्थात करवाचौथ का पर्व दिवाली के 10या 11दिन के पहले मनाया जाता है. इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा का दर्शन और पूजन करके व्रत खोलती हैं. इस व्रत में श्रृंगार का भी बहुत महत्त्व है.

इस साल इस दिन पड़ेगा करवा चौथ
इस साल 4 नवंबर 2020 को करवाचौथ का त्योहार मनाया जायेगा. सुहागन महिलाओं ने इसकी तैयारी करना शुरू कर दी है.

जानें करवाचौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 4 नवंबर को सुबह 3 बजकर 24 मिनट पर हो रहा है तथा अगले दिन यानी 5 नवंबर 2020 को सुबह 5 बजकर 14 मिनट पर इसका समापन होगा. इस प्रकार इस बार महिलाओं को करवाचौथ का व्रत 13 घंटे 37 मिनट तक रखना होगा. इस व्रत का प्रारंभ 4 नवंबर को शुबह 6 बजकर 35 मिनट से रात 8 बजकर 12 मिनट तक होगा. उसके बाद ही चन्द्रमा का दर्शन –पूजन करके ही व्रत को विधि-विधान से समाप्त करना होगा. करवाचौथ के पूजन का शुभ मुहूर्त 4 नवंबर को शाम 05 बजकर 34 मिनट से शाम 06 बजकर 52 मिनट तक रहेगा. इसी दौरान आपको करवा चौथ की पूजा को विधि-विधान से करना चाहिए.

करवाचौथ के दिन चंद्रोदय का समय क्या है?
व्रत रखने वाली महिलायें चंदमा को जल चढाने के बाद ही अपने पति के हाथ जल ग्रहण करके ही व्रत का समापन करती हैं. इस लिए इस व्रत में चंद्रमा का महत्त्व बढ़ जाता है. 4 नवंबर 2020 को चंद्रोदय का समय शाम को 08 बजकर 12 मिनट पर है.

करवाचौथ की पूजन विधि:
यह व्रत सूर्योदय से पहले शुरू होता है और चंद्र दर्शन के साथ ख़त्म होता है. इस व्रत में पूरे शिव परिवार- शिव जी, पार्वती जी, नंदी जी, गणेश जी और कार्तिकेय जी की पूजा की जाती है. पूजा के वक्त पूर्व की और मुख करके बैठें. उसके बाद चंद्रमा का पूजन करें. अब पति को छलनी से देखें. इसके बाद पति के हाथ पानी पीकर व्रत का समापन करें...

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भौतिक सुख-समृद्धि और पारलौकिक पुण्य देने वाला पावन कार्तिक मास

Date : 30-Oct-2020

रायगढ़। भौतिक सुख-समृद्धि एवं पारलौकिक पुण्य देने वाला पावन कार्तिक मास शनिवार 31अक्टूबर से प्रारंभ हो रहा है। इस महीने सूर्योदय से पूर्व कार्तिक स्नान करने का विशेष महत्व होता है। वहीं पुराणों ने कहा है कि दान, दीपदान, तुलसी विवाह, कार्तिक कथा कहने-सुनने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है तथा पापों का शमन होता है।

पंडित कान्हा शास्त्री ने बताया कि कार्तिक माह पवित्र माना जाता है, सभी तीर्थों की तरह पुण्य फलों की प्राप्ति एक इस माह आसानी से मिल सकती है। क्यूंकि इस माह में की गई पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है। इस माह के महत्व को स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण आदि प्राचीन ग्रंथों ने भी बताया है।

00 स्नान का है विशेष महत्व
माना जाता है कि कार्तिक माह में सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें मनुष्य के मन तथा मस्तिष्क को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं। वहीं कार्तिक माह में किए स्नान का फल एक हजार बार किए गंगा स्नान के समान तथा सौ बार माघ स्नान के समान हाेता है। वहीं वैशाख माह में नर्मदा नदी पर करोड़ बार स्नान के बराबर होता है। जो फल कुम्भ में प्रयाग में स्नान करने पर मिलता है, वही फल कार्तिक माह में किसी पवित्र नदी के तट पर स्नान करने से मिलता है। इस माह में गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। भोजन दिन में एक समय ही करना चाहिए। जो व्यक्ति कार्तिक के पवित्र माह के नियमों का पालन करते हैं, वह वर्ष भर के सभी पापों से मुक्ति पा जाते हैं।

धार्मिक कार्यों के लिए यह माह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। आश्विन शुक्लपक्ष से कार्तिक शुक्लपक्ष तक पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान करना श्रेष्ठ होता है। वहीं स्नान कर लक्ष्मी-नारायण, शिव, चण्डी, सूर्य तथा अन्य देवों के मंदिरों में दीप जलाने तथा प्रकाश करने का बहुत महत्व माना गया है। इस माह में भगवान विष्णु का पुष्पों से अभिनन्दन करना चाहिए। ऎसा करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है। कर्तिक माह की षष्ठी को कार्तिकेय व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। स्वामी कार्तिकेय इस माह के देवता हैं। इस दिन अपनी क्षमतानुसार जरूरतमंद व्यक्ति को दान भी करना चाहिए।

सुबह स्नान करने के बाद राधा-कृष्ण का पूजन तुलसी पीपल आंवले आदि से करना चाहिए। वहीं सांयकाल में भगवान विष्णु की पूजा, दीपदान करना चाहिए। बहुत से श्रद्धालु कार्तिक माह में तारा भोजन भी करते हैं, अर्थात व्रती पूरे दिन निराहार रहकर रात्रि में तारों को अर्ध्य देकर भोजन करते हैं।

00 पुराणों ने भी बताई है महिमा
कार्तिक मास में भगवान कृष्ण के सानिध्य में रहना तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ विशेष पुण्यदायी होता है। वहीं पद्म पुराण में कहा गया है कि कार्तिक मास में मात्र एक दीपक अर्पित करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं। भगवान कृष्ण ऐसे व्यक्ति का गुणगान भी करते हैं जो दीपक जलाकर अन्यों को अर्पित करने के लिए देते हैं।

00 स्कंदपुराण ने कहा है कि
मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः।
तीर्थ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ।
अर्थात्‌ भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थ के सदृश ही कार्तिक मास श्रेष्ठ और दुर्लभ होता है।

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शरद पूर्णिमा आज, कल रात को दिखेंगे नीले चांद

Date : 30-Oct-2020

रायपुर। पूरे देश में शरद पूर्णिमा का उत्साह है। रात में चंद्रमा की रोशनी से सुधा बरसती है। पंचांग के मुताबिक, इस बार पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 अक्टूबर शाम 5.47 से होगा जो अगले दिन 31 अक्टूबर रात 8.21 तक रहेगा, लेकिन यह तिथि 30 अक्टूबर को प्रदोष व्यापिनी तथा निश्चित व्यापिनी दोनों हैं।

इसिलए छत्तीसगढ़ सहित देश के बड़े हिस्से में 30 अक्टूबर को ही शरद पूर्णिमा मनाई जा रही है। इस बीच, 31 अक्टूबर का दिन भी बहुत खास होने जा रहा है। इस दिन आसमान में ब्लू मून दिखाई देगा। यानी चंद्रमा पूरी तरह से नीले रंग में रंगा नजर आएगा। खगोलशास्त्रियों के लिए भी ये पल बहुत खास रहेंगे। नासा ने भी इस खगोलिय घटना के अध्ययन की बड़ी तैयार की है।

00 क्या है ब्लू मून
भारतीय धर्म ग्रंथों और पंचांग के अनुसार, एक महीने में एक पूर्णिमा होती है और एक अमावस्या। वहीं सालों में कभी कभार ऐसा होता है कि एक महीने मे दो बार पूर्णिमा हो। अक्टूबर 2020 में ऐसा ही हुआ है। इस महीने की पहली तारीख को पूर्णिमा थी और अब 30 अक्टूबर (या 31 अक्टूबर) को दूसरी पूर्णिमा है। इस तरह दूसरी पूर्णिमा को ब्लू मूल कहा जाता है।

00 इस बार का ब्लू मून क्यों खास है
इस बार का ब्लू मूल बहुत खास है। जानकारों के मुताबिक, इस वर्ष 31 अक्टूबर को दुर्लभ योग बन रहे हैं। इस दिन पूर्णिमा है यानी देशभर में शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। इसी दिन हैलोवीन है। ईसाई धर्म में इसका विशेष महत्व है। वहीं यह भी संयोग है कि एक महीने में दो पूर्णिमा आ रही है। 30 या 31 अक्टूबर को ब्लू मून होने के संयोग अब 2039 में यानी 19 साल बाद आएगा।

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, हर साल 31 अक्टूबर को हैलोवीन मनाया जाता है। मान्यता है कि यह फसल का आखिरी दिन होता है। इसके बाद से कड़ाके की सर्दी शुरू हो जाती है। कई देशों में इसे त्योहार के रूप में मनाते हैं। आज के दौर में भी हैलोवीन पार्टियां आयोजित की जाती हैं। कहीं कहीं लोग भूतों के कपड़े पहनकर निकलते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि इस दिन आत्माएं सक्रिय हो जाती हैं और लोगों को परेशान करती हैं। आत्माओं को दूर भगाने के लिए लोग भूतों के कपड़े पहनते हैं और डरावने चेहरे लेकर घुमते हैं।

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दशहरे पर होती है राम की जगह रावण की पूजा, नहीं होता है रावण दहन

Date : 25-Oct-2020

दशहरा के अवसर पर बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का आज पूरे देश में दहन किया जाएगा । हालांकि देश में कुछ ऐसे हिस्से हैं जहां रावण की पूजा होती है। देश में आज विजयादशमी का त्यौहार धूमधाम से मनाया जा रहा है। देश के कई जिले और कस्बे में कभी भी रावण दहन नहीं होता। इन जगहों पर दशानन की पूजा का रिवाज है।

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में रावण की पूजा होती है। मंदसौर के खानपुरा क्षेत्र में रावण रूण्डी नामक स्थान पर रावण की बहुत ही विशाल मूर्ति है। रावण मंदसौर (दशपुर) का दामाद था। उसकी पत्नी मंदोदरी की वजह से ही दशपुर मंदसौर के नाम से जाना जाता है। रावण को यहां काफी सम्मान दिया जाता है। इसके अलावा विदिशा जिले के गांव में राक्षसराज रावण का मंदिर है।

उत्तर प्रदेश के कानपुर में भी रावण की पूजा होती है। कानपुर के शिवाला में दशानन का मंदिर है। इस मंदिर में रावण की पूजा शक्ति के प्रतीक के रूप में होती है। रावण का मंदिर 1890 में बनाया गया था। कर्नाटक के कोलार जिले में रावण की पूजा होती है। कर्नाटक के लोग लोग रावण की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि रावण भगवान शिव का भक्त था। मंडया जिले के मालवल्ली तहसील में भी रावण का मंदिर है। यहां बड़ा मेला लगता है, दूर-दूर से लोग रावण की भक्ति में शामिल होते हैं।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में बैजनाथ कस्बा शिवनगरी के लोग रावण का पुतला जलाने को महापाप मानते हैं। कुछ साल बैजनाथ में रावण ने भगवान शिव की तपस्या की थी। इससे रावण ने मोक्ष का वरदान पाया था। इस कारण शिव भक्त मानते हुए लोग रावण की पूजा करते हैं। इसके अलावा ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में रावण की पूजा होती है।

रावण का जन्म इसी गांव में माना जाता है। यहां दशहरे के दिन लोग न तो पूजा करते हैं और न इस गांव में रामलीला का मंचन होता है। इस गांव में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। बिसरख गांव के लोग प्राचीन काल से ही दशहरा नहीं मनाते। इस गांव में रावण के पिता ऋषि विश्रवा रहते थे। राजस्थान के जोधपुर में भी रावण की पूजा होती है। जोधपुर को रावण का विवाह स्थल माना जाता है।

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