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पितृपक्ष में बेहद खास है गज लक्ष्मी का व्रत, मां लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न करने के लिए इन मंत्रों का करें जाप

Date : 28-Sep-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। ऋग्वेद में देवी लक्ष्मी को ‘श्री’ व भूमि प्रिय सखी कहा है। लक्ष्मी को चंचला भी कहते हैं अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। श्री का अर्थ है होता है शुभ और हर व्यक्ति शुभ लक्ष्मी ही चाहता है। लक्ष्मी मात्र धन नहीं हैं अपितु व्यक्ति की पहचान भी होती है। इनकी पूजा से घर में धन -वैभव का आगमन होता है। हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष अवसर होता है। इसके तहत हर साल भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से महालक्ष्मी व्रत शुरू किया जाता है। 16 दिनों तक विधि विधान से व्रत रखकर अंतिम दिन यानी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मां लक्ष्मी के गज लक्ष्मी स्वरूप की पूजा की जाती है और इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। गज लक्ष्मी माता हाथी पर कमल के आसन पर विराजमान होती हैं।

पौराणिक मान्यता है कि गज लक्ष्मी के व्रत और पूजन से घर में कभी आर्थिक तंगी और दरिद्रता नहीं आती है, भक्तों को मन वांछित फल प्राप्त होता है, सुख-संपत्ति और संतान की प्राप्ति होती है। मान-सम्मान और पद प्रतिष्ठा की वृद्धि होती है।

हिंदी पंचांग के अनुसार, इस साल गज लक्ष्मी का व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 29 सितंबर 2021 दिन बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन गजलक्ष्मी की पूजा के साथ महालक्ष्मी के सोलह दिन के व्रतों का उद्यापन भी होगा। आइये जानें मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के मंत्र।

गज लक्ष्मी व्रत पूजन विधि

इस दिन पूजा (worship) स्थल पर हल्दी से कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें और मूर्ति के सामने श्रीयंत्र, सोने-चांदी के सिक्के और फल फूल रखें। इसके बाद माता लक्ष्मी के आठ रूपों की मंत्रों के साथ कुंकुम, चावल और फूल चढ़ाते हुए पूजा करें। महालक्ष्मी व्रत में मां लक्ष्मी के हाथी पर बैठी हुई मूर्ति को लाल कपड़ा के साथ विधि-विधान के साथ इनकी स्थापना करें और पूजा कर ध्यान लगाएं।

महालक्ष्मी व्रत के दिन श्रीयंत्र या महालक्ष्मी यंत्र को मां लक्ष्मी के सामने स्थापित करें और इसकी पूजा करें। यह चमत्कारी यंत्र धन वृद्धि के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है। इस यंत्र की पूजा से परेशानियां और दरिद्रता दूर होती है। महालक्ष्मी व्रत में दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल और दूध डालकर देवी लक्ष्मी की मूर्ति से अभिषेक करना चाहिए इससे मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

माता लक्ष्मी को कमल का फूल बहुत पसंद होता है इसलिए लक्ष्मीजी की पूजा में यह फूल अवश्य चढ़ाना चाहिए। महालक्ष्मी व्रत पर कमल गट्टे को माला को माता लक्ष्मी को चढ़ाएं। साथ ही पूजा में कौड़ी अर्पित करें। पूजा के बाद इन दोनों चीजों को अपने तिजोरी या लॉकर में रखें।

मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के मंत्र

गज लक्ष्मी व्रत के दिन भक्त विधि पूर्वक मां लक्ष्मी का पूजन कर उन्हें इत्र, गंध और कमल का फूल अर्पित करें तथा कमल गट्टे की माला से नीचे दिए गये किसी एक मंत्र का 108 बार जाप करें। मान्यता है कि इन मंत्रों के जाप मां लक्ष्मी बहुत जल्द प्रसन्न होती हैं और उनकी सभी मनोकामना (all wishes) पूरी करती हैं। मां लक्ष्मी की कृपा से भक्तों को कभी धन- दौलत की कमी नहीं होती है। उनकी सारी आर्थिक समस्याएं दूर कर देती हैं।

ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नम:
ऊँ आद्य लक्ष्म्यै नम:
ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:
ऊँ नमो भाग्य लक्ष्म्यै च विद्महे अष्ट लक्ष्म्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोद्यात
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नम:

नोट– उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

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जानें कब से शुरु हो रही शारदीय नवरात्रि, किस दिन किस देवी की होगी पूजा

Date : 28-Sep-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। हर साल शारदीय नवरात्रि का आरंभ आश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से होता है। इसके बाद अगले 9 दिनों तक देवी दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इन दिनों में देवी पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों के दुख हर लेती हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है । इस बार शारदीय नवरात्रि 7 अक्टूबर, गुरुवार से शुरू हो रहे हैं, जो कि 15 अक्टूबर, शुक्रवार(Friday) को संपन्न होंगे। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर माता रानी अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं।

मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए भक्त नौ दिनों का उपवास भी रखते हैं। नवरात्रि के दौरान कई बार तिथियों को घटने-बढ़ने के कारण अष्टमी, नवमी और दशमी तिथि में असमंजस की स्थिति बन जाती है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं कि शारदीय नवरात्रि 2021 में महाअष्टमी, महानवमी और दशहरा किस तिथि और दिन को पड़ रहा है।

महा अष्टमी कब है

इस साल महाअष्टमी 13 अक्टूबर (बुधवार) को पड़ रही है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस साल चतुर्थी तिथि का क्षय होने से शारदीय नवरात्रि आठ दिन के पड़ रहे हैं। ऐसे में 13 अक्टूबर को अष्टमी व्रत रखना उत्तम है। नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है।

महानवमी कब है 

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल महानवमी तिथि 14 अक्टूबर (गुरुवार) को पड़ रही है। नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।

महानवमी का आध्यात्मिक महत्व-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षसों के राजा महिषासुर (Mahishasura) के खिलाफ मां दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध किया था। इसी कारण यह त्योहार नौ दिनों तक चलता है। देवी की शक्ति और बुराई पर जीत हासिल करने का यह अंतिम दिन होता है। जिसे महानवमी कहते हैं।

दशहरा कब है

इस साल दशहरा का त्योहार 15 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

शारदीय नवरात्रि 2021 तिथियां-

7 अक्टूबर (पहला दिन)- मां शैलपुत्री की पूजा
8 अक्टूबर (दूसरा दिन)- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
9 अक्टूबर (तीसरा दिन)- मां चंद्रघंटा व मां कुष्मांडा की पूजा
10 अक्टूबर (चौथा दिन)- मां स्कंदमाता की पूजा
11 अक्टूबर (पांचवां दिन)- मां कात्यायनी की पूजा
12 अक्टूबर (छठवां दिन)- मां कालरात्रि की पूजा
13 अक्टूबर (सातवां दिन)- मां महागौरी की पूजा
14 अक्टूबर (आठवां दिन)- मां सिद्धिदात्री की पूजा
15 अक्टूबर- दशमी तिथि ( व्रत पारण), विजयादशमी या दशहरा

नोट- उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

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पितृ पक्ष : श्राद्ध के समय भूलकर भी न करें ये गलतियां, इन जरूरी बातों का रखें खास ध्यान

Date : 21-Sep-2021

डेस्क न्यूज़ (एजेंसी)। श्राद्ध पर्व हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से आश्विन मास की अमावस्या यानी 16 दिनों तक मनाया जाता है। श्राद्ध को महालय या पितृपक्ष के नाम से भी जाना जाता है | भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से सोलह दिवसीय श्राद्ध प्रारंभ होते हैं। माना जाता है इस दौरान श्राद्ध कर अपने पितरों को मृत्यु च्रक से मुक्त कर उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद करता है। आइये आज हम आपको बताते हैं कि श्राद्ध करते वक्त किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

श्राद्ध के समय इन बातों का रखें खास ध्यान

श्राद्ध कार्य दोपहर के समय करना चाहिए। वायु पुराण के अनुसार शाम के समय श्राद्धकर्म निषिद्ध है। क्योंकि शाम का समय राक्षसों का है।

श्राद्ध कर्म कभी भी दूसरे की भूमि पर नहीं करना चाहिए। जैसे अगर आप अपने किसी रिश्तेदार के घर हैं और श्राद्ध चल रहे हैं, तो आपको वहां पर श्राद्ध करने से बचना चाहिए। अपनी भूमि पर किया गया श्राद्ध ही फलदायी होता है। हालांकि पुण्य तीर्थ या मन्दिर या अन्य पवित्र स्थान दूसरे की भूमि नहीं माने जाते, लिहाजा आप पवित्र स्थानों पर श्राद्ध कार्य कर सकते हैं।

श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना बेहतर होता है श्राद्ध में तुलसी व तिल के प्रयोग से पितृगण प्रसन्न होते हैं। लिहाजा श्राद्ध के भोजन आदि में इनका उपयोग जरूर करना चाहिए श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान बड़ा ही पुण्यदायी बताया गया है। अगर हो सके तो श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन भी चांदी के बर्तनों में ही कराना चाहिए श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन जरूर करवाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण को भोजन कराए श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन ग्रहण नहीं करते और ऐसा करने से व्यक्ति पाप का भागी होता है।

श्राद्ध से एक दिन पहले ही ब्राह्मण को खाने के लिये निमंत्रण दे आना चाहिए और अगले दिन खीर, पूड़ी, सब्जी और अपने पितरों की कोई मनपसंद चीज़ और एक मनपसंद सब्जी बनाकर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।

आपके जिस भी पूर्वज का स्वर्गवास है, उसी के अनुसार ब्राह्मण या ब्राह्मण की पत्नी को निमंत्रण देकर आना चाहिए। जैसे अगर आपके स्वर्गवासी पूर्वज एक पुरुष हैं, तो पुरुष ब्राह्मण को और अगर महिला है तो ब्राह्मण की पत्नी को भोजन खिलाना चाहिए, साथ ही ध्यान रखें कि अगर आपका स्वर्गवासी पूर्वज़ कोई सौभाग्यवती महिला थी, तो किसी सौभाग्यवती ब्राह्मण की पत्नी को ही भोजन के लिये निमंत्रण देकर आएं ।

ब्राह्मण को खाना खिलाते समय दोनों हाथों से खाना परोसें और ध्यान रहे श्राद्ध में ब्राह्मण का खाना एक ब्राह्मण को ही दिया जाना चाहिए । ऐसा नहीं है कि आप किसी जरूरतमंद को दे दें. श्राद्ध में पितरों की तृप्ति केवल ब्राह्मणों द्वारा ही होती है। लिहाजा श्राद्ध में ब्राह्मण का भोजन एक सुपात्र ब्राह्मण को ही कराएं।

भोजन कराते समय ब्राह्मण को आसन पर बिठाएं। आप कपड़े, ऊन, कुश या कंबल आदि के आसन पर बिठाकर भोजन करा सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे आसन में लोहे का प्रयोग बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

भोजन के बाद ब्राह्मण को अपनी इच्छा अनुसार कुछ दक्षिणा और कपड़े आदि भी देने चाहिए।

श्राद्ध के दिन बनाए गए भोजन में से गाय, देवता, कौओं, कुत्तों और चींटियों के निमित भी भोजन जरूर निकालना चाहिए। देखिये किसी भी हाल में कौओं और कुत्तों का भोजन उन्हें ही कराना चाहिए, जबकि देवता और चींटी का भोजन आप गाय को खिला सकते हैं ।

ब्राह्मण आदि को भोजन कराने के बाद ही घर के बाकी सदस्यों या परिजनों को भोजन कराएं ।

एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहन, जमाई और भांजे को भी श्राद्ध के दौरान भोजन जरूर कराएं। ऐसा न करने वाले व्यक्ति के घर में पितरों के साथ- साथ देवता भी भोजन ग्रहण नहीं करते।

श्राद्ध के दिन अगर कोई भिखारी या कोई जरूरमंद आ जाए तो उसे भी आदरपूर्वक भोजन जरूर कराना चाहिए।

श्राद्ध के भोजन में जौ, मटर, कांगनी और तिल का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। कहते हैं तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, साथ ही श्राद्ध के कार्यों में कुशा का भी महत्व है। इसके अलावा श्राद्ध के दौरान चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बांसी अन्न निषेध है । आपको इन सब बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

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अनंत चतुर्दशी आज, बप्‍पा की विदाई से पहले करें ये काम

Date : 19-Sep-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी) । अनंत चतुर्दशी 19 सितंबर यानि आज है। अनंत चतुर्दशी के पावन दिन 10 दिनों तक चलने वाले गणेश महोत्सव का समापन होता है। भगवान गणेश प्रथम पूजनीय देव हैं। भगवान गणेश की कृपा से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। अनंत चतुर्दशी के पावन दिन गणेश चतुर्थी के दिन स्थापित की गई प्रतिमा का विर्सजन किया जाता है। इस पावन दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए ये काम जरूर करें।

दूर्वा घास
भगवान गणेश को दूर्वा घास काफी पसंद होती है। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को दूर्वा घास अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति गणपती महाराज को दूर्वा अर्पित करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करने से सभी तरह की समस्याओं से छुटकारा मिलता है और जीवन आनंद से भर जाता है। आप रोजाना भी भगवान गणेश को दूर्वा घास अर्पित कर सकते हैं।

मोदक
गणेश जी को मोदक अतिप्रिय होते हैं। आप इस दिन भगवान गणेश को मोदक का भोग भी लगा सकते हैं। धार्मिक शास्त्रों में मोदक को ब्रह्म के समान बताया गया है।

सिंदूर
भगवान गणेश को सिंदूर पसंद होता है। गणेश जी को सिंदूर का तिलक भी अवश्य लगाएं। ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं। भगवान गणेश को तिलक लगाने के बाद अपने माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं।

घी
भगवान गणेश को घी काफी पसंद है। भगवान गणेश की पूजा में घी को जरूर शामिल करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घी को पुष्टिवर्धक और रोगनाशक कहा जाता है। जो व्यक्ति भगवान गणेश की पूजा घी से करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

नोट- उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

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किचन में भूलकर भी इन चार चीजों को न होने दें खत्म, कई परेशानियों का करना पड़ सकता है सामना

Date : 18-Sep-2021

नई दिल्ली (एजेंसी)। वास्तुशास्त्र की मानें तो किचन में भूलकर भी इन चार चीजों को खत्म न होने दें। इन चार चीजों के किचन में नहीं होने से घर में गरीबी, बदनामी जैसे कई समस्याएं दबे पांव प्रवेश कर जाते हैं। घर या आॅफिस का वास्तु खराब है तो उस स्थान पर रह रहे लोगों की प्रगति नहीं हो पाती और वहां हमेशा धन का अभाव बना रहता है, इसलिए लोग वास्तु से संबंधी हर उपाय अपनाने को तैयार रहते हैं। इन चार चीजों के खत्म होने को वास्तु दोष माना जाता है। तो चलिए जानते हैं उन चीजों के बारे में…

हर व्यक्ति मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने वास्तु शास्त्र संबंधी हर उपाय अपनाते हैं। जिससे वह प्रसन्न होकर आपको धनवान बना दें। लेकिन कई बार वास्तु से संबंधित छोटी सी गलती राजा से रंक बना देती हैं। वास्तु में किचन का बहुत अधिक महत्व है। वहां पर रखीं हर एक चीज का सकारत्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

चावल का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है। ऐसे में इसके मजबूत होने से भौतिक सुख-सुविधाएं मिलती है। इसलिए इसे कभी भी अपने किचन से खत्म न होने दें। इसके अलावा चावल को शुभ माना जाने से थोड़े से चावलों को घर के मंदिर में भी जरूर रखें। इससे घर-परिवार की परेशानियां दूर हो कर सुख-समृद्धि व शांति का वास होगा।

नमक का रसोईघर में न होना वास्तुदोष पैदा करने का कारण बनता है। ऐसे में आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही घर के सदस्यों में मनमुटाव हो सकता है।

किचन में आटा का स्थान सबसे अहम होता है। ऐसे में इसे रसोईघर से कभी खत्म नहीं देना चाहिए। इसके खत्म हो जाने से घर में वास्तुदोष उत्पन्न होने के साथ समाज में मान-सम्मान कम होने लगता है। ऐसे में घर पर आटा खत्म होने से पहले ही इसे खरीदें।

हल्दी को शुभता का प्रतीक माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य में हल्दी का प्रयोग होता है। ऐसे में इसका खत्म होना अशुभ माना जाता है। असल में, हल्दी का संबंध बृहस्पति ग्रह से माना जाता है। ऐसे में इसके खत्म हो जाने से गुरु ग्रह का अशुभ प्रभाव पड़ सकता है। इसके कारण कारोबार, नौकरी में तरक्की के रास्ते में बांधा आने के साथ आने वाले जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। हम यूं भी कह सकते हैं कि इससे आर्थिक परेशानियां झेलनी पड़ सकती है।

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अनंत चतुर्दशी 19 सितंबर को, इस दिन बना यह शुभ योग, पूजा से होंगे कई लाभ

Date : 16-Sep-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। हिंदी पंचांग के मुताबिक़, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) का पर्व मनाया जाता है। इसे अनंत चौदस भी कहते हैं। इस बार अनंत चौदस 19 सितंबर को पड़ रही है। अनंत चौदस का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष चतुर्दशी को कहा जाता है। अनंत चतुर्दशी हिंदुओं और जैनियों का त्यौहार है। अनंत चतुर्दशी पर अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए लोग व्रत भी रखते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप को पूजा जाता है।

इस दिन भक्त उपवास  रखकर भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा (worship) करते हैं, तथा उन्हें अनंत सूत्र बांधते हैं। अनंतसूत्र कपड़े या रेशम का बना होता है और इसमें 14 गांठ लगी होती हैं। मान्यता है कि अनंत चतुर्दशी को भगवान विष्णु जी को अनंत सूत्र बांधने से सारी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

अनंत चौदस को भगवान श्री गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन भी किया जाता है। बहुतायत लोग इस दिन भगवान गणेश की पूजा करके उनका विसर्जन करते हैं और अगले वर्ष पुनः आने के लिए प्रार्थना करते हैं।

अनंत चौदस पूजा मुहूर्त:

अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 6।07 मिनट से शुरू होगा, जो अगले दिन 20 सितंबर को सुबह 5।30 बजे तक रहेगा। अनंत चतुर्दशी पर पूजा के लिए शुभ मुहूर्त की कुल अवधि 23 घंटे 22 मिनट तक रहेगी।

मंगल बुधादित्य योग

पंचांग के अनुसार साल 2021 में अनंत चौदस का पर्व 19 सितंबर दिन शनिवार को मनाया जायेगा। ज्योतिष गणना के अनुसार, इस दिन मंगल, बुध और सूर्य एक साथ कन्या राशि (Virgo sun sign) में विराजमान होंगे। तीनों के एक साथ होने के कारण मंगल बुधादित्य योग का निर्माण हो रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस विशिष्ट योग में भगवान की पूजा करने पर विशेष फल की प्राप्ति होती है।

मान्यता है कि इस मुहूर्त में पूजा करने से भक्तों की अनंत बाधाएं दूर हो जाती है। उनकी मनोकामना पूरी होती है। उनके सभी प्रकार के पाप व संकट नष्ट हो जाते हैं। घर परिवार में सुख शांति और सौहार्द का आगमन होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के अलावा भगवान गणेश का विसर्जन भी किया जाता है। ऐसे में अनंत चतुर्दशी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

नोट– उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी।

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भुलकर भी न करें ये गलतियां, रुक सकती है तरक्की

Date : 14-Sep-2021

रायपुर। कहा जाता है धन की देवी लक्ष्मी बहुत चंचल होती है। उन्हें अपने पास हमेशा रखना, उनकी हमेशा कृपा बने रहे यह मुश्किल है। अगर आप मां लक्ष्मी की अपने ऊपर हमेशा बने रहे यह चाहते हैं। तो भुलकर भी ये गलतियां न करें। जिससे आपसे मां लक्ष्मी रूठ जाये। और आप आर्थिक रूप से कमजोर हो जाये। आपकी इन मामूली गलतियों के चलते ही आपकी परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर सकती है। तो आइये जानते हैं ये मामूली गलतियां क्या है, जो मां लक्ष्मी को आप से दूर कर सकती है।

जी हां जिस घर में मां लक्ष्मी का वास नहीं होता है वहां दरिद्रता निवास करती है। वहां हर प्रकार की तकलीफ दुख वास करता है। मां लक्ष्मी को अन्नपूर्णा भी कहा जाता है।

बिस्तर पर बैठकर खाना खाने से अन्न का अपमान होता है और मां लक्ष्मी नाराज होती हैं। भोजन हमेशा सम्मानजनक तरीके से आसन पर या टेबल-कुर्सी पर बैठकर करना चाहिए। बिस्तर पर बैठकर खाना खाने से कर्ज चढ़ता है, साथ ही व्यक्ति बीमारियों का शिकार होता है कई घरों में रात में भोजन करने के बाद किचन में ही जूठे बर्तन छोड़ देते हैं। ऐसा करना भी मां अन्नपूर्णा का अपमान है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक रात में किचन को हमेशा साफ करना चाहिए वरना देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं।

यदि घर के मुख्य द्वार के सामने डस्टबिन रखा है तो उसे तुरंत हटा दें, वरना देवी लक्ष्मी तो नाराज होंगी ही, पड़ोसियों के साथ भी रिश्ते बिगड़ने में देर नहीं लगेगी जिस घर में महिलाओं का अपमान होता है, वहां मां लक्ष्मी कभी नहीं रहती हैं। लिहाजा महिलाओं, गरीबों का अपमान कभी न करें।

पूजा के दौरान कभी भी कोई सामान जमीन पर न रखें। भगवान को अर्पित की जानी वाली हर चीज थाल में रखें। शाम के समय दूध, दही, नमक किसी को न दें। इससे घर की लक्ष्मी चली जाती है।

(नोट: इस लेख में दी गई सूचनाएं सामान्य जानकारी और मान्यताओं पर आधारित हैं। टीसीपी24 इनकी पुष्टि नहीं करता है।)

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पुणे में एक भक्त ने गणपति को चढाया 10 किलो सोने से बना मुकुट

Date : 13-Sep-2021

पुणे (एजेंसी)। महाराष्ट्र के पुणे में दगडू शेठ हलवाई गणपति को इस वर्ष गणेश उत्सव के दौरान एक भक्त ने 10 किलो सोने से बना मुकुट भेंट किया है. खास बात यह है कि इस भक्त ने अपना नाम भी गोपनीय रखा है.

दगडू शेठ हलवाई गणपति मंडल के एक ट्रस्टी महेश सूर्यवंशी ने बताया कि पुणे शहर के ही एक उद्योगपति ने चढ़ावे के रूप में सोने का मुकुट भेंट किया है.

इस मुकुट की खासियत है कि इस पर बहुत ही सुन्दर कारीगरी की हुई है और इस कारीगरी में भगवान शंकर और मां पार्वती का चित्र बनाया हुआ है.

इस उद्योगपति ने उसका नाम गोपनीय रखने को कहा है इसलिए मंदिर के ट्रस्टी ने इस दानवीर भक्त का नाम नहीं बताया है.
मंदिर ट्रस्टी ने मुकुट के वजन के अलावा जानकारी देना उचित नहीं समझा. बाजार भाव के हिसाब से इस 10 किलो सोने के मुकुट की कीमत आज की तारीख में तक़रीबन पांच करोड़ रुपये होती है. सिर्फ सोने की कीमत तक़रीबन 4 करोड़ और कारीगरी की कीमत 80 लाख रुपये होती है.

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जानें क्‍यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी, इसके पीछे भी है पौराणिक कथा

Date : 10-Sep-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी को देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है। मान्‍यता है कि इस दिन भगवान गणेशजी का जन्‍म हुआ था, इस उपलक्ष्‍य में पूरे देश में धूमधाम से गणेश चतुर्थी का उत्‍सव मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी क्‍यों मनाते हैं इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं भी हैं। उनमें से एक आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

कहा जाता है कि पौराणिक काल में एक बार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना के लिए गणेशजी का आह्नान किया और उनसे महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने कहा कि मैं जब लिखना प्रारंभ करूंगा तो कलम को रोकूंगा नहीं, यदि कलम रुक गई तो लिखना बंद कर दूंगा। तब व्यास जी ने कहा प्रभु आप विद्वानों में अग्रणी हैं और मैं एक साधारण ऋषि किसी श्लोक में त्रुटि हो सकती है, अतः आप बिना समझे और त्रुटि हो तो निवारण करके ही श्लोक को लिपिबद्ध करना। आज के दिन से ही व्यास जी ने श्लोक बोलना और गणेशजी ने महाभारत को लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया।

उसके 10 दिन के पश्‍चात अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य समाप्त हुआ। इन 10 दिनों में गणेशजी एक ही आसन पर बैठकर महाभारत को लिपिबद्ध करते रहे, इस कारण 10 दिनों में उनका शरीर जड़वत हो गया और शरीर पर धूल, मिट्टी की परत जमा हो गई, तब 10 दिन बाद गणेशजी ने सरस्वती नदी में स्नान कर अपने शरीर पर जमीं धूल और मिट्टी को साफ किया। जिस दिन गणेशजी ने लिखना आरंभ किया उस दिन भाद्रमास के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। इसी उपलक्ष्‍य में हर साल इसी तिथि को गणेशजी को स्थापित किया जाता है और दस दिन मन, वचन कर्म और भक्ति भाव से उनकी उपासना करके अनन्त चतुर्दशी पर विसर्जित कर दिया जाता है।

इसका आध्यात्मिक महत्व है कि हम दस दिन संयम से जीवन व्यतीत करें और दस दिन पश्चात अपने मन और आत्मा पर जमी हुई वासनाओं की धूल और मिट्टी को प्रतिमा के साथ ही विसर्जित कर एक परिष्कृत और निर्मल मन और आत्मा के रूप को प्राप्त करें।

गणों के अधिपति श्री गणेश प्रथम पूज्य हैं। सर्वप्रथम उन्हीं की पूजा की जाती है, उनके बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है। किसी भी कर्मकांड में श्रीगणेश की पूजा-आराधना सबसे पहले की जाती है क्योंकि गणेशजी विघ्नहर्ता हैं और आने वाले सभी विघ्नों को दूर कर देते हैं। श्रीगणेश लोक मंगल के देवता हैं, लोक मंगल उनका उद्देश्य है परंतु जहां भी अमंगल होता है, उसे दूर करने के लिए श्री गणेश अग्रणी रहते हैं। गणेश जी रिद्धि और सिद्धि के स्वामी हैं। इसलिए उनकी कृपा से संपदा और समृद्धि का कभी अभाव नहीं रहता है। श्री गणेशजी को दूर्वा और मोदक अत्यंत प्रिय है।

00 श्रीगणेश को जरूर चढ़ाएं ये चीजें

बौद्धिक ज्ञान के देवता कहे जाने वाले गणपति के आशीर्वाद से व्यक्ति का बौद्धिक विकास होता है। इसीलिए भक्त उनका आशीर्वाद पाने के लिए सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से आराधना करते हैं। भक्त गणपति की पूजा करते समय छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हैं, ताकि उनसे कोई गलती ना हो जाएं। लेकिन अक्सर जानकारी न होने के अभाव में वे भगवान गणेशजी को ये कुछ चीजें चढ़ाना भूल जाते हैं। पहला मोदक का भोग और दूसरा दूर्वा (एक प्रकार की घास) और तीसरा घी। ये तीनों ही गणपति को बेहद प्रिय हैं। इसीलिए जो भी व्यक्ति पूरी आस्था से गणपति की पूजा में ये चीजें चढ़ाता है तो उस व्यक्ति को गणेशजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

00 क्यों चढ़ाते हैं गणपति को प्रसाद में मोदक?

रिद्धि सिद्धि के देवता गणपति के पूजन में प्रसाद के रूप में खासतौर पर मोदक का भोग जरूर लगाया जाता है। कहा जाता है कि मोदक गणपति को बहुत पसंद है। लेकिन इसके पीछे पौराणिक मान्यताएं छिपी हुई हैं। पुराणों के अनुसार गणपति और परशुराम के बीच युद्ध चल रहा था, उस दौरान गणपति का एक दाँत टूट गया। इसके चलते उन्हें खाने में काफी परेशानी होने लगी। उनके कष्ट को देखते हुए कुछ ऐसे पकवान बनाए गए जिसे खाने में आसानी हो और उससे दाँतों में दर्द भी न हो। उन्हीं पकवानों में से एक मोदक था। मोदक खाने में काफी मुलायम होता है। माना जाता है कि श्री गणेश को मोदक बहुत पसंद आया था और तभी से वो उनका पसंदीदा मिष्ठान बन गया था। इसलिए भक्त गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए मोदक का भोग लगाने लगे। हालांकि मोदक के विषय में कुछ पौराणिक धर्मशास्त्रों में भी जिक्र किया गया है। मोदक का अर्थ होता है ख़ुशी या आनंद। गणेश जी को खुशहाली और शुभ कार्यों का देव माना गया है इसलिए भी उन्हें मोदक चढ़ाया जाता है।

00 गणेश चतुर्थी के दिन क्यों निषेध है चंद्र दर्शन

ऐसी माना जाता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए, नहीं तो व्यक्ति के ऊपर मिथ्या कलंक यानि बिना किसी वजह से व्यक्ति पर कोई झूठा आरोप लगता है। पुराणों के अनुसार एक बार भगवान कृष्ण ने भी गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन किया था, जिसकी वजह से उन्हें भी मिथ्या का शिकार होना पड़ा था। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को लेकर एक और पौराणिक मत है जिसके अनुसार इस चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया था। इस वजह से ही चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को निषेध माना गया। अगर भूल से चन्द्र दर्शन हो जाए तो इस दोष के निवारण के लिए नीचे लिखे मंत्र का 28, 54 या 108 बार जाप करें। श्रीमद्भागवत के दसवें स्कन्द के 57वें अध्याय का पाठ करने से भी चन्द्र दर्शन का दोष समाप्त हो जाता है।

चन्द्र दर्शन दोष निवारण मन्त्र:

सिंहःप्रसेनमवधीत् , सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः।।

00 गणेश चतुर्थी 2021 शुभ मुहूर्त

गणेश पूजन के लिए मध्याह्न मुहूर्त -दोपहर 11 बजकर 02 मिनट से लेकर 01 बजकर 32 मिनट तक

अवधि: 2 घंटे 29 मिनट

गणेश चतुर्थी व्रत व पूजन विधि

-व्रती को चाहिए कि प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा लें।

-चौकी में लाल आसन के ऊपर गणेश जी को विराजमान करें।

-गणेश जी को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों को बांट दें।

-सांयकाल के समय गणेश जी का पूजन करना चाहिए। गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश चालीसा व आरती पढ़ने के बाद अपनी दृष्टि को नीचे रखते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।

-इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।

-ध्यान रहे कि तुलसी के पत्ते (तुलसी पत्र) गणेश पूजा में इस्तेमाल नहीं हों। तुलसी को छोड़कर बाकी सब पत्र-पुष्प गणेश जी को प्रिय हैं।

-गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है। मतान्तर से गणेश जी की तीन परिक्रमा भी की जाती है।

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इस साल गणेश पर्व पर छह ग्रहों व नक्षत्रों का बन रहा संयोग, गणेश चतुर्थी पर भूलकर भी न करें चंद्र दर्शन

Date : 09-Sep-2021

रायपुर ।  पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी है और यह 10 सितंबर 2021 को पड़ रही है. इस साल गणेश पर्व पर छह ग्रहों एवं नक्षत्रों का संयोग बन रहा है। इसे शुभ मंगलकारी माना जा रहा है। इस संयोग में प्रथम पूज्य गणपति की स्थापना करके विधिवत पूजन करने से कार्यों में सफलता मिलेगी।

ज्योतिषाचार्य पं.विनीत शर्मा के अनुसार 10 सितंबर को सुबह से रात तक शुभ मुहूर्त में गणेश प्रतिमा की स्थापना की जा सकेगी। शुक्रवार को पड़ रही गणेश चतुर्थी पर अनेक ग्रह अच्छी स्थिति में होंगे। इस दिन बुध ग्रह कन्या राशि में, शुक्र ग्रह तुला में राहु ग्रह वृषभ में शनि ग्रह मकर में केतु ग्रह वृश्चिक राशि में होंगे। यह संयोग व्यापार, नौकरी, शेयर बाजार खेती के लिए शुभदायी माना जा रहा है।

ग्रहों और राशि के शुभ संयोग के अलावा इस बार गणेश चतुर्थी पर चित्रा-स्वाति नक्षत्र के साथ रवि योग का संयोग बन रहा है। शुक्रवार को चित्रा नक्षत्र शाम 4.59 बजे तक रहेगा और इसके बाद स्वाति नक्षत्र लगेगा। चित्रा नक्षत्र, ब्रह्म योग, वणिज करण एवं तुला राशि में चंद्रमा में है। वणिज करण की स्वामिनी माता लक्ष्मी को माना जाता है। इस संयोग में भगवान गणेश के साथ, लक्ष्मीजी भी घर आएंगी। इसके एक दिन पहले हरतालिका तीज पर 9 सितंबर को दोपहर 2.30 बजे से रवि योग शुरू होकर 10 सितंबर को 12.57 बजे तक रहेगा। इन सभी योगों को अति शुभ माना जा रहा है। किसी भी तरह के नए कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा करके की जा सकती है।

भद्रा का असर नहीं

किसी भी शुभ कार्य में भद्रा काल हो तो उसे अशुभ माना जाता है, चूंकि भगवान गणेश प्रथम पूज्य देव हैं। वे विघ्हर्ता हैं, यानी मुसीबतों से छुटकारा दिलाते हैं, इसलिए भगवान गणेश की पूजा में भद्रा काल का कोई रोड़ा नहीं है। चतुर्थी तिथि पर सुबह 11.09 से रात 10.59 बजे तक भद्रा है, जिसका वास पाताल लोक में हैं। भद्रा काल में भगवान गणेश की पूजा करने में कोई व्यवधान नहीं आता।

पूजन का शुभ मुहूर्त

रवि योग- सुबह 6.01 से दोपहर 12.58 बजे

अमृत काल- सुबह 6.58 से सुबह 8.28 बजे

शुभ मुहूर्त – सुबह 11.03 से दोपहर 1.32 बजे

अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11.30 से दोपहर 12.20 बजे

विजय मुहूर्त- दोपहर 1.59 से 2.49 बजे

गोधूलि मुहूर्त- शाम 5.55 से 6.19 बजे ।

चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए

हिंदू धर्म शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार, भादो माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए. कहा जाता है कि यदि आपने गणेश चतुर्थी को अर्थात भादो के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को चांद का दर्शन कर लिया तो आप पर झूठे आरोप लगेंगे अर्थात झूठे कलंक लगने की मान्यता है. एक कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन कर लिया था, तो उन पर स्यामंतक मणि चोरी करने का मिथ्या कलंक लगा था.

गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन न करने के पीछे की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान श्रीगणेश जी माता पार्वती के आदेशानुसार घर के मुख्य द्वार पर पहरा दे रहे थे. तभी भगवान शिव वहां आए और अंदर जाने लगे. इस पर गणेश भगवान ने मनाकर दिया और उन्हें घर के अंदर जाने से रोक दिया. तब महादेव ने गुस्से में आकर भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया.

इतने पर देवी माता पार्वती जी वहां आ गईं. उन्होंने भगवान शिव जी से कहा कि यह आपने क्या अनर्थ कर दिया, ये तो पुत्र गणेश हैं. आप इन्हें पुनः जीवित करें. तब भगवान शिव ने गणेश जी को गजानन मुख देकर नया जीवन दिया. इस पर सभी देवता गजानन को आशीर्वाद दे रहे थे, परंतु चंद्र देव इन्हें देखकर मुस्करा रहे थे. चंद्रदेव का यह उपहास गणेश जी को अच्छा न लगा और वे क्रोध में आकर चंद्रदेव को हमेशा के लिए काले होने का शाप दे दिया.

श्राप के प्रभाव से चंद्र देव की सुंदरता खत्म हो गई और वे काले हो गए. तब चंद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी. तब गणपति ने कहा कि अब आप पूरे माह में केवल एक बार अपनी पूर्ण कलाओं में आ सकेंगे. यही कारण है कि पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं से युक्त होते हैं.

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