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शनिवार को शनि देव को ऐसे करें प्रसन्न, करें यें उपाय, तकलीफों का होगा अंत!

Date : 27-Nov-2021

नई दिल्ली (एजेंसी)। भगवान शनि देव को कर्मफल देवता माना जाता है. पुराणों में भी कहा गया है कि व्यक्ति जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल मिलेगा। मान्यता है कि शनिदेव की जिस पर गहरी नजर पड़ जाती है, उसको जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. शनि एक ऐसे देव हैं जो मनुष्य को उसके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं. अगर जीवन में शनि की दिशा खराब चल रही है तो इस इंसान को अलग अलग तरह की कई परेशानियों तक का सामना करना पड़ेगा . इतना ही नहीं जिसकी भी कुंडली में शनि अशुभ स्थान पर बैठे होते हैं, वो अपने जीवन में कई समस्याओं का सामना करता है.

ऐसे में भक्त कई नहीं चाहते हैं कि शनि देव उनसे नाराज है. ऐसे में शनि देव को प्रसन्न कर उनकी कृपा पाने के लिए भक्त कई तरह के उपाय करते हैं. माना जाता है कि शनिवार के दिन शनि देव की पूजा करने से वो प्रसन्न होते हैं. आइए जानते हैं शनिदेव को प्रसन्न करने के कुछ खास उपाए.

शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय

1. हनुमान जी का पूजन

अगर आप शनि देव को प्रसन्न करनना चाहते हैं तो सूर्य अस्त होने के बाद हनुमान जी की पूजन करें. कहते हैं कि हनुमान जी की पूजा में सिन्दूर रखें और आरती का दीप जलाने के लिए काले तिल के तेल का इस्तेमाल करें. इतना ही नहीं नीले रंग का फूल भी चढ़ाए.ये काफी लाभकारी सिद्ध होता है.

2. शनि यन्त्र को करें स्थापित

शनि के प्रकोप से जीवन में परेशानियों ने घेर लिया हो तो शनिवार को शनि यंत्र की स्थापना कर पूजन करें. इतना ही नहीं आपको हर रोज पूरे विधि विधान से इस यंत्र की पूजा करनी चाहिए. इससे शनिदेव बहुत खुश होते हैं. इसके अलावा हर दिन शनि यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलाएं और नीला या काला पुष्प चढ़ाएं, ऐसा करने से भी फायदा होगा.

3. काले चनों का लगांए भोग

पूजा से एक दिन पहले तीन बर्तनों में सवा-सवा किलो काले चने अलग-अलग भिगो दें. फिर अगले दिन स्नान करने के बाद विधि से शनि देव की पूजा करें और फिर सरसों के तेल में भीगे हुए चनों को छौंके दें, फिर इनका भोज भगवान को लगाएं. पूजा के बाद पहला सवा किलो चना भैंसे को खिला दें, फिर दूसरा सवा किलो चना कुष्ट रोगियों को बांट दें और तीसरे सवा किलो चने को अपने ऊपर से उतार कर अपने घर से दूर किसी ऐसी जगह रख आएं, जहां कोई जाता न हो.

4. काली गाय की सेवा

शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सबसे आसान है कि गाय की सेवा की जाए. आप किसी काली गाय की सेवा करें, ये काफी शुभकारी मानी गई है. आप काली गाय के मस्तक पर रोली लगाएं और सींगों में कलावा बांधकर पूजा और आरती करें. इसके बाद गाय की परिक्रमा करके उसको बून्दी के चार लड्डू खिलाएं.

5. सरसों के तेल का दीपक

शनिवार को शाम के वक्त बरगद और पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं। फिर दूध और धूप चढ़ाएं.

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इस साल 27 नवंबर को मनाई जाएगी काल भैरव जयंती, जानें पूजा करने की विधि

Date : 26-Nov-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। हिंदु धर्म में धार्मिक त्‍यौहार व्रतों का विशेष महत्‍व है। इस साल 27 नवंबर को काल भैरव जयंती मनाई जाएगी। कालभैरव को भगवान शिव का पांचवा अवतार माना जाता है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव जयंती मनाई जाती है। वहीं हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी का व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो कोई भी व्यक्ति कालभैरव जयंती के दिन विधि-विधान से उनकी पूजा करता है तो उससे वे प्रसन्न होते हैं। भैरवजी का स्वरुप भयानक माना जाता है लेकिन अपने भक्तों की वे सदैव रक्षा करते हैं। यह भी धार्मिक मान्यता है कि कालभैरव की पूजा करने से नकारात्मक शक्तियों, ऊपरी बाधा और भूत-प्रेत जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं।

भैरवजी अगर अपने भक्त पर प्रसन्न हो जाएं तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं और अगर वे किसी पर नाराज हो जाएं तो उसका अनिष्ट भी हो सकता है। भैरवजी की पूजा करते वक्त कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। हम आपको बता रहे हैं कि किस तरह भगवान भैरव की पूजा करें।

इस तरह करें कालभैरव की पूजा

धार्मिक मान्यता के अनुसार जो भी व्यक्ति कालभैरव जयंती के दिन उनकी पूजा करता है उससे उस शख्स को भय से मुक्ति मिल जाती है। इतना ही नहीं विधिवत पूजन करने से शत्रु बाधा और ग्रह बाधा से भी राहत मिलती है। इस दिन सुबह जल्दी उठना चाहिए और स्नान कर साफ वस्त्रों को धारण करना चाहिए। इसके बाद भगवान भैरव की प्रतिमा के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। उन्हें काले तिल, उड़द अर्पित करना चाहिए। साथ ही मंत्रों का जाप करते हुए विधिवत पूजा करना चाहिए।

इस दिन बिल्बपत्रों पर सफेद या लाल चंदन से ‘ॐ नमः शिवाय’ लिखकर शिव लिंग (Shiva Linga) पर चढ़ाना भी काफी शुभ होता है। कालभैरव जयंती के दिन भगवान शिव के विधिवत पूजन से भी कालभैरव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सारी मनोकामना पूर्ण कर देते हैं।

कालभैरव जयंती पर करें ये काम

– जिस तरह भगवान शिव का वाहन नंदी को माना जाता है उसी तरह भैरवजी का वाहन कुत्ता माना गया है। कालभैरव जयंती पर काले कुत्ते को मीठी रोटी या गुड़ के पुए खिलाना शुभ माना जाता है।

– इस दिन ‘ॐ कालभैरवाय नम:’ का जप एवं कालभैरवाष्टक का पाठ करने से ऊपरी बाधाएं, भूत-प्रेत की परेशानी दूर होती है।

– इस दिन किसी भी कालभैरव मंदिर में जाकर गुलाब, गूगल की खुशबूदार अगरबत्ती और चंदन चढ़ाना चाहिए। नींबू की माला भी भैरवजी को चढ़ाना चाहिए।

– इस दिन गरीबों को दान देना काफी शुभ माना जाता है।

इस दिन ना करें ये काम

– कालभैरव जयंती के दिन किसी से भी झूठ न बोलें और किसी को भी धोखा नहीं दें। ऐसा करने से बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
– गृहस्थ लोगों को इस दिन कालभैरव के सौम्य स्वरुप बटुक भैरव की पूजा करना चाहिए।
– इस दिन किसी भी पशु से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए।
– किसी का बुरा करने के लिए कभी भी कालभैरव की पूजा नहीं करना चाहिए।

नोट– उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

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अंगारकी चतुर्थी आज, भगवान गणेश को ऐसे करें प्रसन्‍न, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Date : 23-Nov-2021

नई दिल्‍ली (एजेंसी)। हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आज 23 नवंबर, मंगलवार को है। मंगलवार को चतुर्थी तिथि पड़ने के कारण इसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश के साथ बजरंगबली की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। अंगारकी चतुर्थी के दिन हनुमान जी और श्रीगणेश को सिंदूर का तिलक करने मंगलदोष से मुक्ति मिलती है।

अंगारकी चतुर्थी महत्व 

अंगारकी नाम का एक संत भगवान गणेश का परम भक्त था। वह ऋषि भारद्वाज और मां पृथ्वी का पुत्र था। अंगारकी ने भगवान गणेश की घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर भगवान गणेश उनके सामने प्रगट हो गए। और मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहा।

इस पर संत अंगारकी ने कहा, भगवान मैं हमेशा आपकी शरण में रहना चाहता हूं। इस पर भगवान गणेश ने एवमस्तु कहा। उन्होंने कहा कि जब भी मंगलवार को चतु्र्थी पड़ेगी उसे अंगारकी नाम से जाना जाएगा। अंगारकी को भगवान मंगल के नाम से भी जानते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और कुंडली में मंगल दोष का निवारण भी किया जाता है।

आज के शुभ मुहूर्त

अभिजीत मुहूर्त – 11:46 AM – 12:28 PM
अमृत काल – None
ब्रह्म मुहूर्त – 05:18 AM – 06:06 AM

चंद्रमा का समय-
चन्द्रोदय – Nov 23 8:26 PM
चन्द्रास्त – Nov 24 10:57 AM

अंगारकी चतुर्थी पूजा विधि-

1. सबसे पहले स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. इस दिन लाल वस्त्र पहनकर पूजा करना शुभ माना जाता है।
3. पूजा करते समय मुख उत्तर या पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
4. साफ आसन या चौकी पर भगवान श्रीगणेश को विराजित करें।
5. अब भगवान श्रीगणेश की धूप-दीप से पूजा-अर्चना करें।
6. पूजा के दौरान ॐ गणेशाय नमः या ॐ गं गणपते नमः मंत्रों का जाप करना चाहिए।
7. पूजा के बाद श्रीगणेश को लड्डू या तिल से बने मिष्ठान का भोग लगाएं।
8. शाम को व्रत कथा पढ़कर और चांद को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।
9. व्रत पूरा करने के बाद दान करें।

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कार्तिक पूर्णिमा 19 को, मां लक्ष्मी की ऐसे करें पूजा, जाने कब है शुभ मुहूर्त

Date : 18-Nov-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। हिंदू धर्म में पूर्णिमा का खास महत्व होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन दीपदान और ईश्वर की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन किए जाने वाले दान-पुण्य समेत कई धार्मिक कार्य विशेष फलदायी होते हैं। इस बार कार्तिक पूर्णिमा 19 नवंबर के दिन मनाई जाएगी।

जाने कब है शुभ मुहूर्त

पूर्णिमा तिथि 18 नवंबर को रात 12 बजकर 02 मिनट से आरंभ होगी और 19 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन लोग तेल के दीए जलाते हैं और घर को सुंदर रंगोलियों से सजाते है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन देवी-देवता स्वर्ग से धरती पर आते हैं और गंगा में स्नान करते हैं।

ऐसे करे पूजा

कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह के समय किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान करना बेहद शुभ माना जाता है। स्नान के बाद दीपदान के साथ ही भगवान श्रीकृष्ण और राधा की पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान से पुण्यफल भी दोगुना मिलता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ और घी का दान करने से संपत्ति बढ़ती है, वहीं भेड़ का दान करने से ग्रहयोग के कष्टों दूर होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखने वालों को इस दिन हवन जरूर करना चाहिए। इसके साथ ही यदि व्रती किसी जरुरतमंद को भोजन कराते हैं, तो उन्हें लाभ मिलेगा।

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जानें कार्तिक पूर्णिमा का स्नान क्यों होता है महत्वपूर्ण?

Date : 17-Nov-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। कार्तिक मास को धर्मशास्त्रों एवं पुराणों में सर्वाधिक पवित्र माना है। वेदों ने इस मास का नाम ऊर्ज रखा था। ऊर्ज का अर्थ भी तेजस्विता से है। वेदोत्तर काल में ऋषियों ने सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा नक्षत्राधारित नाम कार्तिक कहा। निरंतर आकाशावलोकन से यह निर्धारित किया कि कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि कृत्तिका नक्षत्र में होती है, अतएव इसे कार्तिक कहा जाना अधिक समीचीन है। जैसा कि कहा भी गया है-यस्मिन् मासे पौर्णमासी येन धिष्णेनसंयुता। तन्नक्षत्राह्वयो मास: पौर्णमास-तदुच्यते।।अर्थात् जिस किसी मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र हो, उस नक्षत्र के नाम से उस मास को जाना जाए। जैसे चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख उसी तरह कार्तिक भी कृत्तिका नक्षत्र से बना।

कालान्तर में महावैयाकरण महर्षि पाणिनि ने इसी तथ्य को सूत्रबद्ध करते हुए नक्षत्रेणयुक्त: काल: सास्मिन् पौर्णमासी कहा। कार्तिक मास मे भगवान सूर्य जो चराचरजगत् की आत्मा हैं, तुला राशि पर संचरण करते हैं। ज्योतिष के अनुसार, तुला राशि ब्रह्माण्ड की नाभि है। पृथ्वी का मध्य भाग तुला राशि का आरंभ बिंदु है। द्वादशराशियों में जब मध्यभाग समाप्त हो रहा होता है, तब तुला राशि प्रारंभ होती है। तुला का अर्थ तराजू है, जिसका कार्य संतुलन बनाना है। अत: दिग् देश, काल एवं वस्तु के असंतुलन को संतुलित करने के लिए ही ब्रह्मा जी ने इस मास की रचना की है। न केवल मानवों को अपितु चराचर जड़ चेतन सभी को स्वस्थ्य, समृद्धि, शांति एवं सुख प्रदान करने वाला मास यही है। इसी मास की पूर्णिमा से हेमंतऋतु का आगमन होता है।
जब ग्रीष्म, वर्षा आदि के द्वारा कभी जल विप्लव, झंझावात तथा अन्यान्य उपद्रवों से पृथ्वी ही नहीं, संपूर्ण प्रकृति असंतुलित हो जाती है, तब कार्तिक मास अशांति को

शमित करता हुआ चतुर्दिक सुख, शांति, समृद्धि बिखरेता हुआ संपूर्ण धराधाम को मंगलमय बना देता है। नदी, तालाब, कूप, भूमिस्थ जल स्वच्छ एवं मधुर हो जाते हैं। आकाश में ग्रह-नक्षत्र, तारे भी निर्मल दिखाई देने लगते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व 

कार्तिक पूर्णिमा को भगवान विष्णु का मत्स्यावतार, देव दीपावली, त्रिपुरासुर का संहार तथा भगवान् कार्तिकेय का दर्शन-पूजन महत्त्‍‌वपूर्ण कृत्य है। पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में कार्तिक मास का महत्त्‍‌व बताते हुए कहा गया है कि संपूर्ण कार्तिक मास में प्रात: सूर्योदय के पूर्व स्नान करने से दैहिक, दैविक, भौतिकताप शांत हो जाते हैं। जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन नियमपूर्वक स्नान करते हैं, रात्रि जागरण करते हैं, तुलसी में दीपदान, आंवले का पूजन, आंवला वृक्ष के नीचे भोजन तथा सायंकाल आकाशदीप दान करते हैं, वे देवताओं के लिए भी वंदनीय हो जाते हैं। कार्तिकी पूर्णिमा को पुष्करतीर्थ, द्वारकापुरी, सूकरक्षेत्र में व्रत पूजन विशेष फलदायी कहा गया है।

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जानें तुलसी विवाह के मुहूर्त और विधि, शुरू होंगी शादियां, जानें इस साल के विवाह मुहूर्त

Date : 16-Nov-2021

रायपुर।  इस बार देव प्रबोधिनी और तुलसी विवाह दो दिन 14 और 15 नवंबर  को मनाया जा रहा है। ऐसा पंचांगों में तिथियों की गणना में भेद होने की वजह हो रहा है। ये तिथि खास इसलिए है क्योंकि पद्म और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। इसी के साथ तप और नियम-संयम से रहने का चातुर्मास भी खत्म होता है। इस दिन से ही शादियां और गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक कामों की शुरुआत हो जाती है। इस दिन शाम को भगवान विष्णु का शालग्राम के रूप में तुलसी के साथ विवाह करवाने की भी परंपरा है।

इस दिन पड़ रही है देवोत्थान एकादशी, भगवान विष्णु को नींद से जगाने के लिए ऐसे करें पूजा-अर्चना 

15 नवंबर को मनाएं एकादशी

अखिल भारतीय विद्वत परिषद के साथ ही पुरी, उज्जैन और बनारस के ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि एकादशी तिथि 14 नवंबर को सुबह तकरीबन 8.34 से शुरू हो रही है और अगले दिन सुबह 8.26 तक रहेगी। 15 नवंबर को सूर्योदय के वक्त एकादशी तिथि होने से इसी दिन देवप्रोधिनी और तुलसी विवाह पर्व मनाया जाना चाहिए। सूर्योदय व्यापिनी तिथि के इस सिद्धांत का जिक्र निर्णयसिंधु, वशिष्ठ स्मृति और अन्य ग्रंथों में किया गया है।

तुलसी विवाह/पूजा विधि और शुभ मुहुर्त

शाम 5:15 से 6:50 बजे तक पूजा के लिए उत्तम समय है। इसकी पूजा विधि बहुत ही सहज है। इसे निम्न बिंदुओं में समझें –

1. तुलसी के गमले को सजाएं और उसके चारों ओर गन्ने का मंडप बनाएं, उस पर सुहाग का प्रतीक चुनरी ओढ़ाएं।
2. गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर श्रृंगार करें।
3. गणेश जी सहित भगवान शालिग्राम और तुलसी की पूजा करें। नारियल पर दक्षिणा चढ़ाएं।
4. भगवान शालिग्राम की मुर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी की सात बार परिक्रमा करें।
5. धूप-दीप के बाद आरती करें और विवाह के मंगल गीत गाएं।

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में तीर्थ स्नान कर के शंख और घंटा बजाकर मंत्र बोलते हुए भगवान विष्णु को जगाते हैं। फिर उनकी पूजा करते हैं। शाम को गोधूलि वेला यानी सूर्यास्त के वक्त भगवान शालग्राम और तुलसी का विवाह करवाया जाता है। साथ ही घरों और मंदिरों में दीपदान किया जाता है।

शिव पुराण: चार महीने योग निद्रा से जागते हैं भगवान विष्णु

शिव पुराण के मुताबिक, भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। भगवान विष्णु और दैत्य शंखासुर के बीच युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु बहुत अधिक थक गए। तब वे क्षीर सागर में आकर सो गए। उन्होंने सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव को सौंप दिया। इसके बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब शिवजी सहित सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु की पूजा की और वापस सृष्टि का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।

इस दिन तुलसी विवाह की भी परंपरा है। भगवान शालग्राम के साथ तुलसी जी का विवाह होता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसमें जालंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने वृंदा नामक अपनी भक्त के साथ छल किया था। इसके बाद वृंदा ने विष्णु जी को श्राप देकर पत्थर का बना दिया था, लेकिन लक्ष्मी माता की विनती के बाद उन्हें वापस सही करके सती हो गई थीं। उनकी राख से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ और उनके साथ शालग्राम के विवाह का चलन शुरू हुआ।

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जानें कब है देवउठनी एकादशी, 14 या 15 नवंबर को

Date : 14-Nov-2021

न्युज डेस्क (एजेंसी)। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं। इसे देवोत्थान एकादशी के नाम से भी जानते हैं। कहते हैं कि इस दिन चार माह की निद्रा के बाद भगवान विष्णु जागते हैं और सृष्टि का संचालन करते हैं। एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। एकादशी तिथि 14 नवंबर सुबह 5 बजकर 48 मिनट पर शुरू हो जाएगी, जो 15 नवंबर सुबह 6 बजकर 39 मिनट तक है। 14 नवंबर को उदयातिथि में इस तिथि के प्रारंभ होने से इसी दिन एकादशी का व्रत रखा जाएगा। 15 नवंबर को  सुबह श्री हरि का पूजन करने के बाद व्रत का पारण करें।

देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। कहते हैं कि इस दिन से शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। भगवान श्रीहरि की कृपा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

पूजा विधि

गन्ने का मंडप बनाने के बाद बीच में चौक बना लें। इसके बाद चौक के मध्य में चाहें तो भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रख सकते हैं। चौक के साथ ही भगवान के के चरण चिह्न बनाए जाते हैं, जिसको कि ढ़क दिया जाता है। इसके बाद भगवान को गन्ना, सिंघाडा और फल-मिठाई समर्पित किए जाते है। घी का एक दीपक जलाया जाता है जो कि रातभर जलता रहता है। भोर में भगवान के चरणों की विधिवत पूजा की जाती है। फिर चरणों को स्पर्श करके उनको जगाया जाता है। इस समय शंख-घंटा-और कीर्तन की आवाज की जाती है। इसके बाद व्रत-उपवास की कथा सुनी जाती है। जिसके बाद सभी मंगल कार्य विधिवत शुरु किए जा सकते हैं।

एकादशी के दिन नहीं खाए जाते चावल-

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल खान से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है। लेकिन द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए, इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है। जिस दिन महर्षि मेधा अंश पृथ्वी में समाया था, उस दिन एकादशी तिथि थी। इसलिए इस दिन चावल खाने से परहेज करना चाहिए।

शास्त्रों में सभी 24 एकादशियों में चावल खाने को वर्जित माना गया है। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से इंसान रेंगने वाले जीव योनि में जन्म लेता है। इस दिन भूलकर भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने के साथ ही खान-पान, व्यवहार और सात्विकता का पालन करना चाहिए।

कहा जाता है कि एकादशी के पति-पत्नी को ब्रह्नाचार्य का पालन करना चाहिए।

मान्यता है कि एकादशी का लाभ पाने के लिए व्यक्ति को इस दिन कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही लड़ाई-झगड़े से भी बचना चाहिए।

एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठना शुभ माना जाता है और शाम के समय नहीं सोना चाहिए।

एकादशी के दिन करें ये काम-

एकादशी के दिन दान करना उत्तम माना जाता है।

एकादशी के दिन संभव हो तो गंगा स्नान करना चाहिए।

विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए एकादशी के दिन केसर, केला या हल्दी का दान करना चाहिए।

एकादशी का उपवास रखने से धन, मान-सम्मान और संतान सुख के साथ मनोवांछित फल की प्राप्ति होने की मान्यता है।

कहा जाता है कि एकादशी का व्रत रखने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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जानें नवंबर माह में किस दिन पड़ रहा है भौम प्रदोष व्रत, ऐसे करें पूजा

Date : 13-Nov-2021

 न्युज डेस्क (एजेंसी)। प्रदोष व्रत भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष रूप से समर्पित है। प्रत्‍येक माह की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। आपको बता दें कि हर माह में दो प्रदोष व्रत रखे जाते हैं एक कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शिव भक्त प्रदोष व्रत रखेंगे। इस बार 16 नवंबर, मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन मंगलवार होने के कारण इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। इस दिन भगवान शिव के साथ हनुमान जी का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इसलिए कहते हैं कि उन्हें प्रसन्न करने के लिए भक्तों को प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी जाती है।

प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उनके समस्त संकटों का नाश होता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन प्रदोष काल में पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। और भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं। आइए जानते हैं भौम प्रदोष व्रत का महत्व, पूजन का समय और पूजन विधि के बारे में।

भौम प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त 

कार्तिक मास शुक्ल पक्ष तिथि आरंभ- 16 नवंबर 2021 प्रातः 10 बजकर 31 मिनट से शुरु होकर
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष तिथि समाप्त- 17 नवंबर 2021 दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर होगा।
पूजन शुभ मुहूर्त- शाम 6 बजकर 55 मिनट से लेकर 8 बजकर 57 मिनट तक
प्रदोष व्रत का पूजन सदैव प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय ही किया जाता है।

प्रदोष व्रत का महत्व 

भगावन शिव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि के व्रत और पूजा आदि करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि भोलेशंकर को ये दोनों अति प्रिय है, इसलिए भक्त ये व्रत रखकर भगवान शिव को प्रसन्न करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत को नियम और निष्ठा के साथ रखने से व्यक्ति के कष्टों का नाश होता है। वहीं, मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ने से हनुमान जी की कृपा भी प्राप्त होती है। उस दिन पूजा पाठ आदि करने से कुंडली में मंगल मजबूत होता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

प्रदोष व्रत पूजन विधि

हर माह त्रयोदशी तिथि को प्रातः उठकर स्नानादि करने के बाद दीप प्रज्वलित करें और व्रत का संकल्प लें। इस दिन पूरा दिन व्रत करने के बाद प्रदोष काल में किसी मंदिर में जाकर पूजन करना चाहिए। अगर मंदिर जाना संभव न हो तो घर में ही मंदिर या स्वच्छ स्थान पर शिवलिंग स्थापित करके पूजन करें। पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, घी व गंगाजल से अभिषेक करें। धूप-दीप फल-फूल, नैवेद्य आदि से विधिवत पूजन करें। पूजन और अभिषेक के दौरान शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र नमः शिवाय का जाप अवश्य करें।

नोट– उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

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शनिवार को करें बस ये 5 उपाय, शनिदेव की आप पर बरसेगी कृपा

Date : 13-Nov-2021

रायपुर। आज शनिवार है और यह दिन शनिदेव को समर्पित माना जाता है. मान्यता है कि भगवान शनिदेव की पूजा-अर्चना से व्यक्ति का जीवन खुशहाल हो जाता है. शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है, जो व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं. शनि जब किसी पर मेहरबान होते हैं तो उसका पूरा जीवन बदल देते हैं. वो व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तीनों तरह से समृद्ध रहता है. लेकिन शनि जब किसी से रुष्ट होते हैं तो उसका जीना भी मुश्किल कर देते हैं. इसलिए शनि के नाम से ही लोग घबरा जाते हैं.

अगर आपकी कुंडली में भी शनि अशुभ स्थिति में विराजमान हैं और आपको लगातार कष्ट दे रहे हैं या आप साढ़े साती और शनि की ढैय्या के कष्ट को झेल रहे हैं, तो शनिवार का दिन आपके लिए बहुत खास है. शनिवार के दिन कुछ उपाय करके आप शनिदेव को आसानी से प्रसन्न कर सकते हैं, साथ ही उनके द्वारा दिए जाने वाले कष्टों से मुक्ति पा सकते हैं. साथ ही धन संबन्धी समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं. जानिए इन उपायों बारे में.

ये 5 उपाय दूर करेंगे शनिदेव की नाराजगी

1. शनिवार के दिन सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ में दीपक जलाने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं. अगर पीपल का पेड़ किसी मंदिर में लगा हो, तो इसे और भी शुभ माना जाता है. ऐसा करने से आपके कई कष्ट दूर हो जाते हैं. आर्थिक रूप से विशेष लाभ मिलता है.

2. शनिदेव हनुमान जी को अपना सच्चा मित्र मानते हैं और उनकी पूजा करने वाले से ​अत्यंत प्रसन्न होते हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार शनिदेव ने हनुमान जी को वचन दिया था कि वे हनुमान जी के भक्तों को कभी नहीं सताएंगे. ऐसे में शनिदेव के कष्टों से मुक्त होने के​ लिए आप शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें.

3. अगर आपके आसपास कोई शनि मंदिर है तो आप शनिवार के दिन शनिदेव की प्रतिमा पर नीले रंग का पुष्प चढ़ाएं और सरसों का तेल चढ़ाएं. इससे भी शनि प्रसन्न होते हैं. लेकिन कुछ भी अर्पित करते समय अपनी आंखों को नीचे झुकाकर रखें. शनिदेव से नजरें न मिलाएं क्योंकि उनकी दृष्टि वक्र मानी जाती है.

4. हर शनिवार को पीपल को जल चढ़ाकर सात बार उसकी परिक्रमा करें. पीपल में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है. गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूं. शनिदेव को श्रीकृष्ण भगवान का अनन्य भक्त माना जाता है, इसलिए वे पीपल की पूजा करने वाले व्यक्ति से बहुत प्रसन्न होते हैं.

5. किसी जरूरतमंद व्यक्ति को शनिवार के दिन आप तेल दान करें. तेल दान करने से पहले उस तेल को एक बर्तन में लेकर उसमें अपना चेहरा देख लें. इससे शनि का प्रभाव कम हो जाता है. इसके अलावा शनिवार के दिन किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, वस्त्र, काली दाल, काले तिल, काले चने आदि कोई काले रंग की वस्तु देकर उसकी मदद करें. कुत्तों को सरसों का तेल लगी रोटी खिलाएं.

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इस दिन लगेगा साल का आखिरी सूर्यग्रहण

Date : 10-Nov-2021

नई दिल्ली (एजेंसी)। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रहण को में अति महत्वपूर्ण माना गया है। सूर्य ग्रहण की स्थिति एक बार फिर बनने जा रही है। इसी कड़ी में अभी साल का आखिरी सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण  लगने वाला है। पंचांगों के मुताबिक, इस साल का आखिरी सूर्य ग्रहण 04 दिसंबर 2021 को लगेगा।

बता दें कि साल के आखिरी माह यानि 4 दिसंबर को अमावस्या यानी मार्गशीष मास की कृष्ण पक्ष तिथि है। इस बार इस सूर्यग्रहण का प्रभाव दक्षिण अफ्रीका, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और अटलांटिक के दक्षिणी भाग पर सबसे ज्‍यादा देखने को मिल सकता है।

वैसे भी ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है। सूर्य ग्रहण जब भी लगता है उसका असर खासतौर पर राशियों पर पड़ता है। इस बार भी सूर्यग्रहण का असर सभी राशियों पर दिखाई देगा किसी पर नकारात्‍मक तो किसी पर सकारात्मक।

बताया जाता है कि जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है, जिससे पृथ्वी पर सूर्य की छवि पूरी तरह या आंशिक रूप से अस्पष्ट हो जाती है।
बताते चलें, इस साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण शुक्रवार 19 नवंबर, 2021 को लगने वाला है. यह आंशिक चंद्र ग्रहण होगा और लगभग छह घंटे तक चलेगा.

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