Spiritual

पंचतत्व में छिपा है सेहत का महामंत्र, हमें शारीरिक और मानसिक पोषण देते हैं यह पांच तत्व

सुश्री संध्या श्रीवास्तव। कहा गया है कि जो ब्रह्मांड में है वही पिंड में है। पंचतत्वों का आपसी समन्वय, सामंजस्य, विश्वास ही इकोलाजी है जिससे इकोसिस्टम चलता है। प्रकृति बचाने के लिये हर तत्व को हृदय से जानना होगा, समझना होगा, उनके साथ एक सामंजस्य बना कर रखना होगा। 

क्षिति 
क्षिति अर्थात मिट्टी  का तत्व। ये मानव शरीर जो मिट्टी का पुतला कहलाता है अन्न उसका पोशण करता है। इस तत्व का गुण गंध है। इसी तरह हम फूलों की क्यारी के पास से गुजरते हैं तो उसकी खुशबू से मन प्रसन्न हो जाता है तो वहीं अगर बदबू नाक में जाती है तो हाल बेहाल हो जाता है। इस तरह गंध हमारे शरीर पर गहरा असर छोड़ती है। यदि पर्यावरण दूषित दुर्गंध युक्त होता है तो हमें रक्त विकार एवं चर्मरोग का सामना करना पड़ता है। वहीं एरोमा थेरेपी में फल फूल की खुशबू से ही सारे रोगों के उपचार हो जाते। अथात् प्रकृति की सुगंध में ही हमारी सेहत का राज छिपा है। 

जल तत्व 
यह दूसरा तत्व है ,जल ही जीवन है। श्रृग्वेद में कहा गया है कि जल ही औशधि है, इसलिये यह तुम्हारे भी समस्त रोग दूर करे। इसकी प्रकृति षीतल, गुण -रस है। किडनी में सभी द्रव्य का परिचालन और शुद्धिकरण होता है। 
यह जल दो गेैसों के संयोग से बना है इसीलिये जल तत्व ही एक ऐसा तत्व है जिसमें लय और प्रलय के गुण एक साथ हैं। 

पावक
यह तीसरा तत्व अर्थात अग्नि तत्व वह तत्व है जो कि जीवन का उत्पादक है। इससे जठराग्नि उत्पन्न होती है, क्षुधा जागृत होती है पाचनसंस्थान कार्य करता है। जिसके तीन प्रकार शरीर में होते हैं। प्रथम जठराग्नि, जिसका संबंध हमारी क्षुधा तथा पाचन संस्थान से है। दूसरी चित्ताग्नि जिससे हमारे व्यक्तित्व में प्रभाव रहता है। तीसरी भूताग्नि है जो षरीर और मन पर नियंत्रण रखती है।इसका गुण रूप है। हम जो भी देखते हैं उसे दिल में वैसा अनुभूत करते है। इसीलिये अपने मन को आनंदमय बनाने के लिये वातावरण स्वच्छ और प्रकाशवान बनाना आवश्यक है ।

समीरा 
यह चैथा तत्व यानि वायुतत्व  है, जिसे हम त्वचा में स्पर्श के माध्यम से अनुभूत करते ष्वसन के माध्यम से वायु शरीर में प्रवाहित होती है। इसलिये षुद्ध वायु का होना आवश्यक है। जो कि हमें जंगल, वन उपवन वृक्षों से प्राप्त होती है। वृक्षारोपण आवष्यक है।

आकाश
जिसका गुण शब्द है मान्यता है जब से ब्रहृांड है तब से षब्द ऊॅं ब्रहृांड में गुंजायमान है जिसके सकारात्मक प्रभावों के वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं। जिससे संगीत बना है। यही कारण है कि संगीत की रागात्मकता मन प्राण में आनंद की हिलोरें उत्पन्न करतीं हैं। वहीं शोर शराबा मानसिक शांति भंग करता है। यहां हम देखते हैं कि किस तरह पांचों तत्व हमारे भीतर हमारे शरीर में समाये हैं जो हमारा शारीरिक और मानसिक पोषण करते हैं। जिसका संरक्षण आवश्यक है।
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गुरु व परमात्मा का दायित्व

परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम्हें जो होना है, हो जाओ। वह तुम्हारे जीवन की किताब को कोरी छोड़ देता है, तुम्हें जो लिखना हो लिख लो। तुम्हें पाप करना है पाप करो, पुण्य करना हो पुण्य करो। तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो व स्वभावत: नीचे उतरना आसान है, ऊपर चढना कठिन है। सो लोग नीचे उतरते हैं। लोग पाप मे उतरते हैं। पाप में प्रबल आकर्षण मालूम होता है, क्योंकि वह सरल मालूम होता है। परमात्मा ने स्वतंत्रता दी है व परिणाम यह है कि लोग गुलाम हो गये हैं-वासनाओं के, संसार के।

गुरु का काम ठीक उलटा है। गुरु अनुशासन देता है। गुरु जीवन को जीने का ढंग, शैली देता है। गुरु शास्ता है, शासन देता है। जीवन को रंग रुप देता है। तुम्हारे अनगढ़ पत्थर को ढालता है, इसलिये ऊपर से तो लगता है कि जो लोग गुरु के पास गये, वे गुलाम हो गये। ऊपर से ये बात ठीक भी मालूम पडती है, क्योंकि अब जो गुरु कहेगा, वैसा वे जियेंगे। गुरु का इशारा अब उनका जीवन होगा। गुरु के सहारे चलेंगे। गुरु की नाव में यात्रा होंगी। गुरु की शर्तें स्वीकार करनी होंगी। गुरु के प्रति समर्पण करना होगा, तो बडा विरोधाभास है। परमात्मा स्वतंत्रता देता है व परिणाम है कि सभी लोग परतंत्र हो गये हैं व गुरु अनुशासन देता है व परिणाम में स्वतंत्रता उपलब्ध होती है। क्योंकि जैसै-जैसै व्यक्ति अनुशासित होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति के जीवन में एक व्यवस्था, एक तंत्र पैदा होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति जीवन में होश संभालता है। जैसै-जैसै व्यक्ति जागरुक जीवन होने लगता है, वैसै-वैसै स्वतंत्रता का नया आयाम खुलता है, स्वच्छंदता पैदा होती है। 'स्वच्छंदता' शब्द का अर्थ उच्छ्रंखलता मत लेना। 
स्वच्छंदता का ठीक वही अर्थ होता है, जो स्वतंत्रता का है। स्वतंत्रता से भी बहूमूल्य शब्द है स्वच्छंदता। 'स्वच्छंद' का अर्थ होता है, जिसके भीतर का छंद जग गया, जिसके भीतर का गीत जग गया यानी जो अपना गीत गाने योग्य हो गया। जो गीत गाने के लिये परमात्मा ने तुम्हें भेजा था व तुम भटक गये थे। जो बनने के लिये तुम्हें परमात्मा ने भेजा था, लेकिन तुम विपरीत चले गये थे, क्योंकि वह हजार आकर्षण थे व तुम्हें कुछ होश न था।

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प्रेरणा/ खुश रहना मेरी आदत है!


हर मानुष्य में वह असीम शक्ति छिपी हुई है जो दुनिया की  किसी भी समस्या को सुलझा  सकती है। सच्ची खुशी आपको उस दिन मिलेगी जिस दिन आप यह जान लेंगे कि आप किसी भी कमजोरी से पार पा सकते है और आपका अवचेतन मन आपकी हर समस्या को सुलझा  सकता है उस दिन आपको अपेक्षा से कहीं अधिक समृद्ध बना सकता है। आपको उस दिन सबसे ज्यादा खुशी हुई होगी जिस दिन आपके घर में आपके चाहते मेहमान आए होंगे या आप स्कूल-कॉलेज में प्रथम स्थान हासिल किए होंगे या आपको बड़ी जीत या पुरस्कार मिला था। आपको उस समय भी बड़ी खुशी हुई होगी जब आपकी सगाई या शादी किसी सुंदर स्त्री/पुरूष  से हुई होगी। ऐसे आपके जीवन में कई अवसर आए होंगे जब आपको खुशी मिली होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि यह खुशी स्थाई नहीं बल्कि क्षणिक ही होगी।

खुशी मन क ी अवस्था है। आप स्वतंत्र है और खुश रहना मनुष्य का  स्वभाव है। आप जितना सरल और सहज रहेंगे आपको उतनी ही खुशी का  अहसास होगा। जीवन की महान वस्तुएं बहुत ही सरल, सहज, गतिशील और रचनात्मक होती है। कई साल पहले मैं अपने गांव के एक किसान को देखता था। वह हमेशा काफी खुश रहता था। वह हमेशा गुनगुनाता और हंसता-मुस्कुराता दिखाई देता था। मैंने उससे अपनी खुशी को राज जानना चाहा तो वह बोला खुश रहना मेरी आदत है। मैं हमेशा सुबह उठकर खेत जाकर फसलों के फलने फूलने की कामना करता हूं और ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझे  बढ़िया फसल की सौगात दी है। पालतू जानवर और परिवार वालों के साथ समय बिताता हूं और अपनी संवेदनाओ को साझा  करता हूं। उस किसान ने कई सालों से ऐसा करने की आदत बना ली थी। अगर किसी विचार को लगातार दोहराते है तो वे आपके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है और आपकी आदत में शामिल हो जाते है। इसलिए उस किसान ने इस बात पता लगा लिया था कि खुश रहना एक आदत है। आपको खुश रहने की इच्छा दिल से करनी चाहिए न कि तर्क से !। 

कुछ लोग होते है जो हमेशा निराश, नाखुश और उदास रहते है और वे नाकारात्मक विचार को अपने आदत में शामिल कर दुख: को अपना साथी बना लिए है। उदाहरण के लिए  मैं आप लोगों को मिलन भाई के बारे में बताना चाहूंगा। जो मेरे पड़ोसी, बड़े भाई और मित्र है। मिलन भाई गांव में मेरे सबसे करीबी और उत्तम साथी है। नाम से ही पता चलता है कि वे मिलानुसार और मृदुभाषी है।  पूरे गांव में वे ही एक ऐसे व्यक्ति जो हमेशा दुसरों के दुख दर्द बांटते है और मद्द के लिए सबसे आगे रहते है। दूसरी ओर पूरे गांव में ही वे एक ऐसी व्यक्ति है जो हमेशा दुखी और उदास रहते है। इसका महत्पूर्ण कारण भी है।  मैं अक्सर लेट उठता हूं पर सुबह मिलन भाई से सबसे पहले मै ही मिलता हूं। अक्सर वे किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा करते है और निराश हो जाते है। अगर पानी कम गिरा तो फसल का क्या होगा ?, अगर धूप ज्यादा निकली तो फसल का क्या होगा? फसल कम हुई तो परिवार का क्या होगा? पालतु जानवर को चारा कहां मिलेगा? पशु-पक्षी का क्या होगा?। जब भी वे किसी सुंदर कन्या या स्त्री को देखता है तो भी निराश! मै कैसा दिखता हूं?। अमीर व्यक्ति को देखे तो मैं कितना गरीब हूं। शादी-विवाह या उत्साव में भी शामिल होने पर दूसरों से तुलना... मेरा कपड़ा अच्छा नहीं है! तो मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं ! बगैरह.....बगैरह..... और फिर निराशा, उदासी। अक्सर देखा गया है कि ऐसे व्यक्ति उन व्यक्ति से ज्याद मिलना पसंद करते है जो हमेशा दुखी और निराश रहते है। अगर आप किसी दूसरे व्यक्ति से मिलते है और वे दुखी और निराश है तो उसे खुश करना आपकी जिम्मेदी है...पर ऐसा न होकर अक्सर लोग स्वयं दुखी हो जाते है । मिलन भाई शिक्षित, बुद्धिमान और कला पे्रमी है और वे सबसे दुखी व्यक्ति भी है। उनके जीवन में यदि अचानक ऐसा कुछ घट जाए जो बहुत खुशी देने वाला हो तो भी वे इसके प्रति इस तरह से प्रतिक्रिया देते है जैसे कि मुॐक्कद्ध  किसी ने कहा है अधिक खुश होना भी ठीक नहीं है। ऐसे लोग अपने मानसिक प्रारूप में रहने के हतने आदी हो जाते है कि वे खुशी के अवसर आने पर भी खुश होना नहीं चाहते है। वे हमेशा उदास, नाखुश और निराशा की अवस्था में ही रहना चाहते है। कई लोग कुछ विचारों को मन में स्थान देकर नाखुश रहने का निश्चय करते है जैसे आज का दिन मेरे लिए शुभ नहीं है! तो आज शनिवार है और शनि की छाया मेरे उपर है आदि..। अगर घर में कोई बच्चा वर्तन गिरा देता है तो - आज का दिन मेरे लिए मनहूस है, आज मेरे साथ सब कुछ गलत होना वाला है। मेरा व्यापार खराब हो रहा! मुॐक्कद्ध सफलता नहीं मिल रही है। यदि आपके मन में विचार इसी तरह का होता है तो आप इन्ही सारे अनुभवों को अपनी और आकर्षित कर रहें होते है और हमेशा दुखी ही रहेंगे।

  जैसे कि मै पहले कह चूका हूं अगर किसी विचार को लगातार दोहराते है तो वे आपके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है और आपकी आदत में शामिल हो जाते है। आपको इस बात का अहसास होना चाहिए कि आपके आसपास जो कुछ भी घटता है, दुनिया का जो स्वरूप और अनुभव आप करते है वह आपके अपने विचारों का ही परिणाम होता है। अमेरिका के महान दार्शनिक इमर्शन के अनुसार मनुष्य दिन भर जो कुछ सोचता है वह उसी विचार के अनुरूप हो जाता है। आदमी के चिवार ही उसके व्यक्तित्व को गढ़ते है। जिन विचारों को आप आदतन अपने मन में स्थान देते है उसमें आने आप को वास्तविकता के भौतिक धरातल पर उतारने की क्षमता होती है। यह सुनिश्चित करें कि आप स्वयं को किसी तरह के नकारात्मक, निराशाजनक, क्रूर विचारों में न घिरने दें। हमेशा अपने मन में सकारात्मक विचार रखें ।आपको पूरे मन से यह इच्छा रखनी होगी कि आप खुश रहना चाहते  और आपकी इच्छा के बिना कुछ भी पूरा नहीं हो सकता। इच्छा वह चाह है जिसके साथ कल्पना और विश्वास के पंख लगे होते है। अपनी इच्छा को कल्पना में पूर्ण होते देखें और इस वास्तविकता को महसूस करें। आपकी इच्छा वास्तविकता में बदल जाएगी। खुश रहने का यही रहस्य है।

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