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आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने किया एक बड़ा खुलासा, पेपर कप में चाय पीना होता है कितना खतरनाक जान कर चौंक जाएंगे आप

Date : 09-Nov-2020

नई दिल्ली (एजेंसी)। आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा खुलासा किया है जिसे सुनकर आप भी सकते में आ जाएंगे। दरअसल इन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि एक व्यक्ति प्रतिदिन पेपर कप में औसतन तीन बार चाय या कॉफी पीता है, तो वह 75,000 छोटे सूक्ष्म प्लास्टिक के कणों को निगलने का काम करता है।

रिसर्च में इस बात की पुष्टि हुई है कि कप के भीतर के अस्तर में इस्तेमाल सामग्री में सूक्ष्म-प्लास्टिक और अन्य खतरनाक घटकों की उपस्थिति होती है और उसमें गर्म तरल पदार्थ परोसने से पदार्थ में दूषित कण आ जाते हैं।

पेय पदार्थों के सेवन के लिए डिस्पोजेबल पेपर कप लोकप्रिय विकल्प साबित हुआ है. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि पेपर कप के भीतर आमतौर पर हाइड्रोफोबिक फिल्म की एक पतली परत होती है जो ज्यादातर प्लास्टिक (पॉलीथीन) और कभी-कभी सह-पॉलिमर से बनी होती है।

इस स्थिति से बचने के लिए क्या पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों का डिस्पोजेबल उत्‍पादों के स्‍थान पर इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए, इस सवाल पर आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रो. वीरेंद्र के तिवारी ने कहा, “इस शोध से यह साबित होता है कि किसी भी अन्‍य उत्‍पाद के इस्‍तेमाल को बढ़ावा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह उत्‍पाद पर्यावरण के लिए प्रदूषक और जैविक दृष्टि से खतरनाक न हों। ”

“हमने प्लास्टिक और शीशे से बने उत्‍पादों को डिस्पोजेबल पेपर उत्‍पादों से बदलने में जल्‍दबाजी की थी, जबकि जरूरत इस बात की थी कि हम पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की तलाश करते। भारत पारंपरिक रूप से एक स्थायी जीवन शैली को बढ़ावा देने वाला देश रहा है और शायद अब समय आ गया है, जब हमें स्थिति में सुधार लाने के लिए अपने पिछले अनुभवों से सीखना होगा। ”

प्रोफेसर सुधा गोयल ने कहा, – ‘हमारे रिसर्च के अनुसार एक पेपर कप में रखा 100 मिलीलीटर गर्म तरल (85-90 ओसी), 25,000 माइक्रोन-आकार (10 माइक्रोन से 1000 माइक्रोन) के सूक्ष्म प्लास्टिक के कण छोड़ता है और यह प्रक्रिया कुल 15 मिनट में पूरी हो जाती है।

ये सूक्ष्म प्लास्टिक आयन जहरीली भारी धातुओं जैसे पैलेडियम, क्रोमियम और कैडमियम जैसे कार्बनिक यौगिकों और ऐसे कार्बनिक यौगिकों, जो प्राकृतिक रूप से जल में घुलनशील नहीं हैं में, समान रूप से, वाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं। जब यह मानव शरीर में पहुंच जाते हैं, तो स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने शोध के लिए दो अलग-अलग प्रक्रियाओं का पालन किया। पहली प्रक्रिया में, गर्म और पूरी तरह स्‍वच्‍छ पानी (85–90 ◦C; pH~6.9) को डिस्पोजेबल पेपर कप में डाला गया और इसे 15 मिनट तक उसी में रहने दिया गया। इसके बाद जब इस पानी का विश्‍लेषण किया गया, तो पाया गया कि उसमें सूक्ष्म-प्लास्टिक की उपस्थिति के साथ-साथ अतिरिक्त आयन भी मिश्रित हैं।

जबकि, दूसरी प्रक्रिया में, कागज के कपों को शुरू में गुनगुने (30-40 डिग्री सेल्सियस) स्‍वच्‍छ पानी (पीएच/ 6.9) में डुबोया गया और इसके बाद, हाइड्रोफोबिक फिल्म को सावधानीपूर्वक कागज की परत से अलग किया गया और 15 मिनट के लिए गर्म एवं स्‍वच्‍छ पानी (85–90 °C; pH~6.9) में रखा गया। इसके बाद इस प्लास्टिक फिल्‍म के गर्म पानी के संपर्क में आने से पहले और बाद में उसमें आए भौतिक, रासायनिक और यांत्रिक गुणों में परिवर्तन की जांच की गई।

प्रो. गोयल ने कहा कि एक सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं ने बताया कि चाय या कॉफी को कप में डाले जाने के 15 मिनट के भीतर उन्‍होंने इसे पी लिया था. इसी बात को आधार बनाकर यह शोध समय तय किया गया। सर्वेक्षण के परिणाम के अलावा, यह भी देखा गया कि इस अवधि में पेय अपने परिवेश के तापमान के अनुरूप हो गया।

दरअसल देश में पहली बार किए गए अपनी तरह के इस शोध में सिविल इंजीनियरिंग विभाग की शोधकर्ता और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुधा गोयल तथा पर्यावरण इंजीनियरिंग एवं प्रबंधन में अध्‍ययन कर रहे शोधकर्ता वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसेफ ने बताया कि 15 मिनट के भीतर यह सूक्ष्म प्लास्टिक की परत गर्म पानी की प्रतिक्रिया में पिघल जाती है।

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अब कोरोना संक्रमण की जांच केवल मिनट में

Date : 31-Oct-2020

हेल्थ डेस्क (एजेंसी) । इन हाल ही में शोधकर्ताओं ने CRISPR तकनीक की मदद से एक ऐसा नैदानिक परीक्षण विकसित किया है जिससे केवल 5 मिनट में कोरोनावायरस का पता लगाया जा सकता है। और तो और, इसके निदान के लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता भी नहीं होगी और इसे क्लीनिक, स्कूलों और कार्यालय भवनों में स्थापित किया जा सकता है।

युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के आणविक जीव विज्ञानी मैक्स विल्सन इस खोज को काफी महत्वपूर्ण मानते हैं। वास्तव में CRISPR तकनीक की मदद से शोधकर्ता कोरोनावायरस जांच को गति देने की कोशिश करते रहे हैं। इससे पहले इसी तकनीक से जांच में 1 घंटे का समय लगता था जो पारंपरिक जांच के लिए आवश्यक 24 घंटे की तुलना में काफी कम था।

CRISPR परीक्षण सार्स-कोव-2 के विशिष्ट 20 क्षार लंबे आरएनए अनुक्रम की पहचान करता है। पहचान के लिए वे ‘गाइड’ आरएनए का निर्माण करते हैं जो लक्षित आरएनए के पूरक होते हैं। जब यह गाइड लक्ष्य आरएनए के साथ जुड़ जाता है तब CRISPR -Cas13 सक्रिय हो जाता है और अपने नज़दीक इकहरे आरएनए को काट देता है। इस काटने की प्रक्रिया में परीक्षण घोल में फ्लोरेसेंट कण मुक्त होते हैं। इन नमूनों पर जब लेज़र प्रकाश डाला जाता है तब फ्लोरेसेंट कण चमकने लगते हैं जो वायरस की उपस्थिति का संकेत देते हैं। हालांकि, प्रारंभिक CRISPR जांचों में शोधकर्ताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी जिसमें आरएनए को काफी आवर्धित करना पड़ता था। ऐसे में इस प्रयास में जटिलता, लागत, समय तो लगा ही साथ ही दुर्लभ रासायनिक अभिकर्मकों पर भी काफी दबाव रहा।

लेकिन, इस वर्ष की नोबेल पुरस्कार विजेता और CRISPR की सह-खोजकर्ता जेनिफर डाउडना ने एक ऐसा CRISPR निदान खोज निकला है जिसमें कोरोनावायरस आरएनए को आवर्धित नहीं किया जाता। डाउडना की टीम ने इस जांच की प्रभाविता बढ़ाने के लिए सैकड़ों गाइड आरएनए को आज़माया। उन्होंने दावा किया था कि प्रति माइक्रोलीटर घोल में मात्र 1 लाख वायरस हों तो भी पता चल जाता है। एक अन्य गाइड आरएनए जोड़ दिया जाए तो प्रति माइक्रोलीटर में मात्र 100 वायरस होने पर भी पता चल जाता है।

यह जांच पारंपरिक कोरोनावायरस निदान के समान नहीं है। फिर भी उनका ऐसा मानना है कि इस नई तकनीक से 5 नमूनों के एक बैच में परिणाम काफी सटीक होते हैं और प्रति परीक्षण मात्र 5 मिनट का समय लगता है जिसके लिए पहले 1 दिन या उससे अधिक समय लगता था।

विल्सन के अनुसार इस परीक्षण में फ्लोरेसेंट सिग्नल की तीव्रता वायरस की मात्रा को भी दर्शाती है, जिससे न केवल पॉज़िटिव मामलों का पता लगता है बल्कि रोगी में वायरस की मात्रा का भी पता लग जाता है। फिलहाल डाउडना और उनकी टीम अपने परीक्षणों को मान्यता दिलवाकर बाज़ार में लाने के प्रयास कर रही है।

-स्रोत फीचर्स

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नागपंचमी पर कैसे करें पूजा जानें

Date : 25-Jul-2020

नाग पंचमी का पर्व बहुत ही विशेष पर्व है. इस पर्व का संबंध सुख समृद्धि से भी है. नाग पंचमी पर नाग देव की पूजा की जाती है. भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का भी विधान है. भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्ण को सृष्टि का कल्याण करने वाला पालन हार कहा गया. शिव का अर्थ ही कल्याण है. इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है. क्योंकि भगवान शिव के गले में नाग देव विराजते हैं. इनका वासुकि है. वहीं श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का घमंड चूर-चूर किया था.

नाग पंचमी पर ऐसे करें पूजा

इस दिन घर के दरवाजें पर सांप की आठ आकृति बनाएं. इसके बाद इनकी पूजा करें और मिष्ठान का भोग लगाएं. नाग पूजा में हल्दी का प्रयोग करें. नाग पंचमी के दिया जाने वाला दान भी उत्तम माना गया है.

इसलिए नाग को दिया जाता है दूध

एक कथा के अनुसार जब एक श्राप के कारण नागलोक के सांप अग्नि में जलने लगे. दूध शीतल होता है. तब नागों को इस दर्द और पीड़ा से बचाने के लिए कच्चे दूध से स्नान कराया गया. मान्यता है कि जो व्यक्ति नाग पंचमी के दिन पूरी श्रद्धा से पूजा करता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

नाग पंचमी के दिन नहीं करने चाहिए ये काम

नाग पंचमी के दिन लोहे की कढ़ाई में भोजन नहीं बनाना चाहिए. वहीं इस दिन भूमि की खुदाई करना भी शुभ नहीं माना गया है.

ये कार्य करने चाहिए

इस दिन सांपों की सुरक्षा का प्रबंध करना चाहिए. जिन लोगों के पास आवास नहीं होते हैं ऐसे लोगों की इस दिन मदद करनी चाहिए.

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अब थायराइड कैंसर से भी बचाएगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम

Date : 20-Feb-2020

हेल्थ डेस्क। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) आधारित एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसकी मदद से थायरॉइड कैंसर के खतरे को भांपा जा सकता है। थायरॉइड के अल्ट्रासाउंड के साथ एआइ के उपयोग से इस बीमारी के खतरे का जल्द अनुमान लगाया जा सकता है।
पीएलओएस पैथोजेंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, एआइ के उपयोग से ऐसा अतिरिक्त तरीका मिला है, जिससे थायरॉइड कैंसर की जांच को बेहतर किया जा सकता है। इस विधि में एआइ की मदद से किसी रोगी के थायरॉइड की अल्ट्रासाउंड तस्वीरों पर गौर किया जाता है। अमेरिका की थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता जॉन इसेनबेरी ने कहा, 'मशीन लर्निग किफायती और प्रभावी टूल है, जिससे चिकित्सकों को जल्द किसी नतीजे पर पहुंचने में मदद मिल सकती है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि वर्तमान में जो अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं वह ट्यूमर के ज्यादा खतरनाक दिखने पर यह बता सकते हैं कि क्या सुई से जरिये बायोप्सी करना ठीक है या नहीं। लेकिन बायोप्सी में केवल एक छेद बनाकर काम किया जाता है, जिससे यह पता नहीं लग पाता कि बीमारी की वास्तविक तस्वीर क्या है। नतीजतन, कुछ बायोप्सी में अच्छे परिणाम भी नहीं आ पाते हैं और वह यह भी नहीं बता पाते कि कैंसर भी या नहीं। अल्ट्रासाउंड के परिणामों को और पुख्ता बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने नई मशीन लर्निग विधि पर काम करना शुरू किया और मरीजों की थाइरॉइड ग्रंथि के अल्ट्रासाउंड की इमेजों पर इस एग्लोरिदम का प्रयोग किया।

ऐसे किया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने इस एल्गोरिदम का प्रशिक्षण 121 मरीजों की अल्ट्रासाउंस के चित्रों पर किया, जो बाद में मॉलीक्यूलर परीक्षण के दौर से गुजरे थे। इस दौरान 43 मरीजों के नोड्यूल्स को उच्च जोखिम के रूप में और 91 को कम जोखिम के रूप में वर्गीकृत किया गया। ये आंकड़े मॉलीक्यूल परीक्षण में उपयोग किए गए जीनों के एक पैनल पर आधारित थे। इसके बाद शोधकर्ताओं ने नई विधि से भी नोड्यूल्स का परीक्षण किया जिसमें पाया, जिसके परिणाम 90 फीसद तक सही पाए गए।

 
 
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बढ़ती उम्र में लाभदायक फाइबर का सेवन

Date : 16-Mar-2019

हेल्थ न्यूज़ 
पाचन से लेकर त्वचा की चमक तक अक्सर विशेषज्ञ फाइबर्स के सेवन की सलाह देते हैं। अब एक शोध कह रहा है कि लंबे समय तक फोइबर-रिच डाइट लेने से बढ़ती उम्र के साथ भी स्वस्थ रहने में मदद मिल सकती है। जानें कैसे?

किसी भी व्यक्ति के लिए उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक क्रिया है। इसके साथ ही शरीर के अंगों का कमजोर होना और सफेद बालों, झुर्रियों आदि के साथ बढ़ती उम्र का दिखाई देने लगना भी स्वाभाविक है लेकिन यदि प्रारंभ से प्रयास किए जाएं, तो बढ़ती उम्र के इन लक्षणों को लंबे समय तक टाला जा सकता है और उम्र संबंधी तकलीफों के असर को कम किया जा सकता है। भोजन भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आॅस्ट्रेलिया में हुए एक शोध ने यह साबित किया कि फाइबर से भरपूर भोजन, जोकि असल में काबोर्हाइड्रेट का ही एक प्रकार होता है, और जिसे शरीर पचा नहीं सकता, वह असल में बढ़ती उम्र में स्वस्थ रखकर हमें फायदा पहुंचाता है। 

स्वस्थ रहकर उम्रदराज होने और काबोर्हाइड्रेट का सेवन करने के बीच की इस कड़ी को शोधकतार्ओं ने लाभकारी माना है। शोधकर्ता कहते हैं कि फाइबर्स की बदौलत, उम्र बढ़ने के साथ आने वाली मुश्किलों जैसे डिसेबिलिटी, डिप्रेशन के लक्षण, दिमागी अक्षमताओं, श्वास संबंधी तकलीफों से लेकर कैंसर और कोरोनरी आर्टरी डिसीज जैसी गंभीर अवस्थाओं तक से बचाव हो सकता है।

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नाम गुम जाएगा विज्ञान खोज लाएगा

Date : 16-Mar-2019

नवनीत कुमार गुप्ता
पिछले  दिनों होमी भाभा विज्ञान षिक्षा केन्द्र द्वारा विज्ञान परिषद् , इलाहबाद में हिन्दी में षैक्षिक विज्ञान सामग्री के विकास पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसी कार्यक्रम के दौरान लेखक द्वारा भविष्य में विज्ञान की विभिन्न विधाओं से अनेक वैज्ञानिक एवं सामाजिक समस्याओं के हल निकलने पर विचार-विमर्श में किया गया। भविश्य में जिस दो क्षेत्रों से सबसे अधिक समाधान निकलेंगे उनमें नैनो टेक्नोलॉजी यानी नैनोप्रौद्योगिकी एवं बॉयोटेक्नोलॉजी यानी जैवप्रौद्योगिकी प्रमुख होंगे। 
   इस लेख में सबसे पहले हम इन दोनों विशयों को संक्षेप में समझने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले यदि हम नैनोप्रौद्योगिकी  की बात करें तो इसमें हमें जो नैनो शब्द उपसर्ग के रूप में दिखता है असल में वह अत्यंत छोटे पैमाने को दषार्ता है। असल में नैनोमीटर एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है (मीटर का 10-9 हिस्सा) यानी अगर हमारे बाल की मोटाई लें तो वह करीब 80,000 नैनोमीटर होगी यानी बाल को मोटाई से 80,000 बार काटें तो एक टुकड़ा 1 नैनोमीटर होगा। इस सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने से वैज्ञानिकों ने अनेक महत्वपूर्ण खोजें की हैं। नैनोमीटर की लघुता और महत्ता को हम इस बात से भी समझा जा सकता हैं कि अब छोटी चीजों में अनेक सुविधाएं दी जा रही हैं जैसे हमारा मोबाईल फोन जिसमें कैमरा, घड़ी, केलकुलेटर सहित अनेक एप्प हैं। आज मोबाईल से ई-बेंकिंग जैसी सुविधाएं हमारे पास हैं।  
   दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र जैवप्रौद्योगिकी का है जिसके अंतर्गत कोषिका एवं जीन स्तर पर परिवर्तन कर वैज्ञानिक महत्वपूर्ण खोजें कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि आज डीएनए परीक्षण जैसे कार्यों से अनेक अपराधों का पता लगाया जा रहा है। बिछुड़ गए बच्चों को भी सालों बाद डीएनए परीक्षण के बाद अपने माता-पिता के पास पहुंचाया जा सकता है। जैवप्रौद्योगिकी के तहत अनेक असाध्य समझे जाने वाले रोगों का ईलाज भविश्य में संभव होगा। अनाज की नयी-नयी किस्में भी इसी की बदौलत विकसित हो रही हैं।  अब समझ सकते हैं कि किस तरह से विज्ञान के विभिन्न क्षेत्र आपस में मिलजुल कर कार्य करते है। उनकी इस परस्पर कार्यप्रणाली से अनेक सामाजिक एवं वैज्ञानिक समस्याओं को हल किया जा सकता है।  आज भारत ही नहीं पूरे विष्व में मानव तस्करी एवं मानव अंग व्यपार का गैरकानूनी कार्य बड़े स्तर पर किया जा रहा है। बच्चों की तस्करी करके लोग उन्हें खतरनाक एवं घरेलू कामों में गैरकानूनी ढंग से लगाकर उनका जीवन बर्बाद कर रहे हैं। भारत में हर दिन हजारों बच्चे गुम जाते हैं जिनमें से अधिकतर का पता नहीं लगता। तो क्या विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पास इस समस्या का समाधान है ? 
     इस प्रश्न का हल हमें विज्ञान के कुछ क्षेत्रों में मिल सकता है। हमारे सामने सबसे पहला सवाल यह होता है कि हम क्या यह पता लगा सकते हैं कि कोई बच्चा किसी समय कहां पर है तो उसके लिए हम कह सकते हैं कि जिस तरह मोबाईल फोन से जीपीएस के माध्यम से फोन की लोकेषन यानी उसकी स्थिति का पता लगा कर हमें फोन के मालिक का पता लगा सकते हैं यदि इसी प्रकार से जीपीएस लगा कोई ऐसा उपकरण बच्चों को दिया जाए तो हम उसकी हर स्थिति का पता लगा सकते है। इसी तरह जीपीएस का प्रयोग हाल के वर्शों में वन्यजीव संरक्षण में किया जा रहा है। पहले षेरों या बाघों के पैरो के निषानों को देखकर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता था। लेकिन अब इन जीवों के षरीर से जीपीएस प्रणाली से संबंधित एक चिप लगा दी जाती है जिससे इन जीवों के बारे में पल-पल की खबर हमें आसानी से मिल जाती है। इस तरह इन जीवों के अध्ययन और इनके संरक्षण के प्रयास ओर अच्छे से किए जा रहे हैं। इसी तरह से दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के एक दल ने ध्वनि विज्ञान की मदद से डॉल्फिन संरक्षण संबंधी प्रयोग किए। तो इस तरह के अनेक प्रयोगों के आधार पर हम कह सकते हैं कि किसी उपकरण के माध्यम से जीपीएस आदि प्रौद्योगिकीयों के माध्यम से हम किसी भी व्यक्ति की स्थिति का पता लगा सकते हैं।


    लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि व्यक्ति के पास हमेंषा वह उपकरण या चिप लगी हो तभी उसकी स्थिति का पता लग सकेगा। तो इस प्रकार कुंभ जैसे मेलों जैसी भीड़-भाड़ वाले स्थानों में जाने वाले बच्चों के साथ यदि कोई चिप लगा दी जाए तो जीपीएस के माध्यम से उस बच्चे के गुम हो जाने पर उसके बारे में पता लगाया जा सकेगा। लेकिन उस स्थिति में क्या होगा जब बच्चों की तस्करी या अपहरण करने वाले लोग उस चिप को बच्चों से अलग कर दें तब बच्चों को कैसे खोजा जाए? सरसरी तौर पर सबसे आसान तरीका तो यह होगा कि बच्चों के षरीर में आॅपरेषन करके कोई छोटी सी चिप फिट कर दी जाए जो जीपीएस प्रणाली से जुड़ी तो इस प्रकार हर बच्चे का पता लगाया जा सकेगा। लेकिन इस प्रयोग में खतरा यह है कि यदि अपहरण कर्ता या तस्कर लोग भी विज्ञान की मदद लें और स्कैनिंग मषीनों के माध्यम से षरीर में लगी चिप का पता लगा कर उस चिप को निकाल लें तो परेषानी और भी बढ़ जाएगी। तो इसके लिए भविश्य में विज्ञान की दो प्रमुख विधाएं जैवप्रौद्योगिकी एवं नैनोप्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह तो हम जानते ही हैं कि जैवप्रौद्योगिकी की मदद से विकसित टीकों ने अनेक बीमारियों से मुक्ति दिला दी है। बचपन में ही समय-समय पर विभिन्न टीकों को दिया जाता है जिससे अनेक बीमारियों से हम जीवनभर बचे रहते हैं।   तो क्या ऐसा संभव है कि बचपन में ही कोई ऐसा नैनो उपकरण या नैनोचिप या नैनाकण हमारे रक्त में डाल दी जाए जिसका पता भी नहीं चले और वह जीपीएस प्रणाली से जुड़ी भी हो। यह तो हमें पता ही है कि हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने पेंसिल से बनाए गए बिंदु से भी बहुत गुना छोटे रोबोट के द्वारा शरीर के अंदर की गतिविधियों या रोगों का पता लगाया जा रहा है। भविश्य में नैनोविज्ञान द्वारा इन सूक्ष्म नैनोकणों या नैनोरोबोट की मदद से कैंसर फैलाती कोशिकाओं को ढूंढ सकेंगे और उनका सफाया कर सकेंगे।   तो क्या ऐसा हो सकता है कि बचपन में ही ऐसे नैनोकणों को षरीर में छोड़ दिए जाएं जो जीपीएस या ऐसी अन्य प्रणाली से जुड़े हों जिससे व्यक्ति की स्थिति का पता लग सके। तो यदि भविश्य में ऐसा होता है तो गुम हुए बच्चों या अपहरण किए गए बच्चों का आसानी से पता लगाया जा सकेगा। दिल्ली के एक जवाहरलाल नेहरु विष्वविद्यालय से एक छात्र के गुम होने जैसे मामलें भी तब षायद नहीं होंगे। तो इस प्रकार विज्ञान सामाजिक सुरक्षा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जिस तरह से जैवसंदीप्ति के कारण जुगनू नामक कीट षरीर से निकली रोषनी से वह अपने आप को छुपा नहीं सकता है इसी प्रकार मानव षरीर में भी नैनोस्तर पर हेरफेर करके किसी व्यक्ति की स्थिति का पता लगाना संभव हो सकेगा।  लेकिन हमें इसके दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देना होगा यदि नैनोकण वाला बच्चा भविश्य में सेना में किसी खुफिया मिषन पर हो और उसके अंदर स्थित नैनोकण के माध्यम से उसकी स्थिति का पता लगा लिया जाए तो इससे उसे खतरा भी उत्पन्न हो सकता है ऐसे में जैवप्रौद्योगिकी की मदद से उन नैनोकणों को इस प्रकार कोडित किया जा सकता है जिससे केवल चयनित व्यक्ति ही उसकी स्थिति के बारे में पता लगा पाए। असल में विज्ञान के द्वारा हर समस्या का समाधान किया जा सकता है बस आवष्यकता होती है धैर्य के साथ विज्ञान को समझने और जानने की ताकि वह मानवता का सबसे बड़ा हितैशी बना रहे। लेख : नवनीत कुमार गुप्ता, परियोजना अधिकारी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग

 

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शोध / अदरक में मौजूद है कैंसर रोधी गुण

Date : 16-Mar-2019

सर्दियां आते है अदरक की चाय हर कोई पीना पसन्द करता है। ये चाय में स्वाद बढ़ाने के साथ ठंड जुकाम भी दूर करती है। लेकिन इसके अलावा और भी खासियत का अदरक की। एक शोध में में पता चला है की अदरक कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को रोकने में भी कारगर है। अदरक में कैंसर रोधी गुण मौजूद हैं, ये कैंसर कोशिकाओं को रोकने में कारगर है। ये खास तौर से महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर और गर्भाशय कैंसर से बचाने में असरकारक हैं। यह शरीर में कैंसर पैदा करने वाली कोशिकाओं को ब्लॉक करता है और कैंसर को फैलने से रोकता है।  

इस शोध के परिणाम बताते हैं कि प्रतिदिन अपनी डाइट में किसी भी तरह से अदरक को शामिल कर हम कैंसर को जड़ से समाप्त कर सकते हैं। स्तन कैंसर के मामले में अदरक का सेवन ट्यूमर को बढ़ने से रोकता है और कैंसर को जड़ से समाप्त कर सकते हैं। स्तन कैंसर के मामले में अदरक का सेवन ट्यूमर को बढ़ने से रोकता है और कैंसर बनने की संभावनाओं को कम करता है।

शोधकतार्ओं के अनुसार अदरक में पाया जाने वाला कैंसर रोधी तत्व क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को भी पुन: संरक्षित करने में सक्षम रहा, वह भी कीमो से 10 हजार गुना बेहतर और मजबूत तरीके से। हालांकि कैंसर कोशि‍का पर किए गए इस शोध के बाद शोधकतार्ओं का मानना है कि, असल में मानव कोशिका पर यह कितना प्रभावकारी सिद्ध होगा यह देखने वाल बात होगी।  फिलहाल यह तो तय है, कि अदरक में कैंसर को खत्म करने और उससे बचने के बेहतरीन गुण मौजूद हैं।

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जीन एडिटिंग तकनीक से कैंसर का इलाज

Date : 16-Mar-2019

दुनिया में पहली बार चीन में वैज्ञानिकों ने कैंसर का मुकाबला करने के लिए विवादास्पद जीन-फेरबदल परीक्षण का इस्तेमाल करते हुए एक व्यक्ति के शरीर में आनुवांशिक रूप से संवर्धित कोशिकाएं प्रविष्ट कराई हैंं। इस टीम ने सीआरआईएसपीआर-सीएएस 9 नामक इस तकनीकी का उपयोग किया जो डीएनए के किसी खास हिस्से को काटने के लिए आनुवांशिक कैंची की भांति काम करती है। यह तकनीक अनुसंधानकर्तार्ओं कोशिकाओं से कैंसर वाली वंशानुगत जीनों को काटकर हटाने और उनके स्थान पर स्वस्थ डीएनए रखने में समर्थ बनाती है।
सरकारी पीपुल्स डेली के अनुसार यह तकनीक उन कैंसर रोगियों के लिए नया उपचार प्रदान कर सकती है जिन पर किमोथेरेपी या विकिरण थेरेपी का असर नहीं हुआ है। चेंगडू में सिचुआन विश्वविद्यालय के वेस्ट चाइना अस्पताल में हुए इस परीक्षण को जुलाई में अस्पताल के एक समीक्षा बोर्ड से नैतिक मंजूरी मिली थी। इस अध्ययन की अगुवाई करने वाले लू यू ने नेचर से कहा,इलाज के विकल्प बहुत ही सीमित हैं। यह तकनीकी मरीजों खासकर कैंसर मरीजों, जिनका हम रोजाना इलाज करते हैं, को लाभ पहुंचाने में बहुत ही कारगर है। वैसे विशेषज्ञों का दावा है कि चीनी वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि से चीन और अमेरिका में बायोमेडिकल प्रतिस्पर्धा छिड़ सकती है।

कोशिका को जटिल एंजाइम के साथ ट्रांसफेक्ट करवाया जाता है। जिसमें गाइडिंग मॉलिक्यूल डीएनए कटिंग एंजाइम और स्वास्थ्य डीएनए के प्रतिरूप होते है।
कोशिका को  एंजाइम के साथ ट्रांसफेक्ट करने के बाद विशेष डिजाइन किए सिंथेटिक मॉलिक्यूल डीएनए स्टैंड को ढूंढ लेते है।
विशेष एंजाइम टारगेट डीएनए स्टैंड को  कट करता है।
अंत में डिफेक्टिव डीएनए स्टैंड को  अच्छे डीएनए से बदल दिया जाता है।

 

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