38 साल पुराना दवा मामला : हाईकोर्ट ने बरकरार रखा आरोपियों को बरी करने का फैसला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दवा की गुणवत्ता से जुड़े करीब चार दशक पुराने एक कानूनी विवाद पर राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की एकल पीठ ने निचली अदालत के उस निर्णय को उचित माना है, जिसमें साक्ष्यों की कमी के आधार पर आरोपियों को दोषमुक्त किया गया था।
विवाद की पृष्ठभूमि: 1988 का वह वाकया
यह कानूनी लड़ाई साल 1988 में शुरू हुई थी, जब खैरागढ़ के ‘पंडित मेडिकल स्टोर्स’ से ड्रग इंस्पेक्टर ने पैराक्विन टैबलेट के नमूने लिए थे। जांच के बाद भोपाल की सरकारी प्रयोगशाला ने इन दवाओं को ‘मानक स्तर से कम’ (Not of Standard Quality) पाया था।
इसके बाद प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए दवा बनाने वाली इंदौर की कंपनी (मैसर्स पारस फार्मास्युटिकल), थोक विक्रेता और स्थानीय दुकानदारों के खिलाफ ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940’ के तहत मामला दर्ज किया था।
निचली अदालत से हाईकोर्ट तक का सफर
2002 का फैसला: डोंगरगढ़ की अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए अधिकांश आरोपियों को बरी कर दिया था। केवल एक स्थानीय संचालक को दोषी पाया गया था, जिनकी मृत्यु के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई खत्म हो गई।
सरकार की चुनौती: राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिस पर अब अंतिम निर्णय आया है।
अपील खारिज होने के मुख्य कारण
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष की कुछ गंभीर तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियों को रेखांकित किया:
दस्तावेजों की कमी: जांच के दौरान मूल बिल और आपूर्ति से जुड़े महत्वपूर्ण कागजात जब्त नहीं किए गए थे। कोर्ट के सामने केवल फोटोकॉपी पेश की गई, जिसे पुख्ता सबूत नहीं माना गया।
बचाव के अधिकार का हनन: कानून के अनुसार, आरोपियों के पास दवा के नमूनों को ‘सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी’ में दोबारा जांच कराने का अधिकार होता है। लेकिन जांच प्रक्रिया में इतनी देरी हुई कि दवा की ‘एक्सपायरी डेट’ निकल गई, जिससे आरोपी अपना पक्ष साबित करने का अवसर खो बैठे।
कच्ची कड़ियां: निर्माता से लेकर विक्रेता तक की सप्लाई चेन को प्रमाणित करने में अभियोजन पक्ष विफल रहा।
निष्कर्ष: अदालत ने माना कि साक्ष्यों के अभाव और प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण आरोपियों को बरी करने का निचली अदालत का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत था।
















