हाई कोर्ट का बड़ा फैसला : अंतर-जिला तबादले से शिक्षकों की वरिष्ठता पर नहीं पड़ेगा असर

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने शिक्षक (LB) संवर्ग के हित में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई शिक्षक एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित होता है, तो उसकी पिछली सेवाओं को शून्य नहीं माना जा सकता। जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ ने आदेश दिया है कि स्थानांतरण के आधार पर किसी कर्मचारी को उसके कनिष्ठों (Juniors) से नीचे नहीं रखा जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब स्कूल शिक्षा विभाग ने 2021 में एक ग्रेडेशन सूची जारी की। इस सूची में उन शिक्षकों को, जिन्होंने अपने अनुरोध पर एक जिले से दूसरे जिले में तबादला लिया था, वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे कर दिया गया। विभाग के इस कदम से कई शिक्षक पदोन्नति (Promotion) की दौड़ से बाहर हो गए और उनके जूनियर उनसे आगे निकल गए।
पीड़ित शिक्षकों ने इस विसंगति के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुख्य याचिका ‘ओंकार प्रसाद वर्मा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ के माध्यम से कोर्ट को बताया गया कि उनकी नियुक्ति 2010 में हुई थी, लेकिन तबादले के कारण विभाग उनकी वरिष्ठता की गणना तबादले की तारीख से कर रहा था।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए:
समानता का अधिकार: कोर्ट ने कहा कि केवल जिले बदलने के आधार पर किसी को कनिष्ठ घोषित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
सेवा की निरंतरता: कर्मचारी की सेवा को सभी लाभों के लिए एक ही माना जाएगा, चाहे उसका कार्यस्थल बदल गया हो।
स्वैच्छिक बनाम प्रशासनिक तबादला: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि स्व-अनुरोध (Self-request) पर हुआ तबादला और प्रशासनिक आधार पर हुआ तबादला, वरिष्ठता के मामले में अलग-अलग नहीं देखे जा सकते।
शिक्षकों को मिलेंगे ये लाभ
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब राज्य शासन को निर्देश दिए गए हैं कि:
शिक्षकों की ग्रेडेशन सूची में तत्काल सुधार किया जाए।
शिक्षकों की वरिष्ठता उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि (10 दिसंबर 2010) से ही गिनी जाए।
वरिष्ठता के आधार पर उन्हें प्रधान पाठक (मिडल स्कूल) के पद पर पदोन्नत किया जाए और सभी बकाया लाभ प्रदान किए जाएं।
निष्कर्ष: यह फैसला उन हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो तबादले के कारण अपनी सालों की मेहनत और वरिष्ठता खोने के डर में थे। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि नियम और परिपत्र संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते।
















