धमतरी में मखाना क्रांति : महिला सशक्तिकरण और नवाचार की नई इबारत

धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में पारंपरिक धान की खेती से इतर अब ‘सफेद सोने’ यानी मखाना की खेती ग्रामीण महिलाओं की किस्मत बदलने के लिए तैयार है। कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग ने एक सराहनीय पहल की है। इसके तहत नगरी विकासखंड के ग्राम सांकरा की 40 महिला कृषकों के एक दल को रायपुर जिले के लिंगाडीह (आरंग) भेजा गया, जहाँ उन्होंने मखाना उत्पादन और उसके प्रसंस्करण की बारीकियों को सीखा।
प्रशिक्षण और तकनीकी ज्ञान पर जोर
धमतरी कलेक्टर के विशेष मार्गदर्शन में जिले के किसानों को नई तकनीकों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कड़ी में महिलाओं ने ओजस फार्म का दौरा किया। वहां फार्म मैनेजर संजय नामदेव ने बताया कि मखाना की खेती के लिए जलभराव वाली डबरियां और तालाब सबसे उपयुक्त होते हैं। महिलाओं को बीज चयन से लेकर फसल की कटाई और उसे बाजार तक पहुँचाने की पूरी प्रक्रिया समझाई गई।
मखाना खेती के आर्थिक लाभ
इस प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने मखाना खेती के गणित को विस्तार से समझाया:
कम लागत, अधिक मुनाफा: विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ में लगभग 20 किलो बीज की जरूरत होती है, जिससे 10 क्विंटल तक उत्पादन मिल सकता है।
प्रसंस्करण का महत्व: मखाना विशेषज्ञ रोहित साहनी ने बताया कि 1 किलो कच्चे बीज से करीब 200-250 ग्राम तैयार मखाना (पॉप) निकलता है। बाजार में इसकी कीमत 700 रुपये से 1000 रुपये प्रति किलो तक हो सकती है। यदि महिलाएं स्वयं इसकी पैकेजिंग और प्रोसेसिंग करें, तो लाभ कई गुना बढ़ सकता है।
सुरक्षित फसल: इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, 6 महीने की इस फसल में कीटों का डर नहीं रहता और चोरी की संभावना भी शून्य होती है।
धमतरी में मखाना खेती का विस्तार
वर्तमान में धमतरी के राखी, पीपरछेड़ी, दंडेसरा, राँकाडोह और सांकरा जैसे गांवों में लगभग 90 एकड़ क्षेत्र में डबरियों का चयन कर मखाना उत्पादन शुरू किया जा चुका है। उद्यानिकी विभाग की उप संचालक डॉ. पूजा कश्यप साहू ने बताया कि शासन की ओर से मखाना बोर्ड की योजनाओं, तकनीकी सहायता और सब्सिडी के माध्यम से महिलाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
मुख्य बिंदु: छत्तीसगढ़ में व्यावसायिक मखाना उत्पादन की नींव आरंग के लिंगाडीह में स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चंद्राकर ने रखी थी। आज वही मशाल धमतरी की महिलाएं थामे हुए हैं।
यह पहल न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई और आधुनिक दिशा भी प्रदान करेगी।





