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भारतीय उपभोक्ताओं का भरोसा चरम पर : नए साल में खर्च करने के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर भारत

नई दिल्ली (एजेंसी)। 2026 की शुरुआत भारतीय बाजार के लिए बेहद सकारात्मक संकेत लेकर आई है। हालिया आर्थिक आंकड़ों और उपभोक्ता रुझानों के अनुसार, भारत विश्व के सबसे ‘आशावादी’ उपभोक्ता बाजारों में से एक बनकर उभरा है। भारतीयों में अपनी सुख-सुविधाओं और घरेलू जरूरतों पर खर्च करने का उत्साह वैश्विक औसत से कहीं अधिक देखा जा रहा है।

खर्च करने की बढ़ती इच्छा

एक ताजा सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार, लगभग 60% भारतीय उपभोक्ता आने वाले छह महीनों में अपने घरेलू खर्चों में बढ़ोतरी करने की योजना बना रहे हैं। यह उत्साह न केवल व्यक्तिगत आय में वृद्धि को दर्शाता है, बल्कि देश की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और नियंत्रण में रहती महंगाई के प्रति जनता के भरोसे का भी प्रतीक है।

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति

आंकड़ों की तुलना करें तो भारतीय उपभोक्ताओं का ‘नेट ऑप्टिमिज्म’ (शुद्ध आशावाद) स्तर 27% दर्ज किया गया है, जो वैश्विक औसत (-12%) से बहुत बेहतर है। इस सूची में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है, जो यह साबित करता है कि विकसित देशों (जैसे ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी) की तुलना में भारतीय नागरिक अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर अधिक आश्वस्त हैं।

किन चीजों पर होगा सबसे ज्यादा खर्च?

भारतीयों की प्राथमिकता अब केवल बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार:

ऑटोमोबाइल: लगभग 70% लोग नई कार खरीदने या वाहनों पर खर्च करने के इच्छुक हैं।

तकनीक: 63% उपभोक्ता नए स्मार्टफोन और बेहतर डेटा प्लान पर निवेश करना चाहते हैं।

गैर-जरूरी वस्तुएं (Discretionary Spending): मनोरंजन और लग्जरी सामानों पर खर्च करने का इरादा भारत में दुनिया के अन्य बाजारों की तुलना में सबसे ज्यादा है।

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ लोग कार और मोबाइल जैसे बड़े निवेश के लिए तैयार हैं, वहीं पैक्ड स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक्स जैसे रोजमर्रा के छोटे खर्चों में वे काफी सावधानी बरत रहे हैं।

भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां

जहाँ 61% भारतीयों का मानना है कि देश की आर्थिक स्थिति में और सुधार होगा, वहीं कुछ चिंताएं भी बरकरार हैं। लगभग 34% लोग बेरोजगारी को लेकर आशंकित हैं, जबकि 17% उपभोक्ताओं को लगता है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर भारत की विकास दर पर पड़ सकता है। हालांकि, यह डर यूरोपीय देशों की तुलना में बेहद कम है, जहाँ 60% से अधिक लोग मंदी की आशंका जता रहे हैं।

कुल मिलाकर, 2026 का भारतीय बाजार निवेश और मांग के लिहाज से एक सुनहरा अवसर पेश कर रहा है।

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