जनजातीय खेल प्रतिभाओं का महाकुंभ : भविष्य के सितारों ने पेश की अपनी दावेदारी

रायपुर। छत्तीसगढ़ की धरती पर हाल ही में संपन्न हुए पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 ने भारतीय खेलों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। यह आयोजन केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि देश के सुदूर इलाकों में छिपी उन प्रतिभाओं को मुख्यधारा में लाने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है, जिनके पास जुनून तो था पर मंच की कमी थी।
आयोजन की एक झलक
इस ऐतिहासिक खेल उत्सव में देशभर के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 3800 एथलीटों ने अपना कौशल दिखाया। रायपुर, जगदलपुर और
अंबिकापुर में आयोजित इन खेलों में 9 विधाओं में प्रतिस्पर्धा हुई। तीरंदाजी, फुटबॉल और कुश्ती जैसे खेलों में जहाँ खिलाड़ियों ने 106 स्वर्ण पदकों के लिए पसीना बहाया, वहीं मल्लखंभ जैसे पारंपरिक खेलों ने दर्शकों का मन मोह लिया।
उभरते हुए सितारे: जिन्होंने मैदान पर बिखेरी चमक
इस प्रतियोगिता ने कई ऐसे नाम दिए हैं जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगा लहराने का दम रखते हैं:
मणिकांता एल (तैराकी, कर्नाटक): कर्नाटक के इस 21 वर्षीय तैराक ने 8 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीतकर सनसनी फैला दी। एशियाई खेलों की तैयारी कर रहे मणिकांता ने साबित किया कि वे भारतीय तैराकी का भविष्य हैं।
अंजलि मुंडा (तैराकी, ओडिशा): महज 15 वर्ष की उम्र में अंजलि ने 5 स्वर्ण पदक जीतकर अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। ‘कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ की इस छात्रा ने अपनी उम्र से कहीं बड़े खिलाड़ियों को मात देकर सबको चौंका दिया।
कोमालिका बारी (तीरंदाजी, झारखंड): पूर्व विश्व चैंपियन कोमालिका ने यहाँ अपनी साख के अनुरूप प्रदर्शन किया। हालांकि उन्हें कड़ी चुनौती मिली, लेकिन व्यक्तिगत और मिक्स्ड टीम रिकर्व में स्वर्ण जीतकर उन्होंने एशियाई खेलों के लिए अपनी दावेदारी मजबूत की।
किरण पिस्दा (फुटबॉल, छत्तीसगढ़): घरेलू टीम की कप्तान किरण ने न केवल गोल दागे, बल्कि जरूरत पड़ने पर गोलकीपर की भूमिका निभाकर अपनी टीम को चैंपियन बनाया। क्रोएशियाई लीग में खेल चुकी किरण अब भारतीय राष्ट्रीय टीम में स्थायी जगह बनाने को तैयार हैं।
बाबूलाल हेम्ब्रम और झिल्ली दलाबेहरा (वेटलिफ्टिंग): जहाँ अनुभवी झिल्ली ने अपना दबदबा कायम रखते हुए स्वर्ण जीता, वहीं युवा बाबूलाल ने रजत पदक जीतकर सीनियर सर्किट में अपने आगमन की घोषणा कर दी।
शिव कुमार सोरेन (एथलेटिक्स, झारखंड): 100 और 200 मीटर की दौड़ में शिव कुमार ने अपनी रफ़्तार से सबको प्रभावित किया। उनकी फिजीक और टाइमिंग उन्हें भविष्य का एक बेहतरीन स्प्रिंटर बनाती है।
भविष्य की राह
भारत जिस समय 2036 ओलंपिक की मेजबानी का सपना देख रहा है, ऐसे में जनजातीय क्षेत्रों से आने वाली यह ‘बेंच स्ट्रेंथ’ बेहद महत्वपूर्ण है। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि सही प्रशिक्षण और अवसर मिले, तो भारत के आदिवासी अंचलों से निकले ये खिलाड़ी वैश्विक पटल पर देश का नाम रोशन करने की पूरी क्षमता रखते हैं।
“इन खेलों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा केवल शहरों तक सीमित नहीं है। आदिवासी क्षेत्रों के ये युवा खिलाड़ी भारतीय खेल पिरामिड की सबसे मजबूत नींव बनने वाले हैं।”
















