बस्तर की ‘बुआ’ : पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती के सेवा और समर्पण की अनूठी कहानी

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और दुर्गम क्षेत्रों में बदलाव की बयार लाना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन दंतेवाड़ा की डॉ. बुधरी ताती ने इसे अपने जीवन का ध्येय बना लिया। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। यह पुरस्कार बस्तर के सुदूर अंचलों में उनके द्वारा किए गए दशकों लंबे निस्वार्थ सामाजिक कार्यों की एक गूंज है।
महज 15 वर्ष की उम्र में चुनी सेवा की राह
डॉ. बुधरी ताती का सफर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हीरानगर से शुरू हुआ। साल 1984-85 के दौरान, जब वह सिर्फ 15 वर्ष की थीं, उन्हें गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से समाज की सेवा करने की प्रेरणा मिली। इस प्रेरणा को एक सही दिशा देने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र के नागपुर जाकर ‘अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति’ से बाकायदा प्रशिक्षण लिया। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह पूरी तरह से बस्तर के आदिवासी समाज के कल्याण में जुट गईं।
नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल
बुधरी ताती ने बस्तर के उन इलाकों में कदम रखा जहाँ पहुँचना बेहद कठिन था। उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए:
सिलाई, कढ़ाई और अन्य हस्तशिल्प से जुड़े रोजगार के साधन सिखाए।
महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए प्रेरित किया।
गाँवों में स्वच्छता, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और पर्यावरण को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए।
इसके अलावा, उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों और नशाखोरी के खिलाफ भी मोर्चा खोला और कई गाँवों को व्यसन मुक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई।
आजीवन अविवाहित रहकर समाज को माना अपना परिवार
दूसरों के जीवन में उजाला लाने के लिए डॉ. बुधरी ताती ने कभी खुद का घर नहीं बसाया। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया और अपना पूरा जीवन समाज के कल्याण में झोंक दिया। उनके इस अपनत्व और निस्वार्थ भाव के कारण ही आज पूरे इलाके के लोग उन्हें सम्मान और प्यार से ‘बुआ’ या ‘ताती’ कहकर पुकारते हैं।
डॉ. बुधरी ताती को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए अब तक कुल 22 पुरस्कार मिल चुके थे, जिनमें तीन राष्ट्रीय स्तर के सम्मान भी शामिल हैं। राष्ट्रपति के हाथों मिला यह ‘पद्मश्री’ सम्मान उनके जीवन का 23वाँ और सबसे बड़ा गौरव है।
















