छत्तीसगढ़ और असम के सांस्कृतिक मिलन का नया अध्याय : रायपुर में ‘श्रीमंत शंकर देव शोध पीठ’ का शुभारंभ

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में एक ऐतिहासिक गौरवमयी क्षण दर्ज किया गया। राज्यपाल श्री रमेन डेका की विशेष पहल पर, महान समाज सुधारक और सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत श्रीमंत शंकर देव के दर्शन को समर्पित एक नवीन शोध पीठ का भव्य लोकार्पण हुआ।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर राज्यपाल श्री रमेन डेका के साथ मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, उच्च शिक्षा मंत्री श्री टंकराम वर्मा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल मुख्य रूप से उपस्थित रहे।
शैक्षणिक आदान-प्रदान के लिए ऐतिहासिक समझौता (MoU)
इस कार्यक्रम के दौरान पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़) और पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (रायपुर) के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
उद्देश्य: दोनों विश्वविद्यालयों के शोधार्थी अब अंतर-विषयी अनुसंधान (Interdisciplinary Research) कर सकेंगे।
सहयोग: यह कदम उत्तर और मध्य भारत के बीच ज्ञान और अनुसंधान के सेतु के रूप में कार्य करेगा।
“एक भारत-श्रेष्ठ भारत” का जीवंत उदाहरण: मुख्यमंत्री साय
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने श्रीमंत शंकर देव को नमन करते हुए कहा कि भले ही उनका मुख्य कार्यक्षेत्र असम रहा हो, लेकिन उनके विचारों की गूँज पूरे राष्ट्र में सुनाई देती है।
“श्रीमंत शंकर देव जी ने 500 वर्ष पूर्व ‘एक भारत’ का जो स्वप्न देखा था, उसे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प से सिद्ध कर रहे हैं। उनकी रचनाओं ने भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित किया है।”
मुख्यमंत्री ने शोध पीठ के संचालन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से 2 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता की भी घोषणा की।
सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता के प्रतीक
राज्यपाल श्री रमेन डेका ने अपने संबोधन में श्रीमंत शंकर देव के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शंकर देव केवल एक संत नहीं, बल्कि एक कुशल नाटककार, संगीतकार, चित्रकार और कवि भी थे।
नामघर परंपरा: उन्होंने समानता और करुणा पर आधारित ‘नामघर’ और ‘सत्र’ परंपरा की नींव रखी, जिसने जाति-पाति के भेदभाव को मिटाया।
साहित्यिक धरोहर: उनके द्वारा रचित ‘अंकिया नाट’ और ‘बोरगीत’ आज भी भारतीय संस्कृति की अनमोल थाती हैं।
शोध पीठ की मुख्य विशेषताएं और उद्देश्य
यह शोध संस्थान केवल अध्ययन का केंद्र नहीं, बल्कि विचारों की एक कार्यशाला होगा। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
सांस्कृतिक एकीकरण: उत्तर-पूर्वी भारत और मध्य भारत की भक्ति परंपराओं के बीच कड़ियों को जोड़ना।
जनजातीय विरासत: दोनों क्षेत्रों की मौखिक सांस्कृतिक परंपराओं और लोक कलाओं का दस्तावेजीकरण करना।
विविध शोध विषय: भाषा, इतिहास, समाजशास्त्र, और प्राचीन भारतीय संस्कृति जैसे विषयों पर शोध की सुविधा।
फैलोशिप: शोधार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए संस्थान द्वारा शोधवृत्ति (Scholarship) भी प्रदान की जाएगी।
मुख्य वक्ता डॉ. कृष्ण गोपाल ने असम की विविध जनजातियों को भक्ति के सूत्र में पिरोने के लिए श्रीमंत शंकर देव के ऐतिहासिक योगदान की सराहना की। उच्च शिक्षा मंत्री श्री टंकराम वर्मा ने विश्वास जताया कि यह पीठ भविष्य में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भारतीय संदेश को वैश्विक पटल पर स्थापित करेगी।
















