छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट : 9 साल की देरी के बाद अपील नामंजूर, कोर्ट ने कहा ‘कानून सोए हुए लोगों का साथ नहीं देता’

बिलासपुर। बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में कानूनी समय-सीमा और सतर्कता को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था केवल उन लोगों की मदद करती है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं, न कि उनके लिए जो वर्षों तक निष्क्रिय बैठे रहते हैं।
मामले की मुख्य बातें:
अत्यधिक विलंब: याचिकाकर्ता गणपतराम (जांजगीर-चांपा) ने निचली अदालत के वर्ष 2016 के फैसले के खिलाफ 2026 में अपील दायर की थी। इस अपील में कुल 3,398 दिनों (लगभग 9 वर्ष 6 महीने) की भारी देरी पाई गई।
याचिकाकर्ता का तर्क: अपीलकर्ता ने अपनी सफाई में कहा कि वह रोजगार के सिलसिले में जम्मू-कश्मीर में थे, जिसके कारण उन्हें अदालती फैसले की समय पर जानकारी नहीं मिल सकी।
न्यायालय का रुख: कोर्ट ने इस तर्क को अपर्याप्त माना। पीठ ने टिप्पणी की कि इतनी लंबी अवधि की देरी को माफ करने के लिए कोई भी ठोस दस्तावेजी प्रमाण या संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
कानूनी सिद्धांत का उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए एक बुनियादी कानूनी सिद्धांत को दोहराया:
“Vigilantibus non dormientibus jura subveniunt” — अर्थात, कानून केवल जागरूक व्यक्तियों की सहायता करता है, उनकी नहीं जो अपने अधिकारों पर सोते रहते हैं।
न्यायालय ने सख्त लहजे में कहा कि केवल ‘जानकारी का अभाव’ बताकर वैधानिक समय-सीमा (Limitation Period) की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि कोई पक्षकार अपने मामले के प्रति लंबे समय तक लापरवाह रहता है, तो उसे बाद में कानूनी राहत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने विलंब को माफ करने के आवेदन को असामान्य और निराधार मानते हुए अपील को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि अदालती प्रक्रियाओं में समय-सीमा का पालन करना अनिवार्य है और बिना किसी ठोस कारण के अत्यधिक देरी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
















