छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट : सबूतों के अभाव में रिश्वतखोरी के आरोपी पूर्व क्लर्क दोषमुक्त

बिलासपुर। बिलासपुर हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक दशक पुराने मामले में बड़ा निर्णय लेते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को पलट दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूत और मांग (Demand) की पुष्टि के किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला और निचली अदालत का फैसला
यह पूरा प्रकरण धमतरी जिले का है, जहाँ सहायक ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत रामलाल शर्मा पर एरियर भुगतान के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।
आरोप: पंचायत विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी से ₹10,000 की मांग।
ट्रैप: 2015 में एसीबी (ACB) ने कार्रवाई की और कथित तौर पर ₹5,000 की राशि बरामद की।
सजा: विशेष न्यायालय ने आरोपी को 4 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी? (प्रमुख बिंदु)
न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने मामले की समीक्षा के दौरान अभियोजन पक्ष की थ्योरी में कई गंभीर खामियां पाईं:
मांग का अभाव: कोर्ट ने पाया कि रिश्वत की ‘डिमांड’ साबित करने के लिए कोई स्पष्ट वॉयस रिकॉर्डिंग या साक्ष्य मौजूद नहीं है।
गवाहों का मुकरना: होटल संचालक, जिसे मुख्य गवाह बनाया गया था, वह अपने बयान से पलट गया। रिश्वत की राशि आरोपी के हाथ से नहीं बल्कि होटल संचालक के पास से मिली थी।
कानूनी मापदंड: न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में ‘मांग’ और ‘स्वीकृति’ दोनों का स्वतंत्र रूप से प्रमाणित होना अनिवार्य है। केवल पाउडर टेस्ट (Phenolphthalein test) पॉजिटिव आना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए जमानत मुचलका जमा करने का निर्देश दिया है। यह प्रक्रिया इसलिए अपनाई गई है ताकि यदि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करती है, तो आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।
















