औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की सेहत से समझौता बर्दाश्त नहीं : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की कड़ी चेतावनी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रदेश के औद्योगिक संस्थानों, विशेषकर पावर प्लांट और स्टील फैक्ट्रियों में मजदूरों के स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि श्रमिकों के जीवन के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं होगा।
अदालत ने पाया कि कई भारी उद्योगों में न तो योग्य डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं जैसे एम्बुलेंस और ‘ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर’ (OHC) नियमों के अनुरूप काम कर रहे हैं।
जांच में सामने आई चौंकाने वाली खामियां
कोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नरों की निरीक्षण रिपोर्ट में उद्योगों की गंभीर लापरवाही उजागर हुई है:
संदिग्ध मेडिकल रिपोर्ट्स: फैक्ट्रियों द्वारा निजी लैब से कराई जा रही जांचों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, कई श्रमिकों में सुनने की अक्षमता पाई गई, जबकि उनकी मेडिकल रिपोर्ट उन्हें पूरी तरह स्वस्थ बता रही थी।
दस्तावेजों में हेरफेर: एम्बुलेंस की लॉगबुक अपडेट नहीं पाई गई और कई जगहों पर पूर्णकालिक डॉक्टरों की नियुक्ति केवल कागजों तक सीमित दिखी।
नियमों की अवहेलना: कुछ उद्योगों पर पहले भी कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन उनके कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं आया है।
हाई कोर्ट के सख्त निर्देश
अदालत ने केवल कागजी कार्रवाई पूरी करने वाले उद्योगों को फटकार लगाते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
नया हलफनामा: जिन कंपनियों ने अब तक बिंदुवार जवाब पेश नहीं किया है, उन्हें नया शपथपत्र दाखिल करना होगा।
पुनः निरीक्षण: कोर्ट कमिश्नर फिर से फैक्ट्रियों का दौरा करेंगे ताकि सुधार के दावों की जमीनी हकीकत जानी जा सके।
जवाबदेही तय: कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा मानकों में कमी पाए जाने पर संबंधित इकाइयों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अदालत की टिप्पणी: “सिर्फ दस्तावेज जमा कर देना जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं है; श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए वास्तविक धरातल पर बदलाव दिखना अनिवार्य है।”
















