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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता : संकट में देसी सेब, कश्मीर से हिमाचल तक किसानों की बढ़ी धड़कनें

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत और अमेरिका के बीच हालिया ट्रेड डील ने उत्तर भारत के सेब उत्पादकों की रातों की नींद उड़ा दी है। कश्मीर की वादियों से लेकर हिमाचल की पहाड़ियों तक, बागवानों के बीच इस बात को लेकर गहरा आक्रोश और डर है कि विदेशी सेबों की आमद उनके पुश्तैनी कारोबार को तहस-नहस कर सकती है।

क्यों डरा रहा है अमेरिकी सेब?

इस व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क (Import Duty) कम करने के प्रावधान हैं। किसानों को आशंका है कि टैक्स कम होने से अमेरिकी सेब भारतीय बाजारों में बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध होंगे। इससे स्थानीय सेबों की मांग घट जाएगी और बाजार में कीमतों का भारी पतन हो सकता है।

10,000 करोड़ का दांव पर लगा भविष्य

सेब उद्योग केवल खेती नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। आंकड़ों पर नजर डालें तो:

उत्पादन: अकेले कश्मीर घाटी देश के कुल सेब उत्पादन का लगभग 75% हिस्सा पैदा करती है।

अर्थव्यवस्था: यह उद्योग करीब 10,000 करोड़ रुपये का है।

रोजगार: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50 लाख लोग इस व्यवसाय से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।

असमान मुकाबले की चुनौती

सोपोर फ्रूट मंडी के अध्यक्ष फैयाज अहमद मलिक के अनुसार, भारतीय किसानों के लिए अमेरिकी बागवानों से मुकाबला करना नामुमकिन जैसा है। उनका कहना है कि अमेरिका में किसानों को सरकार से भारी सब्सिडी और कैश ट्रांसफर मिलता है, जबकि भारतीय किसानों के पास पर्याप्त फसल बीमा तक की सुविधा नहीं है। इसके अलावा, जब भारतीय सेब बांग्लादेश जैसे देशों में जाता है, तो वहां 100% से अधिक टैक्स लगता है, ऐसे में भारत सरकार द्वारा अमेरिकी सेब को रियायत देना स्थानीय उद्योग के लिए घातक साबित हो सकता है।

विरोध की गूंज

ट्रेड डील के खिलाफ किसानों ने मोर्चा खोल दिया है:

हिमाचल प्रदेश: किसानों ने खेती के उत्पादों को इस डील से बाहर रखने की मांग को लेकर 12 फरवरी को विरोध प्रदर्शन और बंद का आह्वान किया है।

कश्मीर: घाटी के किसान संगठन भी अब एकजुट होकर बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।

सरकार का पक्ष और सुरक्षा उपाय

वहीं, सरकार का तर्क है कि वह किसानों के हितों की अनदेखी नहीं कर रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी सेब के लिए एक कोटा सिस्टम और न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) तय किया गया है, ताकि एक सीमा से सस्ते सेब बाजार में न आ सकें। विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि इस प्रतिस्पर्धा से भारतीय बागवानों को अपनी गुणवत्ता (Quality) में सुधार करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

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