कोरबा का खरहरी गाँव : जहाँ डेढ़ सदी से ‘बेरंग’ है होली का त्योहार

कोरबा। छत्तीसगढ़ अपनी अनूठी संस्कृति और विविध परंपराओं के लिए जाना जाता है। जहाँ पूरा देश फागुन के महीने में रंगों और गुलाल में सराबोर रहता है, वहीं कोरबा जिले का खरहरी गाँव एक अलग ही कहानी बयां करता है। इस गाँव में पिछले 150 वर्षों से होली का त्योहार नहीं मनाया गया है।
क्यों खौफ में हैं ग्रामीण?
इस परंपरा के पीछे कोई खुशी नहीं, बल्कि बरसों पुराना एक डर और कुछ अनहोनी घटनाएं छिपी हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इस शांति के पीछे मुख्य रूप से दो कारण माने जाते हैं:
अग्निकांड की त्रासदी: कहा जाता है कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले होलिका दहन के दौरान गाँव में भीषण आग लग गई थी, जिसने कई घरों को राख कर दिया था। ग्रामीण इसे एक अशुभ संकेत मानते हैं।
बीमारी और मृत्यु का भय: एक प्रचलित किस्से के अनुसार, गाँव का एक व्यक्ति पड़ोसी गाँव में होली खेलने गया था, लेकिन लौटने के बाद वह गंभीर रूप से बीमार हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने ग्रामीणों के मन में इस डर को पक्का कर दिया कि होली खेलना उनके लिए वर्जित है।
दैवीय आदेश या लोक मान्यता?
गाँव की एक और गहरी मान्यता मड़वारानी देवी से जुड़ी है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि देवी ने स्वयं ग्रामीणों को सपने में आकर होली न मनाने का निर्देश दिया था। तब से लेकर आज तक, गाँव की नई पीढ़ी भी अपने पूर्वजों के इस फैसले का सम्मान करती आ रही है।
खास बात: होली के दिन जहाँ आसपास के गाँवों में ढोल-नगाड़े बजते हैं, वहीं खरहरी गाँव में सन्नाटा पसरा रहता है। यहाँ न तो होलिका जलाई जाती है और न ही कोई एक-दूसरे पर रंग डालता है।
















