छत्तीसगढ़

कोटमीसोनार : मगरमच्छों का सुरक्षित बसेरा और पर्यटन की नई इबारत

रायपुर। छत्तीसगढ़ का जांजगीर-चांपा जिला आज वन्यजीव प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसका मुख्य श्रेय कोटमीसोनार मगरमच्छ संरक्षण रिजर्व को जाता है, जिसने न केवल विलुप्त होते सरीसृपों को जीवनदान दिया है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर भी बदल दी है।

संरक्षण की पहल और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत सरकार द्वारा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत शुरू की गई मगरमच्छ संरक्षण परियोजना का मुख्य उद्देश्य इन जीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करना और उनकी घटती संख्या को रोकना था। इसी कड़ी में:

शुरुआत: इस परियोजना की नींव 9 मई 2006 को रखी गई थी।

लोकार्पण: अगस्त 2008 में इसे विधिवत रूप से जनता के लिए खोला गया।

विस्तार: लगभग 57 हेक्टेयर में फैला यह केंद्र दो भागों (कोर जोन और बफर जोन) में विभाजित है, जो मगरमच्छों के प्रजनन और सुरक्षा के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।

मुड़ा तालाब से आधुनिक रिजर्व तक का सफर

एक समय में ग्राम कोटमीसोनार का मुड़ा तालाब केवल एक जल निकाय था, जिसे वन विभाग ने मगरमच्छों के लिए आरक्षित किया। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से मगरमच्छों को लाकर यहाँ सुरक्षित छोड़ा गया।

वर्तमान स्थिति: आज इस रिजर्व में लगभग 250 मगरमच्छ प्राकृतिक और सुरक्षित माहौल में फल-फूल रहे हैं।

पर्यटन और स्थानीय विकास का संगम

वन विभाग ने इस केंद्र को केवल एक ‘ब्रीडिंग सेंटर’ तक सीमित न रखकर इसे एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया है। यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए कई सुविधाएं मौजूद हैं:

मनोरंजन और ज्ञान: 3-डी मिनी थिएटर, इंटरप्रिटेशन सेंटर और ऊर्जा पार्क।

सुविधाएं: वॉच टावर (मगरमच्छों को देखने के लिए), कैफेटेरिया और चिल्ड्रन पार्क।

आर्थिक प्रभाव: 2015 में पर्यटन शुल्क लागू होने के बाद से यहाँ पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है। इससे गाँव में छोटे बाज़ारों का विस्तार हुआ है और स्थानीय युवाओं को गाइड, दुकानदारी और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में रोजगार मिला है।

कैसे पहुँचें?
कोटमीसोनार तक पहुँचना बेहद आसान है, जो इसे सप्ताहांत की छुट्टियों के लिए एक आदर्श स्थान बनाता है:

दूरी: जांजगीर जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी और बिलासपुर से 30 किमी।

रेलवे: नजदीकी स्टेशन कोटमीसोनार (1 किमी) और अकलतरा (9 किमी) हैं।

कोटमीसोनार का यह मॉडल सिद्ध करता है कि यदि प्रकृति और वन्यजीवों का संरक्षण सही दिशा में किया जाए, तो वह न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि मानव विकास और पर्यटन के नए द्वार भी खोलता है।

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