छत्तीसगढ़

राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए ‘पंच परिवर्तन’ : डॉ. मोहन भागवत का समाज को आह्वान

रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान रायपुर के अभनपुर में आयोजित ‘विराट हिंदू सम्मेलन’ को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्र निर्माण की दिशा में व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में बदलाव लाने पर जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी उपस्थित थे, जो संघ प्रमुख के विचारों को आत्मसात करते नजर आए।

डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होना केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र सेवा के संकल्प को और अधिक ऊर्जा देने का अवसर है। उन्होंने कहा कि हमें संकटों पर चिंता करने के बजाय समाधान का हिस्सा बनना चाहिए।

निर्भयता का संदेश: एक प्रेरक प्रसंग

अपने संबोधन में उन्होंने एक रोचक कहानी के माध्यम से समाज को निर्भय बनने की सीख दी। उन्होंने बताया कि कैसे एक खरगोश बार-बार अपनी सुरक्षा के लिए भगवान से शारीरिक बदलाव मांगता रहा, लेकिन अंत में उसे समझ आया कि असली शक्ति बाहरी कवच में नहीं, बल्कि मन की निर्भयता में है। उन्होंने कहा कि समाज को भी अपनी आंतरिक कमजोरियों और डर को दूर कर सशक्त बनना होगा।

जीवन में उतारने योग्य ‘पंच परिवर्तन’

डॉ. भागवत ने स्वयंसेवकों और समाज के सामने पांच प्रमुख जीवन-मूल्यों (पंच परिवर्तन) को व्यवहार में लाने की बात कही:

सामाजिक समरसता: समाज से छुआछूत और भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना। समाज के हर वर्ग के साथ मेल-जोल बढ़ाना और सार्वजनिक संसाधनों (जैसे जल और मंदिर) का उपयोग सबके लिए समान होना चाहिए।

कुटुंब प्रबोधन: सप्ताह में कम से कम एक दिन परिवार के सभी सदस्य साथ बैठें। साथ में भजन, भोजन और राष्ट्र की स्थिति पर चर्चा करें ताकि आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ा जा सके।

पर्यावरण संरक्षण: ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से लड़ने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करें। प्लास्टिक का उपयोग बंद करें, जल संचयन करें और अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें।

‘स्व’ का बोध: अपनी भाषा, वेशभूषा और संस्कृति पर गर्व करें। अपनी मातृभाषा का प्रयोग करें और स्वदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता दें।

नागरिक कर्तव्य: संविधान का सम्मान करना और कानून का पालन करना हमारा धर्म होना चाहिए। इसके साथ ही बड़ों का सम्मान और दान देने जैसी परंपराओं को जीवित रखें ताकि समाज में विनम्रता और उत्तरदायित्व की भावना बनी रहे।

“यदि हम देश के ‘स्व’ (स्वत्व) को केंद्र में रखकर आगे बढ़ेंगे, तो हमारे व्यक्तिगत जीवन के उद्देश्य भी स्वतः ही सिद्ध हो जाएंगे।” — डॉ. मोहन भागवत

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