RBI के हस्तक्षेप से संभला रुपया : भारी गिरावट के बाद डॉलर के मुकाबले 151 पैसे की रिकवरी

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय मुद्रा के लिए पिछला कुछ समय काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। सोमवार को जब रुपया प्रति डॉलर 95 के स्तर को पार कर गया, तो बाजार में हड़कंप मच गया था। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए कड़े कदमों के बाद गुरुवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 93.19 के स्तर पर लौट आया।
क्यों आई रुपये में यह अचानक तेजी?
रुपये की इस वापसी का मुख्य कारण केंद्रीय बैंक का एक सख्त निर्देश है। RBI ने ‘ऑनशोर फॉरवर्ड डिलीवरी मार्केट’ में बैंकों की गतिविधियों पर लगाम कसी है।
सर्कुलर का प्रभाव: RBI ने बैंकों के लिए ‘नेट ओपन पोजीशन’ की सीमा 10 करोड़ डॉलर निर्धारित कर दी है।
समय सीमा: बैंकों को इस नए नियम को लागू करने के लिए 10 अप्रैल तक का समय दिया गया है।
इस कदम का उद्देश्य सट्टेबाजी को कम करना और मुद्रा बाजार में स्थिरता लाना है।
एक तरफ राहत, दूसरी तरफ चुनौतियां
भले ही RBI के हस्तक्षेप से रुपया थोड़ा संभला है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने अभी भी कई बड़ी बाधाएं मौजूद हैं:
कच्चे तेल की तपिश: वैश्विक स्तर पर ब्रेंट क्रूड की कीमतें 106.06 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो भारत के आयात बिल के लिए चिंता का विषय है।
शेयर बाजार में गिरावट: घरेलू शेयर बाजारों में बिकवाली का दौर जारी है। सेंसेक्स और निफ्टी में लगभग 1.8% की गिरावट दर्ज की गई है।
विदेशी निवेशकों का पलायन: विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने बाजार से भारी मात्रा में पूंजी (लगभग 8,331 करोड़ रुपये) निकाली है।
डॉलर की मजबूती: वैश्विक डॉलर इंडेक्स में बढ़त के कारण अन्य मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर और अधिक शक्तिशाली हो गया है।
अर्थव्यवस्था के लिए ‘सिल्वर लाइनिंग’ (उम्मीद की किरण)
इतने तनाव के बीच भारत के जीएसटी कलेक्शन (GST Collection) ने राहत भरी खबर दी है।
मार्च के महीने में टैक्स संग्रह 2 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 9% की वृद्धि दर्शाता है। घरेलू खपत और आयात में मजबूती इस संग्रह का मुख्य आधार रही है।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और बढ़ती महंगाई ने रुपये पर गहरा दबाव बनाया है। फरवरी 2026 से अब तक रुपया अपनी वैल्यू का 4% खो चुका है। आने वाले हफ्तों में रुपये की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतें कहाँ ठहरती हैं और क्या विदेशी निवेशक वापस भारतीय बाजार का रुख करते हैं या नहीं।
















