रासायनिक खेती को त्याग कर प्राकृतिक खेती से खुशहाली की राह पर किसान दंपत्ति

राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के किसान अब पारंपरिक रासायनिक खेती के बजाय जैविक और प्राकृतिक कृषि को अपना रहे हैं। सरकार के राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन ने इस दिशा में एक उत्प्रेरक का काम किया है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य खेती की लागत को घटाकर किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि करना और मिट्टी की सेहत को सुधारना है।
राजनांदगांव के मोखला गाँव की प्रेरणादायक सफलता
राजनांदगांव विकासखंड के ग्राम मोखला में रहने वाले श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद (68 वर्ष) और उनके पति श्री माखन निषाद (72 वर्ष) इस बदलाव के जीते-जाते उदाहरण हैं। शिवनाथ नदी के किनारे अपनी 2.34 एकड़ भूमि पर यह दंपत्ति पहले धान और सब्जियों की खेती के लिए पूरी तरह रसायनों पर निर्भर था। उस समय उनकी वार्षिक आय मात्र 50 से 60 हजार रुपये तक ही सीमित रह जाती थी।
चुनौतियों से बदलाव तक का सफर
मनभौतिन बाई बताती हैं कि महंगे कीटनाशकों और उर्वरकों के कारण न केवल खर्च बढ़ रहा था, बल्कि जहरीले रसायनों के उपयोग से स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा था। प्रशिक्षण के शुरुआती दौर में उत्पादन घटने और कीटों के हमले का डर था, लेकिन ‘प्रगति महिला स्वसहायता समूह’ के माध्यम से मिली ट्रेनिंग ने उनका नजरिया बदल दिया।
अब यह दंपत्ति जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और दशपर्णी अर्क जैसे प्राकृतिक उत्पादों का स्वयं निर्माण कर रहा है। इससे उनकी खेती की लागत में भारी गिरावट आई है, क्योंकि अब उन्हें बाजार से महंगी खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
प्राकृतिक खेती के मुख्य लाभ:
कम लागत: बेसन, गुड़, गौमूत्र और गोबर जैसे घरेलू संसाधनों से खाद तैयार होने के कारण प्रति एकड़ 20-22 हजार रुपये की बचत हो रही है।
बेहतर मृदा स्वास्थ्य: रसायनों के बंद होने से मिट्टी में केंचुओं और लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ी है, जिससे भूमि अधिक उपजाऊ हो गई है।
बाजार में बढ़ती मांग: ‘जहर मुक्त’ उपज होने के कारण व्यापारी सीधे खेत से ही फसल खरीद रहे हैं, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं।
वर्तमान 2025-26 के रबी सीजन में वे सरसों, मसूर और तिवड़ा जैसी फसलों के साथ सब्जियां उगा रहे हैं। मनभौतिन बाई की यह सफलता न केवल उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी एक मिसाल पेश कर रही है।
















