बस्तर की ‘बड़ी दीदी’ बुधरी ताती को पद्मश्री : संघर्ष और सेवा की अनूठी कहानी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा और स्वावलंबन की ज्योति जलाने वाली बुधरी ताती को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार द्वारा जारी सूची में उनके नाम की घोषणा की गई। दक्षिण बस्तर के बेहद चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील इलाकों में दशकों से समाज सेवा कर रहीं बुधरी ताती ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।
चार दशकों का अटूट समर्पण
बुधरी ताती पिछले लगभग 40 वर्षों से समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए कार्यरत हैं। उनके कार्यों की मुख्य झलकियाँ निम्नलिखित हैं:
नारी सशक्तिकरण: उन्होंने सिलाई-कढ़ाई और अन्य कौशलों के माध्यम से अब तक 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।
शिक्षा की अलख: अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जहाँ पहुंचना भी कठिन है, उन्होंने बच्चियों को स्कूल से जोड़ने और उन्हें शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बुजुर्गों का सहारा: वे न केवल युवाओं बल्कि वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्गों की सेवा और देखभाल के लिए भी समर्पित हैं।
दंतेवाड़ा के हीरानार गांव की निवासी बुधरी ताती को स्थानीय लोग श्रद्धा और प्रेम से ‘बड़ी दीदी’ कहकर पुकारते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भी पूर्व में उनके इन अविस्मरणीय योगदानों को सम्मानित कर चुकी है।
गोडबोले दंपति को भी मिला सम्मान
इसी के साथ, समाज सेवा की श्रेणी में ही रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले (डॉक्टर दंपति) को भी पद्मश्री से नवाजा गया है। इस दंपति ने अपना पूरा जीवन आदिवासी स्वास्थ्य सेवा के नाम कर दिया। ‘ट्रस्ट फॉर हेल्थ’ के माध्यम से उन्होंने सुदूर वनांचलों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर को कम करने के लिए जमीनी स्तर पर अभूतपूर्व काम किया है।
निष्कर्ष: यह सम्मान न केवल इन व्यक्तियों का है, बल्कि छत्तीसगढ़ के उन दुर्गम इलाकों के संघर्ष का भी है, जो अब विकास और सम्मान की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
















