बस्तर में नक्सलवाद का अंत? कुख्यात कमांडर सोढ़ी केशा के आत्मसमर्पण से बटालियन नंबर-1 का सफाया

जगदलपुर। बस्तर संभाग में शांति बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। नक्सलियों की सबसे घातक मानी जाने वाली ‘बटालियन नंबर-1’ के अंतिम स्तंभ और कमांडर सोढ़ी केशा ने अपने 31 साथियों (21 PLGA और 10 DKSZC सदस्य) के साथ हैदराबाद में आत्मसमर्पण कर दिया है। इस बड़े सरेंडर के साथ ही दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) का शीर्ष ढांचा लगभग ध्वस्त हो गया है।
तीन दशकों के आतंक का हुआ अंत
सुकमा जिले का निवासी सोढ़ी केशा साल 1995 से नक्सली संगठन में सक्रिय था। वह संगठन की उस सबसे खतरनाक यूनिट का नेतृत्व कर रहा था, जो सुरक्षाबलों पर बड़े और रणनीतिक हमलों के लिए कुख्यात रही है। उसके आत्मसमर्पण को नक्सली विचारधारा के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अब इस खूंखार बटालियन में कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं बचा है।
सरेंडर के साथ सौंपे हथियार और सोना
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त रणनीति का असर धरातल पर दिखने लगा है। इस आत्मसमर्पण के दौरान नक्सलियों ने न केवल हथियार डाले, बल्कि 36 आधुनिक हथियार और 800 ग्राम सोना भी पुलिस को सौंपा है। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना पुलिस के बीच बेहतर समन्वय ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को पूरी तरह असुरक्षित बना दिया है।
आईजी की चेतावनी: “मुख्यधारा में लौटें या परिणाम भुगतें”
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. ने इस सफलता की पुष्टि करते हुए कहा कि दंडकारण्य क्षेत्र अब काफी हद तक नक्सल मुक्त होने की राह पर है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी भी बीजापुर, कांकेर, सुकमा और नारायणपुर के कुछ आंतरिक इलाकों में छोटे नक्सली कैडर सक्रिय हैं।
आईजी ने शेष नक्सलियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा:
“बस्तर पुलिस उन सभी का स्वागत करने के लिए तैयार है जो हिंसा छोड़कर बेहतर जीवन जीना चाहते हैं। यह आत्मसमर्पण करने का अंतिम अवसर है। यदि वे मुख्यधारा में नहीं लौटते, तो सुरक्षाबलों की कार्रवाई और तेज की जाएगी।”
विकास और शांति की नई सुबह
पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने बस्तर में विकास कार्यों को गति दी है। स्थानीय प्रशासन का मानना है कि सोढ़ी केशा जैसे बड़े चेहरों के हटने से क्षेत्र में दहशत कम होगी और शासन की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेंगी।
















