भिलाई के रामनगर मुक्तिधाम में गहराया लकड़ी संकट : अंतिम विदाई के लिए भी जद्दोजहद

भिलाई। भिलाई नगर निगम के अंतर्गत आने वाले शहर के सबसे प्रमुख रामनगर मुक्तिधाम में इन दिनों एक गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो गया है। अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ियों की भारी किल्लत के कारण परिजनों को अपने प्रियजनों की अंतिम विदाई के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है या फिर बाजार से ऊंचे दामों पर लकड़ियां खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।
व्यवस्था चरमराई: 101 रुपये की योजना पर संकट
वर्ष 2006-07 में तत्कालीन प्रशासन द्वारा शुरू की गई यह जनहितैषी योजना आज प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती दिख रही है। इस योजना के तहत निर्धन वर्ग और आम जनता को मात्र 101 रुपये में अंतिम संस्कार की सामग्री (लकड़ी, पटरा या ताबूत) उपलब्ध कराई जाती थी।
ताजा स्थिति: सोमवार शाम तक मुक्तिधाम में 10 शव पहुंचे, लेकिन निगम केवल 6 के लिए ही लकड़ी का प्रबंध कर सका।
आर्थिक बोझ: निगम के पास स्टॉक खत्म होने के कारण लोगों को बाहर से 900 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर लकड़ी खरीदनी पड़ रही है, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक वज्रपात हो रहा है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर
सुविधाओं के अभाव को लेकर अब सत्ता के गलियारों में भी खींचतान शुरू हो गई है। जहाँ एक ओर स्थानीय विधायक का पक्ष नहीं मिल पा रहा है, वहीं महापौर नीरज पाल ने सीधे तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों को इसके लिए घेरा है।
“नगर निगम की सामान्य सभा में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जा चुकी थी और मार्च तक आपूर्ति सुनिश्चित होनी थी। टेंडर प्रक्रिया एक वैधानिक कार्य है और मुक्तिधाम में लकड़ियों की इस अनुपलब्धता के लिए सीधे तौर पर भिलाई कमिश्नर जिम्मेदार हैं।” — नीरज पाल, महापौर
सामाजिक संस्थाओं ने जताया रोष
मुक्तिधाम में मौजूद परिजनों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने निगम की इस कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया है। लोगों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को प्रशासनिक लापरवाही के भरोसे छोड़ देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
लकड़ी की आपूर्ति को तत्काल युद्ध स्तर पर बहाल किया जाए।
भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए ‘बफर स्टॉक’ की व्यवस्था हो।
गरीब वर्ग के लिए निशुल्क या रियायती दरों पर सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
यह योजना न केवल भिलाई बल्कि देश के लिए एक मिसाल थी, लेकिन वर्तमान हालातों ने इसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन को चाहिए कि मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का त्वरित समाधान निकाले।
















