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पाकिस्तान के पुनर्गठन की सुगबुगाहट : क्या छोटे प्रांतों में बंटवारा सुलझाएगा देश के संकट?

पाकिस्तान (एजेंसी)। पाकिस्तान में एक बार फिर प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव की बहस छिड़ गई है। देश के भीतर राज्यों की संख्या बढ़ाने और मौजूदा बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में विभाजित करने की मांग ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सरकार का दावा है कि इस कदम से गवर्नेंस बेहतर होगी, लेकिन जानकारों को इसमें भविष्य के खतरे दिखाई दे रहे हैं।

विभाजन का क्या है प्रस्तावित खाका?

संघीय संचार मंत्री और इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी (IPP) के प्रमुख अब्दुल अलीम खान ने इस योजना को सार्वजनिक पटल पर रखा है। प्रस्तावित योजना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

प्रांतों का विस्तार: वर्तमान के चार मुख्य प्रांतों—पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा—को तोड़कर 12 से 16 नई प्रशासनिक इकाइयां बनाई जा सकती हैं।

तर्क: सरकार का मानना है कि आबादी के बढ़ते बोझ के कारण बड़े प्रांतों का प्रबंधन कठिन हो गया है। छोटे राज्य बनने से सरकारी सेवाएं और विकास की योजनाएं दूर-दराज के इलाकों तक आसानी से पहुँच सकेंगी।

सियासी खींचतान: समर्थन और विरोध

इस प्रस्ताव ने पाकिस्तान की गठबंधन सरकार में शामिल दलों के बीच मतभेद उजागर कर दिए हैं:

समर्थक: शहबाज शरीफ सरकार में शामिल IPP और MQM-P इस बदलाव के पक्ष में हैं। MQM-P तो इसके लिए संविधान संशोधन तक की वकालत कर रही है।

विरोधी: बिलावल भुट्टो की पीपुल्स पार्टी (PPP) इसका कड़ा विरोध कर रही है। सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने साफ कर दिया है कि वे प्रांत के किसी भी तरह के बंटवारे को बर्दाश्त नहीं करेंगे।

सांस्कृतिक चिंताएं: बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के स्थानीय संगठनों का मानना है कि यह विभाजन उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने की एक कोशिश है।

विशेषज्ञों की राय: समाधान या नई चुनौती?

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की असली समस्या प्रांतों का आकार नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार और जवाबदेही का अभाव है।

आर्थिक बोझ: विशेषज्ञों के अनुसार, नए प्रांत बनाना एक अत्यंत खर्चीला काम है। पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति में नए सचिवालय, विधानसभाएं और प्रशासनिक अमला खड़ा करना देश पर भारी पड़ सकता है।

सुरक्षा का जोखिम: 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को खोने का घाव अभी भरा नहीं है। बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पहले से ही अस्थिरता है, ऐसे में नए सिरे से सीमाएं खींचना अलगाववादी भावनाओं को भड़का सकता है।

इतिहास पर एक नज़र: आजादी के समय पाकिस्तान में 5 प्रांत थे, लेकिन 1971 के बाद ढांचा पूरी तरह बदल गया। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘प्रशासनिक सुधार’ के नाम पर लिया जाने वाला यह फैसला पाकिस्तान को मजबूती देगा या उसे और अधिक अस्थिरता की ओर धकेल देगा।

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