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चाबहार बंदरगाह : अमेरिकी प्रतिबंधों के साये में भारत की बदलती रणनीति

नई दिल्ली (एजेंसी)। ईरान में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत अपनी भूमिका को लेकर नई रणनीति पर विचार कर रहा है। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और भविष्य की अनिश्चितताओं ने इस परियोजना के स्वरूप पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत इस समय वाशिंगटन के साथ निरंतर संवाद में है ताकि अपने हितों की रक्षा कर सके।

क्या है विवाद की मुख्य वजह?

हाल ही में अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury) ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर नए टैरिफ और प्रतिबंधों के संकेत दिए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत को मिली वर्तमान छूट 26 अप्रैल, 2026 तक ही वैध है। इस समय सीमा के नजदीक आने और अमेरिकी विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) की सख्त निगरानी के कारण भारत अपनी प्रत्यक्ष भागीदारी को कम करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है।

भारत की ‘एग्जिट’ नहीं, बल्कि ‘री-स्ट्रक्चरिंग’ की योजना

सूत्रों के अनुसार, भारत इस परियोजना से पूरी तरह नाता तोड़ने के बजाय अपनी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी को समाप्त करने की दिशा में बढ़ सकता है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं:

12 करोड़ डॉलर का हस्तांतरण: भारत अपनी सीधी हिस्सेदारी खत्म करने के लिए लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर के फंड को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में है।

नई संस्था का गठन: संभावना जताई जा रही है कि चाबहार के संचालन के लिए एक नई स्वतंत्र इकाई (Entity) बनाई जा सकती है। इससे भारत सरकार की सीधी जवाबदेही कम होगी, लेकिन रणनीतिक समर्थन बना रहेगा।

प्रबंधित वापसी: इसे ‘अचानक बाहर निकलना’ नहीं, बल्कि एक ‘सोची-समझी और सीमित भागीदारी’ (Managed and Limited Participation) के रूप में देखा जा रहा है।

चाबहार का रणनीतिक महत्व

भारत के लिए चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुँचने का एक ऐसा प्रवेश द्वार है जो पाकिस्तान को बाईपास करता है। भारत ने इसके टर्मिनलों के विकास में भारी निवेश किया है ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत किया जा सके।

प्रमुख बिंदु, आगे की राह

जैसे-जैसे अप्रैल 2026 की डेडलाइन करीब आ रही है, भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने प्रगाढ़ होते संबंधों को बचाए रखे और साथ ही मध्य एशिया में अपने रणनीतिक निवेश को भी बेकार न होने दे। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भारत तकनीकी भूमिका में बना रहेगा या परियोजना से पूरी तरह दूरी बनाएगा।विवरण
स्थान,ईरान का दक्षिण-पूर्वी तट (ओमान की खाड़ी)
मुख्य उद्देश्य,अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए वैकल्पिक मार्ग
चुनौती,अमेरिकी प्रतिबंध और अप्रैल 2026 की समय सीमा
प्रस्तावित समाधान,प्रत्यक्ष भागीदारी की जगह तकनीकी या अप्रत्यक्ष सहयोग

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