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भारत-अमेरिका व्यापारिक संधि : 500 अरब के आयात लक्ष्य और सप्लाई चेन की चुनौतियां

नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई हलचल पैदा कर दी है। भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से लगभग $500 अरब (करीब ₹41 लाख करोड़) मूल्य की वस्तुओं के आयात का संकल्प लिया है। हालांकि, इस विशाल लक्ष्य की प्राप्ति केवल भारत की खरीदारी की इच्छा पर नहीं, बल्कि अमेरिकी उद्योगों की आपूर्ति क्षमता (Supply Capacity) पर भी टिकी है।

प्रमुख आयात क्षेत्र: ऊर्जा और हाई-टेक पर फोकस

इस समझौते के केंद्र में वे क्षेत्र हैं जहाँ भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अधिक संसाधनों की आवश्यकता है:

ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव: भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस और अन्य देशों के बजाय अमेरिका की ओर रुख कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात में भारी उछाल देखा गया है। इसके अलावा, बेहतर गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमतों के कारण अमेरिकी कोयला और LNG (तरल प्राकृतिक गैस) भी भारतीय कंपनियों की पहली पसंद बन रहे हैं।

विमानन और डिफेंस: भारतीय एयरलाइंस द्वारा बोइंग को दिए जाने वाले अरबों डॉलर के नए ऑर्डर इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

सेमीकंडक्टर और AI: डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स के विकास के लिए आवश्यक हाई-एंड चिप्स और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका से मंगाया जाएगा।

क्या अमेरिकी कंपनियां इस मांग को पूरा कर पाएंगी?

भले ही भारत ने खरीदारी का रोडमैप तैयार कर लिया है, लेकिन विशेषज्ञों ने कुछ संभावित बाधाओं की ओर इशारा किया है:

ऑर्डर का बैकलॉग: विमानन क्षेत्र में बोइंग जैसी बड़ी कंपनियों के पास पहले से ही ऑर्डर्स की लंबी कतार है। ऐसे में समय पर डिलीवरी देना एक बड़ी चुनौती होगी।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा: सेमीकंडक्टर और हाई-टेक उत्पादों की मांग पूरी दुनिया में है। भारतीय खरीदारों को इन संसाधनों को हासिल करने के लिए वैश्विक बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।

सप्लाई चेन की सीमाएं: अमेरिकी तेल के कुओं और कारखानों की उत्पादन क्षमता क्या भारत की सालाना $100 अरब की मांग को तुरंत पूरा कर पाएगी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

कूटनीतिक और आर्थिक प्रभाव

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। जहाँ भारत को टैरिफ में 18% की छूट का लाभ मिल रहा है, वहीं अमेरिका को एक सुरक्षित और विशाल बाजार मिल गया है। यह कदम न केवल भारत की रूस पर ऊर्जा निर्भरता को कम करेगा, बल्कि वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक साझेदारी को भी नए आयाम देगा।

निष्कर्ष: $100 अरब प्रति वर्ष का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। इसकी सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी विक्रेता भारतीय बाजार के लिए कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से अपनी सप्लाई लाइन को सक्रिय करते हैं।

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