ईरान की सत्ता में मोजतबा खामेनेई का उदय : क्या पश्चिम के साथ बढ़ेगा सीधा संघर्ष?

नई दिल्ली (एजेंसी)। ईरान की सत्ता में मोजतबा खामेनेई का उदय: क्या पश्चिम के साथ बढ़ेगा सीधा संघर्ष?
ईरान के राजनीतिक क्षितिज पर एक बड़ा बदलाव हुआ है। देश की शक्तिशाली परिषद ने मोजतबा खामेनेई को नया ‘सुप्रीम लीडर’ (सर्वोच्च नेता) नियुक्त किया है। वे अपने पिता, दिवंगत अयातुल्ला अली खामेनेई का स्थान लेंगे। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चयन ईरान की उस मंशा को दर्शाता है जिसमें वह झुकने के बजाय संघर्ष के मार्ग पर अडिग रहना चाहता है।
क्यों महत्वपूर्ण है सुप्रीम लीडर का पद?
ईरानी शासन व्यवस्था में सुप्रीम लीडर का स्थान राष्ट्रपति से भी ऊपर होता है। देश की सेना, परमाणु नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े तमाम बड़े फैसले इसी पद से नियंत्रित होते हैं। मोजतबा की नियुक्ति को कट्टरपंथी विचारधारा की जीत के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका और इजरायल के लिए चुनौतियां
विशेषज्ञों के अनुसार, मोजतबा का नेतृत्व अमेरिका के लिए एक कूटनीतिक झटका है। रिपोर्टों के संकेत हैं कि युद्ध के दौरान अपने पिता और परिवार के सदस्यों को खोने के बाद, मोजतबा का रुख पश्चिमी देशों के प्रति और भी सख्त हो सकता है।
कठोर छवि: पूर्व अमेरिकी राजनयिक एलन आयर के अनुसार, मोजतबा अपने पिता की तुलना में अधिक कट्टरपंथी हैं।
IRGC का समर्थन: उन्हें ईरान की शक्तिशाली ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) का पूरा समर्थन प्राप्त है।
प्रतिबंधों का इतिहास: अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 2019 में ही उन पर प्रतिबंध लगा दिए थे, क्योंकि वे पर्दे के पीछे से सत्ता का संचालन कर रहे थे।
घरेलू और वैश्विक प्रभाव
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा के आने से ईरान और इजरायल के बीच चल रहा तनाव कम होने के बजाय और बढ़ सकता है। 56 वर्षीय मोजतबा, जिन्हें ‘हुज्जतुल इस्लाम’ की उपाधि प्राप्त है, एक ऐसे समय में कमान संभाल रहे हैं जब ईरान आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संकट में है:
चुनौती, विवरण
आर्थिक संकट,गिरती मुद्रा और बढ़ती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है।
जन आक्रोश,सरकार की सख्त नीतियों के खिलाफ देश के भीतर विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है।
सैन्य तनाव,इजरायल और अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव का खतरा मंडरा रहा है।
विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि मोजतबा खामेनेई के पास वर्तमान परिस्थितियों में समझौता करने की गुंजाइश बेहद कम है, जिससे आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति और अधिक अस्थिर हो सकती है।
















