मध्यप्रदेश

बुंदेलखंड में वन्यजीवों का नया सवेरा : चीतों के आगमन की तैयारी और कछुओं का संरक्षण

भोपाल (एजेंसी)। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने 61वें जन्मदिन के अवसर पर सागर जिले के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) को एक बड़ी सौगात दी है। उन्होंने यहाँ वन्यजीव संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए जैव विविधता को समृद्ध करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

चीतों का अगला ठिकाना बनेगा नौरादेही

मुख्यमंत्री ने टाइगर रिजर्व में चीतों के पुनर्वास के लिए विशेष बाड़े (सॉफ्ट रिलीज बोमा) का भूमि-पूजन किया। कूनो और गांधी सागर के बाद अब नौरादेही मध्य प्रदेश में चीतों का तीसरा सुरक्षित घर बनने जा रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ दक्षिण अफ्रीका के घास के मैदानों के समान हैं, जो चीतों के फलने-फूलने के लिए अत्यंत अनुकूल हैं।

जलीय जीवन को मिला नया जीवन

पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से, मुख्यमंत्री ने बामनेर नदी में 14 कछुओं को मुक्त किया। इनमें शामिल हैं:

टेरा प्रिंस प्रजाति: 06 कछुए

सुंदरी प्रजाति: 08 कछुए

ये कछुए चंबल और भोपाल से लाए गए हैं, जो नदियों की स्वच्छता बनाए रखने में प्राकृतिक फिल्टर का काम करते हैं।

वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व की खासियतें

यह मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है, जो 2,339 वर्ग किमी में फैला है।

विस्तार: सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिलों तक फैला हुआ।

उपनाम: इसे ‘लैंड ऑफ वुल्व्स’ (भेड़ियों की धरती) भी कहा जाता है।

वन्यजीव विविधता: यहाँ वर्तमान में लगभग 32 बाघ हैं। इसके अलावा पैंथर, भालू, नीलगाय और पक्षियों की 240 से अधिक प्रजातियाँ यहाँ के आकर्षण का केंद्र हैं।

“प्रकृति और वन्यजीवों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। हमारी सरकार जलचर, थलचर और नभचर—सभी के संरक्षण के लिए संकल्पित है।”
— डॉ. मोहन यादव, मुख्यमंत्री

जनता के बीच मुख्यमंत्री: सहजता और आत्मीयता

जन्मदिन के अवसर पर मुख्यमंत्री का एक मानवीय और सरल पक्ष भी देखने को मिला:

बेटियों का सम्मान: उन्होंने बालिकाओं को अपने हाथों से मिठाई खिलाई और उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस वितरित कर महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया।

किसान के घर भोजन: मुख्यमंत्री ने कृषक हरदास रैकवार के खेत में आम के पेड़ की छांव में बैठकर पारंपरिक बुंदेली भोजन (बिर्रा की रोटी, कढ़ी और समा के चावल की खीर) का आनंद लिया। भोजन से पहले उन्होंने गौ-सेवा भी की।

राज्य सरकार के इन प्रयासों से न केवल वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय ग्रामीण आबादी के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह पहल विकास और प्रकृति के बीच बेहतर समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

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