लाइफ-स्टाइलहेल्थ

कमर दर्द की अनदेखी भारी पड़ सकती है : ‘स्लिप डिस्क’ के संकेत और बचाव

नई दिल्ली (एजेंसी)। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में कमर दर्द एक आम समस्या बन गया है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना आपके लिए गंभीर परेशानी खड़ी कर सकता है। इसलिए, कमर दर्द के कारणों को समझना और इसके उपायों को जानना बहुत जरूरी है।

रीढ़ की बनावट और ‘डिस्क’ का महत्व हमारी रीढ़ (स्पाइनल कॉलम) एक दूसरे के ऊपर टिकी हुई हड्डियों से बनी होती है। ऊपर से नीचे तक, सर्वाइकल स्पाइन में सात, थोरैसिक स्पाइन में बारह और लम्बर स्पाइन में पाँच हड्डियाँ होती हैं। इसके नीचे सैक्रम और कॉक्सिक्स (टेलबोन) होते हैं। इन हड्डियों के बीच एक मुलायम, गद्दे जैसी संरचना होती है, जिसे ‘डिस्क’ कहते हैं। ये डिस्क रोजमर्रा की गतिविधियों जैसे चलने, उठाने या मुड़ने के दौरान हड्डियों को आपस में टकराने से बचाती हैं। ये डिस्क रीढ़ की हड्डियों को झटके या दबाव से भी सुरक्षा देती हैं।

स्लिप डिस्क क्या है? हर डिस्क के दो हिस्से होते हैं: एक नरम, अंदरूनी हिस्सा और एक कठोर बाहरी रिंग। चोट या कमजोरी के कारण जब डिस्क का नरम भीतरी हिस्सा कठोर बाहरी रिंग से बाहर निकल जाता है, तो मेडिकल भाषा में इसे ‘स्लिप डिस्क’ कहा जाता है। यह स्थिति बहुत ज्यादा दर्द और बेचैनी पैदा कर सकती है। गंभीर मामलों में, स्लिप डिस्क की मरम्मत के लिए सर्जरी की भी जरूरत पड़ सकती है।

स्लिप डिस्क कहाँ हो सकता है? डॉक्टरों के अनुसार, स्लिप डिस्क गर्दन से लेकर निचले हिस्से तक रीढ़ में कहीं भी हो सकता है। हालांकि, निचले हिस्से (लोवर बैक) को स्लिप डिस्क के लिए सबसे सामान्य क्षेत्र माना जाता है। ऐसा होने पर रीढ़ के आसपास की नसों (Nerves) और मांसपेशियों पर अधिक दबाव पड़ सकता है।

स्लिप डिस्क के लक्षण आमतौर पर स्लिप डिस्क होने पर शरीर के एक हिस्से में दर्द और सुन्नपन महसूस हो सकता है। यह दर्द आपके हाथ या पैर तक भी फैल सकता है।

यह दर्द अक्सर रात में या शरीर की हल्की हलचल से भी बढ़ सकता है।

उठने-बैठने में दर्द महसूस होना।

मांसपेशियों में कमजोरी आना।

प्रभावित क्षेत्र में झनझनाहट, दर्द और जलन महसूस हो सकती है।

स्लिप डिस्क के कारण स्लिप डिस्क तब होता है जब रीढ़ की डिस्क की बाहरी रिंग कमजोर पड़ जाती है या फट जाती है, जिससे भीतरी हिस्सा बाहर निकल आता है।

बढ़ती उम्र के साथ यह अक्सर होता है, क्योंकि उम्र बढ़ने पर डिस्क का सुरक्षात्मक पानी कम होने लगता है।

अचानक मुड़ने, घूमने या कोई चीज उठाते समय भी स्लिप डिस्क हो सकता है।

कई बार भारी चीज उठाते समय निचली पीठ में मोच आने से भी स्लिप डिस्क हो जाता है। जो लोग ज्यादा वजन उठाने का काम करते हैं, उनमें इसका खतरा अधिक होता है।

मोटापे से पीड़ित लोगों में भी जोखिम ज्यादा होता है।

कमजोर मांसपेशियां और सुस्त जीवनशैली भी स्लिप डिस्क के लिए जिम्मेदार हो सकती है।

महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है।

स्लिप डिस्क का पता कैसे लगाएं? डॉक्टर सबसे पहले शारीरिक जांच करते हैं। वे दर्द और बेचैनी का कारण जानने की कोशिश करते हैं, नसों और मांसपेशियों के कार्य को समझते हैं। वे यह देखते हैं कि प्रभावित क्षेत्र में कहाँ छूने से दर्द होता है। इसके अलावा, डॉक्टर एक्स-रे, सीटी स्कैन्स, एमआरआई स्कैन्स और डिस्कोग्राम्स जैसे इमेजिंग टेस्ट्स के जरिए भी स्लिप डिस्क का पता लगा सकते हैं।

स्लिप डिस्क के खतरे स्लिप डिस्क नसों को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है। कुछ मामलों में, यह निचली पीठ और पैरों में मौजूद कॉडा इक्विना नर्व के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। ऐसा होने पर व्यक्ति आंत और ब्लैडर पर नियंत्रण खो सकता है। इससे सैडल एनेस्थीसिया नामक एक दीर्घकालिक जटिलता भी हो सकती है। यह स्थिति बहुत गंभीर हो सकती है, इसलिए डॉक्टर से इसकी जांच जरूर करवानी चाहिए।

इलाज क्या है? स्लिप डिस्क का इलाज परंपरागत चिकित्सा पद्धति से लेकर सर्जरी तक संभव है। इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी को कितनी बेचैनी है और डिस्क अपनी जगह से कितनी खिसकी है। कुछ लोग फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह पर सही एक्सरसाइज प्रोग्राम के जरिए भी स्लिप डिस्क के दर्द से राहत पा सकते हैं।

नियमित रूप से करें ये एक्सरसाइज स्लिप डिस्क के जोखिम को कम करने के लिए कुछ व्यायाम नियमित रूप से किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मॉडिफाइड कोबरा, ब्रिज और प्लैंक जैसी एक्सरसाइज से इसमें फायदा होता है। साथ ही, जिम में वेट ट्रेनिंग करते समय कंधे या कमर से ऊपर बहुत ज्यादा वजन नहीं उठाना चाहिए।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button