छत्तीसगढ़

नई पीढ़ी को संस्कृति, कला और लोक परंपराओं की जानकारी देना समय की आवश्यकता है : बृजमोहन अग्रवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कलाओं, हस्तशिल्प और आधुनिक सृजनशीलता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित संस्कृति विभाग का प्रसिद्ध प्रशिक्षण शिविर ‘आकार-2026’ धूमधाम से संपन्न हो गया। रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में 25 मई से 9 जून तक चले इस 16 दिवसीय आयोजन में राज्यभर के 1281 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और 16 अलग-अलग विधाओं में अपनी कला को निखारा।

इस भव्य समापन समारोह के मुख्य अतिथि रायपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद बृजमोहन अग्रवाल रहे। कार्यक्रम में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा, राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, फिल्म विकास निगम की अध्यक्षा मोना सेन और संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी और अभिभावक मौजूद थे।

संभाग स्तर पर हो आयोजन, बने स्थायी बाजार: बृजमोहन अग्रवाल

समारोह को संबोधित करते हुए सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने पुरानी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि साल 2004 में जब वे संस्कृति मंत्री थे, तब उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए इस शिविर की शुरुआत की थी।

बृजमोहन अग्रवाल ने कहा: “आज के समय में बच्चों को प्रकृति और अपनी मिट्टी से जोड़ना बहुत आवश्यक है। जिस दिन युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और लोक विधाओं का मूल्य समझने लगेगी, उनका जीवन संवेदनशील और रचनात्मक बन जाएगा। इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए अब इसे हर संभाग में आयोजित किया जाना चाहिए।”

उन्होंने स्थानीय कलाकारों की आर्थिक उन्नति के लिए छत्तीसगढ़ के पारंपरिक आभूषणों और हस्तशिल्प के वास्ते एक परमानेंट सेलिंग सेंटर (स्थायी विक्रय केंद्र) बनाने का भी सुझाव दिया।

इस बार क्या रहा खास?

संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने बताया कि ‘आकार’ केवल एक समर कैंप नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का जरिया है। इस साल आयोजन को और अधिक समावेशी बनाने के लिए कुछ विशेष कदम उठाए गए:

सस्ती फीस और विशेष छूट: ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए रजिस्ट्रेशन फीस को 200 रुपये से घटाकर 100 रुपये किया गया। साथ ही दिव्यांग और अनाथ बच्चों को इसमें विशेष रियायत दी गई।

परंपरा और आधुनिकता का मेल: इस बार शिविर में जहां एक तरफ टेराकोटा, जूट शिल्प, रजवार भित्ति चित्र, गोदना कला और कथक जैसी प्राचीन विधाएं सिखाई गईं, वहीं दूसरी तरफ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित कला की नई तकनीकों से भी रू-ब-रू कराया गया।

सांस्कृतिक संध्या में बिखरे छत्तीसगढ़ के रंग

समापन के मौके पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रशिक्षुओं ने अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया। सुवा, कर्मा, पंथी नृत्य के साथ-साथ बांसगीत और भरथरी गायन की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बांधे रखा। पारंपरिक पहनावे और लोक वाद्यों की गूंज ने माहौल को उत्सव में बदल दिया।

इस दौरान एआई आर्ट के लिए वल्कल्पति जेस्सी, टेराकोटा के लिए विमल फुटान, कथक के लिए चिरंजीव हलधर और लोकसंगीत के लिए तेजराम साहू समेत सभी विधाओं के प्रतिष्ठित गुरुओं व प्रशिक्षकों को सम्मानित किया गया। ‘आकार-2026’ ने एक बार फिर साबित किया कि राज्य की कला और संस्कृति युवाओं के माध्यम से एक सुरक्षित और सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ रही है।

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