संघ के स्वरूप पर मोहन भागवत का स्पष्टीकरण : ‘हम अर्धसैनिक बल नहीं, सामाजिक शक्ति हैं’

भोपाल (एजेंसी)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में संघ की कार्यप्रणाली और उसकी छवि को लेकर एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ के बारे में समाज के एक वर्ग में भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं। भागवत के अनुसार, RSS कोई पैरा-मिलिट्री (अर्धसैनिक) बल नहीं है, बल्कि इसका मूल ध्येय राष्ट्र निर्माण और समाज को सूत्रबद्ध करना है।
बाहरी दिखावे से परे है संघ का उद्देश्य
भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि अक्सर लोग स्वयंसेवकों की वर्दी, उनके मार्च पास्ट और दंड (लाठी) के अभ्यास को देखकर उन्हें एक सैन्य संगठन मान लेते हैं। उन्होंने कहा, “केवल अनुशासन और गणवेश के आधार पर संघ को अर्धसैनिक संगठन कहना गलत है। जो लोग ऐसा सोचते हैं, वे वास्तव में संघ की अंतरात्मा और उसके उद्देश्यों को गहराई से नहीं समझते।”
सूचना के स्रोतों पर उठाये सवाल
आज के डिजिटल युग में जानकारी जुटाने के तरीकों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि लोग अब विषयों का गहन अध्ययन करने के बजाय इंटरनेट और विकिपीडिया जैसे मंचों पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं। उन्होंने सचेत किया कि डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध हर जानकारी पूर्णतः सत्य या निष्पक्ष नहीं होती। संघ को सही ढंग से समझने के लिए विश्वसनीय स्रोतों और प्रत्यक्ष अनुभव की आवश्यकता है।
भारत की ऐतिहासिक पराजयों से सीख
इतिहास का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने एक गंभीर पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों से पहले भी भारत को कई बार विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि:
आक्रमणकारी न तो हमसे अधिक धनवान थे और न ही अधिक गुणवान।
इसके बावजूद भारत सात बार पराजित हुआ और अंग्रेज आठवें आक्रमणकारी थे।
यह पराजय संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि सामाजिक बिखराव के कारण हुई।
राष्ट्र की सुरक्षा का असली मंत्र
भागवत ने समाज को आत्मचिंतन का संदेश देते हुए कहा कि केवल सीमाओं पर सुरक्षा ही काफी नहीं है, बल्कि देश की वास्तविक सुरक्षा समाज की एकजुटता में निहित है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचता है, तो राष्ट्र कमजोर होता है। इसके विपरीत, जब समाज नैतिक मूल्यों के साथ संगठित होता है, तभी देश अजेय बनता है।
















