यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर विवाद : दिग्विजय सिंह ने उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली (एजेंसी)। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए जारी किए गए नए ‘इक्विटी नियमों’ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी पर तीखा हमला बोला है। उनका आरोप है कि जनवरी 2026 में लागू किए गए अंतिम नियमों में संसदीय समिति की कई महत्वपूर्ण सिफारिशों को दरकिनार कर दिया गया है।
संसदीय समिति की सलाह की अनदेखी का आरोप
दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी एक विस्तृत पोस्ट में दावा किया कि इन नियमों का सफर फरवरी 2025 में शुरू हुआ था। रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों के बाद बने इन ड्राफ्ट नियमों को समीक्षा के लिए शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा गया था।
दिग्विजय सिंह के अनुसार, संसदीय समिति ने सर्वसम्मति से कुछ ठोस सुझाव दिए थे ताकि उच्च शिक्षा में भेदभाव को पूरी तरह खत्म किया जा सके, लेकिन अंतिम ड्राफ्ट में इनमें से कई बिंदु गायब हैं।
क्या थीं संसदीय समिति की मुख्य सिफारिशें?
सिंह ने अपनी पोस्ट में उन बिंदुओं को साझा किया जिन्हें यूजीसी ने नजरअंदाज किया:
व्यापक सुरक्षा का दायरा: समिति ने सुझाव दिया था कि भेदभाव के दायरे में केवल एससी/एसटी ही नहीं, बल्कि ओबीसी और दिव्यांग छात्रों को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
इक्विटी कमेटी का पुनर्गठन: समिति का मानना था कि संस्थानों में बनने वाली ‘इक्विटी कमेटी’ में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत होना चाहिए, ताकि निर्णय निष्पक्ष हों।
पारदर्शिता और जवाबदेही: ड्राफ्ट में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों का वार्षिक सार्वजनिक खुलासा (Public Disclosure) अनिवार्य करने की बात कही गई थी।
दोहरे विरोध के बीच फंसी यूजीसी
दिग्विजय सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि नए नियमों ने न केवल आरक्षित वर्ग बल्कि सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच भी असंतोष पैदा कर दिया है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
झूठे आरोपों पर दंड का प्रावधान हटाना: शुरुआती ड्राफ्ट में भेदभाव के झूठे मामले दर्ज कराने वालों के लिए सजा का प्रावधान था। यूजीसी ने अंतिम नियमों में इसे हटा दिया है। सामान्य वर्ग के छात्रों को डर है कि इससे नियमों का दुरुपयोग बढ़ सकता है।
भेदभाव की परिभाषा: नियमों में केवल आरक्षित वर्गों को ही भेदभाव का शिकार माना गया है। सामान्य वर्ग के छात्रों का तर्क है कि इससे समाज में यह संदेश जाता है कि केवल वही भेदभाव के दोषी हैं, जो कि अनुचित है।
निष्कर्ष और सलाह
दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि संसदीय समिति ने सुझाव दिया था कि ‘भेदभाव’ की श्रेणी में आने वाले कृत्यों की एक विस्तृत सूची बनाई जाए ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो। उन्होंने कहा कि यूजीसी ने अपनी मर्जी से इन सुझावों को बदला है, इसलिए अब इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी भी यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय की ही है।
















