अर्थव्यवस्था बनाम लोकलुभावनवाद : सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजनाओं पर जताई चिंता

नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में बढ़ते ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त सुविधाओं) के चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल मुफ्त चीजें बांटने से विकास संभव नहीं है; इसके बजाय प्रशासन को रोजगार पैदा करने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर अपनी ऊर्जा खर्च करनी चाहिए। अदालत के अनुसार, वित्तीय अनुशासन की अनदेखी भविष्य में देश के लिए आर्थिक संकट पैदा कर सकती है।
वित्तीय सेहत पर बढ़ता बोझ
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्यों की आर्थिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट की मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
कर्ज का जाल: कई राज्य पहले से ही भारी कर्ज में दबे हैं, फिर भी मुफ्त बिजली और नकद सहायता जैसी योजनाएं धड़ल्ले से जारी हैं।
संसाधनों की कमी: यदि सारा बजट मुफ्त उपहारों में चला जाएगा, तो सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों जैसे विकास कार्यों के लिए धन कहाँ से आएगा?
राजस्व घाटा: वित्तीय जिम्मेदारी का पालन न करने से राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ता जा रहा है, जो लंबे समय में अर्थव्यवस्था को खोखला कर सकता है।
सब्सिडी के चलते बिजली कंपनियां संकट में
अदालत ने विशेष रूप से तमिलनाडु सरकार की बिजली सब्सिडी योजना का जिक्र करते हुए नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि कुछ विशेष वर्गों को दी जा रही सब्सिडी का सीधा असर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की वित्तीय स्थिति पर पड़ रहा है। इन कंपनियों ने इस दबाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
चुनाव और कल्याणकारी कार्यों में संतुलन
कोर्ट ने चुनावी घोषणाओं के समय पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि आखिर चुनावों के ठीक पहले ही ऐसी योजनाओं की बाढ़ क्यों आती है?
अदालत का मत: “जरूरतमंदों की मदद करना सरकार का नैतिक कर्तव्य है, लेकिन बिना सोचे-समझे बांटी जा रही रियायतें अर्थव्यवस्था के लिए घातक हैं। कल्याणकारी नीतियों और वित्तीय अनुशासन के बीच एक सटीक संतुलन होना अनिवार्य है।”
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सामाजिक न्याय तभी टिकाऊ होगा जब वह आर्थिक रूप से सुरक्षित और जिम्मेदार विकास पर आधारित हो।
















