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महाशिवरात्रि विशेष : महादेव के ‘बाल स्वरूप’ का रहस्य और देवी तारा का ममतामयी आँचल

न्युज डेस्क (एजेंसी)। महाशिवरात्रि का पर्व निकट है और देशभर के शिवालयों में महादेव के विविध रूपों की आराधना की तैयारी चल रही है। हम अक्सर शिव को एक वैरागी योगी या शिवलिंग के रूप में पूजते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पुराणों में शिव के एक ऐसे ‘बाल स्वरूप’ का वर्णन है, जहाँ एक देवी उन्हें अपनी संतान की तरह स्तनपान कराती हैं? आइए जानते हैं शिव के इस अद्भुत रूप और उनके श्मशान निवासी होने के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य।

जब महादेव बने बालक: ‘अक्षोभ्य शिव’ की कथा

हिंदू धर्मग्रंथों और तंत्र परंपरा में शिव के ‘अक्षोभ्य’ रूप का वर्णन मिलता है। यह रूप तब प्रकट हुआ जब समुद्र मंथन के समय निकला भीषण ‘हलाहल’ विष ब्रह्मांड को नष्ट करने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए शिव ने उस विष का पान तो कर लिया, लेकिन वह विष इतना प्रभावशाली था कि महादेव का कंठ नीला पड़ गया और उनके शरीर में असहनीय जलन होने लगी।

इस असहनीय ताप को शांत करने के लिए माता पार्वती ने देवी तारा (उग्रतारा) का रूप धारण किया। तंत्र शास्त्र के अनुसार:

देवी तारा ने अपने योगबल से महादेव के विषैले ताप को सोखने के लिए उन्हें एक नवजात शिशु का रूप दे दिया।

जैसे एक व्याकुल बच्चा भूख से रोता है, वैसे ही बालक शिव की पीड़ा देख देवी तारा का हृदय ममता से भर गया।

देवी ने शिव को अपनी गोद में लेकर उन्हें अमृततुल्य दुग्धपान कराया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ और महादेव को पीड़ा से मुक्ति मिली।

इसी कारण तंत्र साधना में देवी तारा को ‘शिव की माता’ के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।

महादेव श्मशान में क्यों रहते हैं?

अक्सर मन में सवाल उठता है कि समस्त ऐश्वर्य के स्वामी होने के बाद भी शिव श्मशान की राख क्यों मलते हैं और वहीं क्यों निवास करते हैं? इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं:

अंतिम सत्य का बोध: श्मशान वह स्थान है जहाँ मनुष्य का अहंकार, जाति, रूप और धन सब राख बन जाते हैं। शिव यहाँ रहकर संदेश देते हैं कि संसार नश्वर है और अंततः सबको इसी मिट्टी में मिलना है।

देवी तारा से जुड़ाव: देवी उग्रतारा का निवास स्थान ‘महा-श्मशान’ माना जाता है। शिव अपनी माता और शक्ति के इसी स्वरूप के करीब रहने के लिए श्मशान को अपना घर चुनते हैं।

भय पर विजय: आम इंसान श्मशान और मृत्यु से डरता है, लेकिन शिव ‘महाकाल’ हैं। वे मृत्यु के अधिपति हैं, इसलिए वे वहीं विराजते हैं जहाँ जीवन का अंत और मोक्ष का आरंभ होता है।

शिव का स्वरूप: माँ के प्रति प्रेम का प्रतीक

यदि आप गौर करें, तो शिव के श्रृंगार की वस्तुएं—जैसे बाघ की खाल, गले में सांपों की माला और शरीर पर भस्म—ये सभी देवी तारा (उग्रतारा) के उग्र स्वरूप से मेल खाती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि शिव ने अपनी ‘माता’ के गुणों और उनके परिवेश को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है।

निष्कर्ष: महाशिवरात्रि केवल व्रत और अभिषेक का दिन नहीं है, बल्कि यह उस परम सत्य को समझने का दिन है जहाँ विष भी अमृत बन जाता है और मृत्यु का स्थान (श्मशान) भी शिव की उपस्थिति से मंगलकारी हो जाता है।

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