नक्सली संगठन को बड़ा झटका : महासचिव देवजी ने तेलंगाना पुलिस के सामने डाले हथियार

हैदराबाद (एजेंसी)। देश में नक्सलवाद के खिलाफ जारी निर्णायक जंग के बीच सुरक्षा बलों को एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक और संगठन के महासचिव थिप्पिरी तिरुपति उर्फ ‘देवजी’ ने अपने चार अन्य साथियों के साथ तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक (DGP) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है।
31 मार्च 2026 की समयसीमा से पहले इस सरेंडर को नक्सल मोर्चे पर अब तक की सबसे निर्णायक उपलब्धि माना जा रहा है।
कौन है थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी?
करीब 60 वर्षीय देवजी मूल रूप से तेलंगाना के करीमनगर जिले का रहने वाला है। वह पिछले कई दशकों से संगठन में सक्रिय था और अपनी तेज रणनीतिक सूझबूझ के लिए जाना जाता था।
सफर: इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति से जुड़ा और फिर भूमिगत हो गया।
कद: वह संगठन की मिलिट्री इंटेलिजेंस विंग का प्रमुख और पोलित ब्यूरो का सदस्य रहा।
जिम्मेदारी: मई 2025 में बसवराजु की मौत के बाद, सितंबर 2025 में उसे संगठन का महासचिव बनाया गया था।
इनाम: अलग-अलग राज्यों में उस पर 1 से 2 करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम इनाम घोषित था।
बड़े हमलों का मास्टरमाइंड
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, देवजी को देवअन्ना, चेतन और संजीव जैसे कई नामों से जाना जाता था। वह छत्तीसगढ़ के कुख्यात झीरम घाटी हमले समेत कई बड़े आईईडी (IED) धमाकों और एंबुश की योजना बनाने में शामिल रहा है। उसकी गिरफ्तारी या सरेंडर सुरक्षा बलों के लिए लंबे समय से प्राथमिकता थी।
ऑपरेशन “कगार” ने तोड़ी संगठन की कमर
इस सरेंडर के पीछे ‘ऑपरेशन कगार’ की अहम भूमिका मानी जा रही है। कर्रेगुट्टा क्षेत्र में चलाए गए इस कड़े प्रहार और निरंतर खुफिया अभियानों ने माओवादी नेतृत्व को चारों तरफ से घेर लिया था। दबाव इतना बढ़ गया कि संगठन के शीर्ष कमांडर के पास आत्मसमर्पण के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
“नक्सलवाद अब अपने अंत की ओर”
छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नक्सली आंदोलन अब पूरी तरह बिखर चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद अपने अंतिम दौर में है और सरकार की पुनर्वास नीति का असर जमीन पर दिख रहा है। उन्होंने अन्य नक्सलियों से भी हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौटने की अपील की है।
रणनीतिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि महासचिव स्तर के नेता का सरेंडर करना संगठन के निचले कैडरों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ देगा। इससे न केवल संगठन की सूचना प्रणाली ध्वस्त होगी, बल्कि आने वाले दिनों में और भी बड़े सरेंडर देखने को मिल सकते हैं।
















