मोदी बनाम ट्रंप : कार्यकाल की स्थिरता और भविष्य की अनिश्चितता पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

वाशिंगटन (एजेंसी)। वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप और भारत के प्रति सख्त व्यापारिक रुख के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर वैश्विक स्तर पर बहस छिड़ गई है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप द्वारा उठाए जा रहे आक्रामक कदमों से मिलने वाले लाभ क्षणिक हो सकते हैं। विशेष रूप से, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तुलना करते हुए विशेषज्ञों ने ‘नेतृत्व की निरंतरता’ पर सवाल उठाए हैं।
ट्रंप का सीमित कार्यकाल और नीतियों का संकट
प्रसिद्ध भू-राजनीतिक विशेषज्ञ इयान ब्रेमर ने अमेरिका के दीर्घकालिक फायदों पर संदेह जताया है। ब्रेमर के अनुसार, ट्रंप की वर्तमान रणनीतियों का प्रभाव उनके कार्यकाल के साथ ही समाप्त हो सकता है। उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
लोकप्रियता और स्थिरता: ब्रेमर का कहना है कि भारत में पीएम मोदी पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से सत्ता में हैं और एक लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर उनकी लोकप्रियता कायम है। इसके विपरीत, ट्रंप का कार्यकाल केवल तीन साल और शेष है।
नीतियों में बदलाव का डर: अमेरिका में हर चार साल में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना रहती है। ब्रेमर ने चेतावनी दी कि 2029 में ट्रंप के हटने के बाद, अगला राष्ट्रपति उनकी नीतियों को पूरी तरह पलट सकता है, जैसा कि खुद ट्रंप ने अपने पूर्ववर्तियों के फैसलों के साथ किया है।
अल्पकालिक लाभ: विशेषज्ञों का मानना है कि रूस, चीन और भारत जैसे देशों में नेतृत्व की जो निरंतरता है, वह अमेरिका में चुनावी चक्र के कारण संभव नहीं है।
वेनेजुएला और तेल बाजार की चुनौतियां
ट्रंप प्रशासन की वेनेजुएला नीति और तेल उत्पादन को लेकर भी ब्रेमर ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उनके अनुसार, वेनेजुएला के तेल भंडार का लाभ उठाना इतना सरल नहीं है:
उत्पादन में गिरावट: वेनेजुएला जो कभी प्रतिदिन 30 लाख बैरल तेल निकालता था, अब केवल 8 लाख बैरल पर सिमट गया है। इसे पुनः बहाल करने के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता की आवश्यकता है।
निवेशकों का भरोसा: तेल कंपनियों का निवेश चक्र किसी भी राष्ट्रपति के कार्यकाल से कहीं अधिक लंबा होता है। कंपनियां तभी निवेश करेंगी जब उन्हें यकीन हो कि ट्रंप के जाने के बाद भी वहां की राजनीतिक व्यवस्था स्थिर रहेगी।
बाजार की स्थिति: वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतें कम हैं, जो बड़े निवेश के लिए फिलहाल एक कठिन चुनौती पेश कर रही हैं।
निष्कर्ष: विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप भले ही वैश्विक स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनकी नीतियों की उम्र केवल 2029 तक सीमित दिखाई देती है, जबकि भारत जैसे देशों में नेतृत्व की स्थिरता उन्हें वैश्विक कूटनीति में अधिक मजबूत स्थिति प्रदान करती है।
















