अल-अक्सा मस्जिद पर पाबंदी : रमजान के बीच बढ़ता तनाव और मुस्लिम देशों की कड़ी प्रतिक्रिया

नई दिल्ली (एजेंसी)। मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच छिड़े संघर्ष के बीच, यरुशलम स्थित इस्लाम के तीसरे सबसे पवित्र स्थल, अल-अक्सा मस्जिद को लेकर विवाद गहरा गया है। इजरायल द्वारा पिछले 16 दिनों से मस्जिद के द्वार बंद रखे जाने और रमजान के पवित्र महीने में नमाज पर रोक लगाने से मुस्लिम जगत में भारी आक्रोश है।
अरब लीग और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कड़ा रुख
अरब लीग ने इजरायल के इस कदम को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया है। संगठन ने रविवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि इजरायल को किसी भी समुदाय को उनके धार्मिक स्थल पर इबादत करने से रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। लीग ने चेतावनी दी है कि इस तरह की पाबंदियां क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था बिगाड़ सकती हैं।
1967 के बाद की सबसे लंबी बंदी
28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य संघर्ष शुरू होने के बाद से ही इजरायल ने पूर्वी यरुशलम में सुरक्षा घेरा सख्त कर दिया है। बताया जा रहा है कि 1967 के युद्ध के बाद यह पहला मौका है जब रमजान के दौरान अल-अक्सा मस्जिद इतने लंबे समय तक बंद रही है। वहीं, वेस्ट बैंक की इब्राहीमी मस्जिद में भी नमाजियों की संख्या मात्र 50 तक सीमित कर दी गई है।
इजरायल का तर्क और मौजूदा स्थिति
इजरायली प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस बंदी को जायज ठहराया है। अधिकारियों का कहना है कि ईरान के साथ जारी युद्ध के कारण मिसाइल हमलों का खतरा बना हुआ है, जिसे देखते हुए भारी भीड़ को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।
दूसरी ओर, इस पाबंदी के कारण हजारों फिलिस्तीनी नागरिकों को मस्जिद के बाहर सड़कों और पुरानी दीवारों के पास नमाज अदा करनी पड़ रही है। रमजान के आखिरी दस दिनों (लैलतुल कद्र और इतिकाफ) में मस्जिद बंद होने से धार्मिक रीतियों में बड़ी बाधा आ रही है।
वैश्विक स्तर पर निंदा की लहर
इजरायल की इस कार्रवाई के खिलाफ मुस्लिम देशों ने एकजुट होकर आवाज उठाई है:
प्रमुख देश: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), तुर्की, कतर, जॉर्डन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और मिस्र जैसे देशों ने एक सुर में इस बंदी की आलोचना की है।
संगठन: इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC), मुस्लिम वर्ल्ड लीग और अफ्रीकी संघ ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है।
प्रतिक्रिया: हमास ने इसे बेहद आक्रामक कदम बताया है, जबकि फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने इसे एक ‘खतरनाक मिसाल’ करार दिया है।
















