श्री राम जन्मभूमि मंदिर : प्राचीन विरासत और आधुनिक विज्ञान का बेजोड़ मिलन

न्युज डेस्क (एजेंसी)। अयोध्या की पावन धरती पर निर्मित राम मंदिर मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के अटूट विश्वास और सदियों के धैर्य का जीवंत प्रमाण है। 22 जनवरी 2024 को हुई प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से यह मंदिर विश्वभर के श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। इस भव्य संरचना को पूर्ण करने में लगभग 4,000 कुशल कारीगरों और मज़दूरों ने पाँच वर्षों तक निरंतर परिश्रम किया है।
निर्माण में विज्ञान का योगदान
इस मंदिर की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए भारत के शीर्ष संस्थानों जैसे CBRI रुड़की, विभिन्न IITs और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिकों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका उद्देश्य मंदिर को प्राकृतिक आपदाओं और समय के प्रभाव से सुरक्षित रखना है।
वास्तुकला की विशेषताएँ और तकनीक
राम मंदिर का निर्माण पारंपरिक नागर शैली में किया गया है, जो उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की एक उत्कृष्ट विधा है।
इस निर्माण की सबसे विस्मयकारी बात यह है कि इतनी विशाल संरचना होने के बावजूद इसमें लोहे या स्टील का रत्ती भर भी उपयोग नहीं किया गया है। लोहे के बजाय यहाँ प्राचीन ‘इंटरलॉकिंग’ पद्धति और तांबे की प्लेटों का प्रयोग किया गया है, जो इसे सदियों तक जंग से सुरक्षित और अडिग रखेगा।
मंदिर के मुख्य आंकड़े:
भव्य ऊँचाई: तीन मंजिला यह मंदिर धरातल से 161 फीट ऊँचा है।
विशाल आकार: इसकी कुल लंबाई 360 फीट और चौड़ाई 235 फीट है।
मजबूत पत्थर: निर्माण के लिए राजस्थान के प्रसिद्ध बंसी पहाड़पुर के गुलाबी बलुआ पत्थरों का उपयोग हुआ है, जो अपनी सुंदरता और स्थायित्व के लिए जाने जाते हैं।










