आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को मिला ग्रैमी सम्मान : शांति और करुणा की गूंज अब संगीत जगत में

धर्मशाला (एजेंसी)। तिब्बती आध्यात्मिक गुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा ने अपने नाम एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। 90 वर्षीय दलाई लामा ने अपनी ऑडियोबुक के लिए प्रतिष्ठित ग्रैमी अवॉर्ड जीता है। उन्हें यह सम्मान ‘बेस्ट ऑडियोबुक, नरेशन और स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग’ की श्रेणी में दिया गया है।
इस पुरस्कार की दौड़ में उनके साथ ट्रेवर नोआ, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की जज केतनजी ब्राउन जैक्सन और अभिनेत्री कैथी गार्वर जैसे दिग्गज शामिल थे। दलाई लामा की अनुपस्थिति में रुफस वेनराइट ने उनकी ओर से यह पुरस्कार स्वीकार किया।
‘मेडिटेशन्स’ एल्बम की खासियत
दलाई लामा को यह सम्मान उनके एल्बम ‘मेडिटेशन्स: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा’ के लिए मिला है। इस एल्बम की विशेष बात यह है कि इसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत और आधुनिक सहयोग का एक अद्भुत मिश्रण है, जो सुनने वालों को शांति और एकाग्रता का अनुभव कराता है।
पुरस्कार मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए दलाई लामा ने कहा:
“मैं इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारी साझा वैश्विक जिम्मेदारी की पहचान मानता हूँ। शांति, दया और पर्यावरण की रक्षा ही मानवता को एकजुट रख सकती है।”
तिब्बत से भारत तक का सफर
14वें दलाई लामा, जिनका वास्तविक नाम तेनजिन ग्यात्सो है, का जीवन संघर्ष और सादगी की मिसाल रहा है।
ऐतिहासिक पलायन: 1959 में तिब्बत में चीनी दमन के दौरान वे भेस बदलकर भारत आए थे। 14 दिनों की कठिन यात्रा के बाद उन्होंने भारत में शरण ली थी।
भारत के सम्मानित अतिथि: पिछले 66 वर्षों से वे भारत सरकार के सबसे सम्मानित अतिथि के रूप में रह रहे हैं और यहाँ से अपनी संस्कृति और भाषा के संरक्षण का कार्य कर रहे हैं।
नालंदा विरासत: वे अक्सर कहते हैं कि उनकी शिक्षाएं भारत की प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी के विद्वानों की देन हैं।
नई किताब और संघर्ष की याद
हाल ही में दलाई लामा ने अपनी पुस्तक ‘इन वॉइस फॉर द वॉइसलेस’ भी जारी की है। इस किताब में उन्होंने चीन के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों और तिब्बत की आजादी के अनसुलझे संघर्ष पर प्रकाश डाला है। वे आज भी दुनिया को तिब्बती लोगों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों की याद दिलाते रहते हैं।
















