मध्यप्रदेश

उज्जैन का गौरव : काल गणना और आधुनिक विज्ञान के संगम से बनेगी नई ‘साइंस सिटी’

उज्जैन (एजेंसी)। मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन अब अपनी प्राचीन वैज्ञानिक पहचान को वैश्विक पटल पर नए सिरे से स्थापित करने जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ किया। इस अवसर पर उज्जैन को दुनिया की ‘काल गणना’ (Time Calculation) का केंद्र बनाने और इसे एक आधुनिक ‘विज्ञान नगरी’ के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया।

उज्जैन: शून्य देशांतर और ब्रह्मांड का केंद्र

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संबोधित करते हुए कहा कि उज्जैन सदियों से खगोल विज्ञान और गणित का वैश्विक केंद्र रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि:

प्राचीन मानक: ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) के अस्तित्व में आने से बहुत पहले, दुनिया की शून्य देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती थी।

भौगोलिक महत्व: कर्क रेखा और भूमध्य रेखा का मिलन बिंदु भी इसी क्षेत्र में स्थित है। वर्तमान में उज्जैन से 32 किमी दूर डोंगला को खगोलीय अध्ययन के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।

वैज्ञानिक विरासत: जब पश्चिमी दुनिया में खगोल शास्त्र का प्रारंभिक ज्ञान भी नहीं था, तब उज्जैन के ऋषि और ज्योतिषी ग्रहों की सटीक गणना कर रहे थे।

प्रमुख विकास कार्यों की सौगात

सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री ने उज्जैन के विकास के लिए 725 करोड़ रुपये के विभिन्न प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और लोकार्पण किया:

उज्जैन साइंस सेंटर: ₹15 करोड़ की लागत से निर्मित इस केंद्र में आधुनिक लैब, तारामंडल और विज्ञान पार्क बनाया गया है, जो छात्रों में वैज्ञानिक सोच विकसित करेगा।

सिंहस्थ 2028 की तैयारी: श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए ₹701 करोड़ की लागत से बनने वाले 19.80 किमी लंबे 4-लेन बायपास रोड का भूमि-पूजन किया गया।

हेरिटेज विस्तार: ‘सम्राट विक्रमादित्य द हेरिटेज’ इकाई के विस्तार के लिए ₹22.52 करोड़ की परियोजना की शुरुआत हुई।

महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) की ओर बढ़ते कदम

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण विचार रखा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब दुनिया को ‘ग्रीनविच मीन टाइम’ के बजाय ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ को मान्यता देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि:

भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय है।

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत छात्रों को रटने के बजाय क्रिटिकल थिंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़ा जा रहा है।

ज्ञान किसी एक भाषा का मोहताज नहीं है, इसलिए जटिल विज्ञान को भारतीय भाषाओं में सिखाने पर जोर दिया जा रहा है।

आकर्षण का केंद्र: रोबोटिक आर्म और नैनो सैटेलाइट

सम्मेलन के दौरान आयोजित प्रदर्शनी में प्राचीन परंपरा और आधुनिक तकनीक का मेल देखने को मिला:

प्रदर्शनी: इसरो (ISRO) और आईआईटी इंदौर जैसे संस्थानों ने मंगलयान, चंद्रयान और ड्रोन तकनीक के मॉडल प्रदर्शित किए।

नवाचार: मंदिर की आरती के लिए तैयार रोबोटिक आर्म ने सभी का ध्यान खींचा।

कार्यशाला: सैटेलाइट मेकिंग वर्कशॉप में 120 से अधिक छात्रों ने नैनो सैटेलाइट बनाने की बारीकियां सीखीं।

निष्कर्ष: विकसित भारत@2047 का लक्ष्य

नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी. के. सारस्वत और अन्य विशेषज्ञों ने कहा कि उज्जैन का यह प्रयास ‘विकसित भारत’ के सपने को सच करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य प्राचीन पंचांग पद्धतियों की सूक्ष्म त्रुटियों को आधुनिक विज्ञान की मदद से सुधारना और भारत को अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (Space Economy) में अग्रणी बनाना है।

विशेष नोट: इस आयोजन के माध्यम से वर्ष 2028 में होने वाले भव्य सिंहस्थ के लिए भी विश्वभर के श्रद्धालुओं और वैज्ञानिकों को आमंत्रित किया गया है।

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