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विकास और विश्वास की जीत, 22 नक्सलियों ने छोड़ा हिंसा का रास्ता

सुकमा। सुकमा जिले में नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत एक बड़ी सफलता हाथ लगी है, जहाँ माओवादी विचारधारा से जुड़े 22 सदस्यों ने एक साथ आत्मसमर्पण कर दिया। इन सभी ने पुलिस और प्रशासन के सामने हथियार डाल दिए हैं और अब वे एक सामान्य नागरिक के रूप में जीवन जीने का संकल्प ले चुके हैं।

आत्मसमर्पण के पीछे के मुख्य कारण

अधिकारियों के मुताबिक, नक्सलियों के इस हृदय परिवर्तन के पीछे तीन प्रमुख कारक रहे हैं:

पुनर्वास नीति का आकर्षण: सरकार की ‘पूना मारगेम’ (नयी सुबह) जैसी योजनाओं ने नक्सलियों को यह विश्वास दिलाया है कि मुख्यधारा में लौटने पर उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर जीवन की गारंटी मिलेगी।

तेजी से होता विकास: अंदरूनी इलाकों में सड़कों का जाल बिछने और बुनियादी सुविधाओं के पहुँचने से नक्सलियों का आधार कमजोर हुआ है।

सुरक्षा बलों का दबाव: जंगल के भीतर नए कैंपों की स्थापना और निरंतर सर्चिंग ऑपरेशनों के कारण माओवादी संगठन अलग-थलग पड़ गए हैं।

इन बलों की रही संयुक्त भूमिका

इस सफल आत्मसमर्पण अभियान में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों का साझा प्रयास रहा:

जिला पुलिस बल एवं DRG सुकमा

RFT जगदलपुर

CRPF की विभिन्न बटालियनें

अधिकारियों ने बताया कि आत्मसमर्पण करने वाले इन सदस्यों को शासन की नीति के अनुसार तत्काल सहायता और भविष्य के लिए कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।

शांति की ओर बढ़ता बस्तर

आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व माओवादियों ने स्वीकार किया कि वे अब हिंसा के निरर्थक रास्ते को छोड़कर क्षेत्र की शांति और प्रगति में अपना योगदान देना चाहते हैं। प्रशासन का मानना है कि इस तरह के कदमों से बस्तर क्षेत्र में शांति व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी।

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