गोविंद अटलपुरी (इंटरस्टेट यात्री भारत जोड़ो यात्रा) वरिष्ठ कांग्रेसी कार्यकर्ता, अटरू, जिला-बारा (राजस्थान)
शिक्षा के प्रति जागरूकता एवं पर्यावरण सुरक्षा के संकल्प के साथ 26 वर्षों से लगातार वृक्षारोपण करवा रहे हैं। सांसे हो रही है कम आओ वृक्ष लगाएं हम। उल्लेखनीय है कि गोविंद अटलपुरी ने वर्ष 1997 से ऐसे शुरू किया वृक्षारोपण अभियान जो आज भी अनवरत चालू है अब तक लगवा चुके हैं 7250 पौधे यह आज वृक्ष का रूप धारण कर चुके हैं।

शिक्षा ही वह सशक्त हथियार है जो हमें सामाजिक कुरीतियों अन्याय व शोषण से मुक्ति दिला सकती है। शिक्षा ही समाज में समानता ला सकती है जब मनुष्य शिक्षित हो जाता है तब उसमें विवेक और सोचने की शक्ति पैदा हो जाती है तब वह ने खुद अत्याचार सहन कर सकता है और नहीं दूसरों पर अत्याचार होते देख सकता है। #इसलिए चाहे से दो रोटी कम खाएं मगर बच्चों को जरूर पढ़ाएं।#। 26 वर्षों से इसी संदेश के साथ वृक्षारोपण करवाते आ रहे हैं गोविंद अटलपुरी। बात वर्ष 1997 की है जब देश के अंदर संपूर्ण साक्षरता का कार्यक्रम रूपी महायज्ञ चल रहा था,मैंने भी इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में अपनी आहुतियां देने के लिए अटरू के ही पास के एक छोटे से गांव ग्राम खेडलीबासला को पूर्ण साक्षर करने के लिए गोद लिया। प्रथम दिन जब मैं इस गांव के अंदर संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत कार्य करने के लिए लिए गया वहां पर मैंने लोगों से इस कार्यक्रम के संबंध में बातचीत की तो लोगों का उत्तर नकारात्मक रहा। वहां पर वंचित वर्ग के लोगों की बस्ती में जब मैंने इस कार्यक्रम के बारे में चर्चा की तो मुझे वहां पर लोगों ने अपनी भाषा में बताया कि आप यहां पर यूं ही माता खपाने आए हो यह मजदूर लोग इनकी बस्ती का हैंडपंप खराब हो जाता है, तो उस हैंडपंप की रोड को भी यह हैंड पंप सुधारने आने वाले मिस्त्री से बाहर निकलवाने में मदद नहीं करते हैं। यह कहते हैं कि आप लोगों को इस काम को करने का सरकार से पैसा मिल रहा है। हम फ्री में मजदूरी क्यों करें। इस तरह की तमाम बातें सुनने के बाद भी मैं अपने लक्ष्य से जरा भी विचलित नहीं हुआ। मैंने वहां के जनप्रतिनिधियों को मेरे इस कार्यक्रम से जोड़ने के लिए वहां के तत्कालीन सरपंच श्री प्रहलाद मीणा जी से चुना और नील खरीदने के लिए ₹100 लिए, गरीब बस्ती के लोगों को इस कार्यक्रम से जोड़ने के लिए मैंने एक महिला से मटके में पानी मंगवाया,मैं शाम को उस चुने को पानी से भरे उस मटके में गला करके आ गया। अगले ही दिन गांव की उस बस्ती में जाकर के मकानों की दीवारों की पुताई करने लगा ,यह देखकर वहां के वाशिंदे सोचने सोच में पड़ गए मैंने दिन भर दीवारों की पुताई कड़कड़ाती धूप में दिनभर दीवारों की पुताई करके जब शाम को बस्ती के बाशिंदों की मीटिंग ली शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रम की बातें की तो, फिर मुझे यही उत्तर मिला कि आप यहां पर माथा खपाने व्यर्थ में ही आए हो।फिर मैं अगले दिन सवेरे ही इस गांव में चला गया दिनभर दीवारों की पुताई की शाम को फिर मैंने बस्ती के बाशिंदों की मीटिंग ली शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रम के महत्व को समझाया तो फिर मुझे पुनः वही जवाब दिया गया कि आप यहां व्यर्थ ही परेशान हो रहे हो। आपको इस काम को करने के लिए सरकार पैसा दे रही है इसलिए आप यहां पर इतनी माता पच्छी कर रहे हो। तीसरे दिन भी मैंने यही क्रम जारी रखा उस दिन कालू लाल मेघवाल नाम का लड़का बुखार में होते हुए भी उसने मेरी मदद की उसकी भावनाएं मेरे प्रति जागृत हूं मैं इस एक व्यक्ति का सहयोग पाकर प्रफुल्लित हो गया।अगले दिन शाम को मैंने फिर सभी की मीटिंग ली अब बस्ती के लोगों के ऊपर मेरी बात का असर होने लग गया था। चौथे दिन मुझसे बस्ती के कुछ लोग और जुड़े उन्होंने मेरी मदद की शाम को फिर मैंने उनकी मीटिंग ली शिक्षा का महत्व समझाया।
मेरे इस तरह से प्रयत्नशील रहने का शायद बस्ती के कुछ लोगों को अच्छा नहीं लग रहा था। मैं जब पांचवें दिन गया तो एकअज्ञानी व्यक्ति मुझसे अनाया से झगड़ा करने लगा और यहां तक कि मेरे ऊपर लाठी तक भी उठा ली और बस्ती से चले जाने के लिए कहा वहां के लोगों ने बीच बचाव किया। 3 दिन पकड़ी दुपहरी में बस्ती के कच्चे घरों व गांव के पक्के मकानों की लगभग 60 दीवारों की पुताई करने के बाद साक्षरता कार्यक्रम व शिक्षा के महत्व समझाने से संबंधित नारा लेखन का कार्य किया।
शाम को फिर बस्ती वासियों को फिर मीटिंग लेकर के शिक्षा के महत्व को समझाया। चार-पांच दिन तक यह क्रम चलता रहा। शिक्षा व गांव के विकास के प्रति मेरी सकारात्मक सोच और कार्यशैली को देखकर इस बस्ती के लोग मुझसे जुड़ने लगे। धीरे-धीरे बस्ती के लोग, गांव के नवयुवक गांव ,गांव का बच्चा, बूढ़ा,जवान सभी मेरे कार्यक्रम से जुड़ते चले गए। गांव के पुजारी जी की अध्यक्षता में साक्षरता समिति का गठन किया गया। गांव मैं वहां के लोगों के आशीर्वाद से युवकों के सहयोग से प्रारंभ 9 साक्षरता केंद्र वास्तविक रूप में प्रारंभ हुए। इनमें गांव के निरक्षर लोगों ने अक्षर ज्ञान सीखने का बढ़-चढ़कर भाग लेकर लाभ उठाया , गांव के युवाओं ने भी भरपूर उनको सिखाने में मदद की। कुछ लोगों को साक्षरता केंद्र चलते हुए पसंद नहीं आए तो उन्होंने शाम पड़ते ही गांव में चोर आने का हल्ला करते हुए माहौल खराब करने की कोशिश की परंतु मैं गांव को पूर्ण साक्षर करने के अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं हुआ और सफलता हासिल की। मेरे द्वारा किए गए कार्य को इस गांव में चिरस्थाई बनाने के लिए पर्यावरण का महत्व बताते हुए मैंने यहां पर दो चरणों में गांव वासियों के घर के आंगन खेत खलियान व सार्वजनिक स्थानों पर वृक्षारोपण करवाया प्रथम चरण में बच्चों हुए वृद्धों से फलदार पौधे लगवाए द्वितीय चरण में युवाओं में जवानों से छायादार पौधे लगवाए। बस्ती वासी गांव वासियों को मैंने समझाया कि जब आपपौधे में पानी डालोगे पौधा घर के आंगन में नजर आएगा तो मेरी बातें मेरे कार्य आपको याद आएंगे। पौधे जब बड़े होंगे यह आपको फल देंगे छाया देंगे तो तब भी मेरी बातें मेरे द्वारा किए गए कार्य आपको हमेशा याद आएंगे। यानी कि गांव के अंदर शिक्षा के महत्व का प्रचार प्रसार आजीवन मेरे माध्यम से जुड़ा रहेगा। J
बाद में मैंने तीन- चार बार और इस गांव के अंदर वृक्षारोपण का कार्य करवाया। आज इस गांव के अंदर यहां के गांव वासियों के सहयोग से मेरे द्वारा लगाए गए सैकड़ों पौधे वृक्ष का रूप धारण कर चुके हैं। मैंने जब इस गांव के अंदर साक्षरता कार्यक्रम के तहत किए गए कार्य की सफलता की सूचना तत्कालीन 12 जिला कलेक्टर श्री जेपी विमल जी को दी वह इस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए।उन्होंने इस गांव में मेरे द्वारा किए गए कार्यों का अवलोकन करने के लिए 4 सदस्य एक टीम भेजी। इस टीम में उप जिला कलेक्टर छबड़ा , जिला शिक्षा अधिकारी बारां, जिला साक्षरता अधिकारी बारां, तहसीलदार साहब अटरू थे। टीम के द्वारा गांव में मेरे द्वारा किए गए कार्यों का अवलोकन करने के बाद बनाई गई रिपोर्ट आपके सामने है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों से साफ है कि यदि व्यक्ति सकारात्मक सोच रखते हुए लोगों के बीच कार्य की पारदर्शिता के साथ मेहनत और लगन से कार्य करता है तो लोग उससे जुड़ते चले जाते हैं। शिक्षा के महत्व का प्रचार प्रसार व पर्यावरण सुरक्षा हेतु वृक्षारोपण का कार्य अनवरत जारी है। अतुल पुरी वर्ष 1997 से ही अपने खर्च पर ही बारा, सालपुरा, छिपाबड़ोद ,छाबड़ा अटरू की आस पास की नर्सरी ओं से प्रतिवर्ष बारिश के सीजन में पौधे लाते हैं और क्षेत्रीय लोगों से उन पौधों को उनके खेत, खलियान व घर के आंगन में लगाते हैं अटलपुरी अब तक लगभग 7250 पौधे स्वयं के खर्चे से लाकर लगवा चुके हैं। इस अभियान में जहां आवश्यकता होती है वहां स्वयं के खर्चे पर ट्री गार्ड भी लग जाते हैं। जो आज वृक्ष का रूप धारण कर चुके हैं । *गोविंद अटलपुरी(इंटरेस्टेड यात्री भारत जोड़ो यात्रा) वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ता ,अटरू, जिला-बारा( राजस्थान)**
















