25 हजार से ज्यादा बुजुर्गों और युवाओं ने दी उल्लास महापरीक्षा, सरेंडर नक्सली भी हुए शामिल

बस्तर। बस्तर अब केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता या भौगोलिक बनावट के लिए ही नहीं जाना जा रहा है, बल्कि अब यह क्षेत्र शिक्षा के प्रति अपने नए उत्साह और संकल्प के लिए भी चर्चा में है। कभी जिस बस्तर में अशिक्षा एक बड़ी बाधा मानी जाती थी, वहाँ के लोग अब कलम के सहारे अपना भविष्य संवारने के लिए तैयार हैं। ‘उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम’ के तहत आयोजित हालिया महापरीक्षा ने इस बदलाव को एक नई दिशा दी है।
साक्षरता की ओर बढ़ते 25 हजार से अधिक कदम
सीखने की कोई उम्र नहीं होती, इसे बस्तर के 25,706 लोगों ने सही साबित कर दिखाया है। जिले भर में बनाए गए 812 परीक्षा केंद्रों पर युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक ने इस परीक्षा में भाग लिया। यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन लोगों की उम्मीदों की कहानी है जो किन्हीं कारणों से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा के अनुसार, सरकार और समाज के सामूहिक प्रयासों से बस्तर की साक्षरता दर में उल्लेखनीय सुधार हो रहा है, जो 2011 की जनगणना (57%) की तुलना में कहीं बेहतर है।
मुख्यधारा में जुड़ते लोग: कैदी और पूर्व नक्सली भी बने परीक्षार्थी
इस महापरीक्षा की एक अनूठी बात इसकी समावेशिता रही। जगदलपुर केंद्रीय कारागार में बंद 94 पुरुष और 47 महिला कैदियों ने इसमें उत्साहपूर्वक भाग लिया। इसके अतिरिक्त, मुख्यधारा में लौटने वाले 28 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने भी परीक्षा देकर एक नई शुरुआत की है।
ये दृश्य स्पष्ट करते हैं कि बस्तर में अब हिंसा और बंदूक के स्थान पर कलम और किताबों का महत्व बढ़ रहा है। शिक्षा न केवल एक अधिकार बनकर उभरी है, बल्कि आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम भी बनी है। साक्षरता की यह लहर इस बात का प्रमाण है कि जब समाज का हर व्यक्ति शिक्षित होने का संकल्प लेता है, तो विकास का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त हो जाता है।
















