कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद भी भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं हो रहे कम? समझें मुख्य कारण

नई दिल्ली (एजेंसी)। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई भारी गिरावट के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की महंगाई से राहत नहीं मिल पा रही है। जहाँ वैश्विक स्तर पर ब्रेंट क्रूड के दाम युद्ध के समय के अपने उच्चतम स्तर $126 प्रति बैरल से गिरकर अब लगभग $73 प्रति बैरल पर आ चुके हैं, वहीं भारत में घरेलू ईंधन की कीमतें जस की तस बनी हुई हैं।
पड़ोसी देशों में घटे दाम, भारत में स्थिति स्थिर
वैश्विक मंदी का असर भारत के पड़ोसी देशों में साफ़ देखा जा रहा है, जहाँ ईंधन की खुदरा कीमतों में कटौती की गई है:
पाकिस्तान: यहाँ पेट्रोल की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है, जिससे दाम लगभग ₹130 से घटकर ₹101 प्रति लीटर के स्तर पर आ गए हैं। (इसकी तुलना में भारत में औसत कीमत अभी भी करीब ₹108 प्रति लीटर बनी हुई है)।
अन्य देश: भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों ने भी हाल के दिनों में अपने यहाँ पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम किया है।
भारत में कीमतें न घटने के 3 प्रमुख कारण
विशेषज्ञों और तेल क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, भारतीय बाजार में दाम स्थिर रहने के पीछे निम्नलिखित मुख्य वजहें हैं:
- पुराने घाटे की भरपाई (Under-Recoveries)
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने आम जनता को राहत देने के लिए लंबे समय तक घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इस वजह से कंपनियों को लगभग ₹1 लाख करोड़ का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। अब कच्चे तेल के सस्ते होने पर कंपनियां सबसे पहले अपने उसी पुराने घाटे को पूरा कर रही हैं।
- रिकवरी के लिए समय की जरूरत
जानकारों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा निचले स्तर पर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों को अपने पुराने नुकसान से उबरने में कम से कम 2 से 3 महीने का समय और लग सकता है। इस घाटे की पूरी भरपाई होने के बाद ही भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम घटने की उम्मीद की जा सकती है।
- टैक्स ढांचा और सरकारी नीतियां
ईंधन की कीमतों में टैक्स की भी बड़ी भूमिका होती है। हालांकि, सरकार ने पिछले समय में एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) में ₹10 प्रति लीटर तक की कटौती की थी जिससे राजस्व (Revenue) पर असर पड़ा था। इसके अलावा, चुनावी दौर में कीमतों को स्थिर रखने की रणनीति और सरकारी टैक्स नीतियों के कारण भी अंतरराष्ट्रीय बदलावों का असर तुरंत घरेलू खुदरा कीमतों पर दिखाई नहीं देता।
















