छत्तीसगढ़ में लावारिस पशुओं का आतंक : विधानसभा में सरकार ने कहा, “फिलहाल कोई नई योजना नहीं”

रायपुर। छत्तीसगढ़ की सड़कों पर घूमते आवारा मवेशी आम जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन चुके हैं। इनसे न सिर्फ सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, बल्कि किसानों की फसलों को भी भारी नुकसान हो रहा है। यह गंभीर मामला हाल ही में विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान गूंजा। भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने सदन में बेसहारा पशुओं के स्थाई समाधान को लेकर सरकार को घेरा। इस पर राज्य सरकार ने साफ कर दिया कि फिलहाल आवारा जानवरों की समस्या से निपटने के लिए किसी भी नई योजना पर काम नहीं किया जा रहा है।
सदन में जानकारी देते हुए आदिम जाति विकास एवं किसान कल्याण मंत्री रामविचार नेताम ने बताया कि प्रदेश में 6 अगस्त 2025 से ‘गोधन योजना’ के अंतर्गत पंजीकृत गौशालाएं चलाई जा रही हैं। इसके साथ ही मनरेगा के तहत नंदीशालाओं को बनाने का प्रावधान तो है, लेकिन इनके निर्माण के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।
बिलासपुर में व्यवस्था ठप: कागजों पर ‘ऑल वेल’, जमीन पर शून्य कंजी हाउस
विधायक सुशांत शुक्ला ने बिलासपुर जिले का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए वहां संचालित कंजी हाउस, गौशालाओं और गौठानों का ब्यौरा मांगा था। उन्होंने साल 2023 से जून 2026 के बीच चारे-पानी की कमी से दम तोड़ने वाले मवेशियों का आंकड़ा भी पूछा।
सरकार द्वारा दिए गए लिखित जवाब के अनुसार, बिलासपुर जिले में इस वक्त एक भी कंजी हाउस सक्रिय नहीं है। पूरे जिले में महज 6 पंजीकृत गौशालाएं और सिर्फ 2 गौठान ही चल रहे हैं। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड का दावा है कि पिछले तीन सालों (2023 से जून 2026) में भूख या प्यास के कारण किसी भी पशु की मौत नहीं हुई है।
ब्लॉकवार जमीनी हकीकत: कोटा ब्लॉक में शून्य व्यवस्था
सदन में पेश की गई ब्लॉकवार रिपोर्ट से साफ है कि मवेशियों के प्रबंधन को लेकर प्रशासन कितना उदासीन है:
बिल्हा ब्लॉक: यहाँ मंगला और सिरगिट्टी में दो शहरी गौठान हैं। इसके अलावा बोड़ी और पौंड़ी में तीन गौशालाएं (जय गुरुदेव, हरी और कृष्ण) चल रही हैं, जबकि हरदी कला में कोई इंतजाम नहीं है।
मस्तूरी ब्लॉक: यहाँ तरौद में ‘मां मुण्डेश्वरी’ और ओखर में ‘वासुदेव’ गौशाला संचालित है। कनकपुर खपरा और जोंधरा जैसे इलाके पूरी तरह खाली हैं।
तखतपुर ब्लॉक: इस क्षेत्र में केवल लाखासार स्थित ‘कामधेनु गौशाला’ एक्टिव है।
कोटा ब्लॉक: यहाँ स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पूरे ब्लॉक में न तो कोई कंजी हाउस है, न कोई गौठान और न ही एक भी पंजीकृत गौशाला मौजूद है।
निष्कर्ष: विधानसभा में इस मुद्दे के उठने के बाद अब राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक तरफ जहां जनता और किसान आवारा पशुओं से त्रस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार की तरफ से किसी ठोस या नए नीतिगत फैसले का न होना चिंता का विषय है।
















