महतारी वंदन योजना का संबल : दीपावली के लिए मिट्टी के दीये गढ़ आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहीं माधुरी

रायपुर। त्योहारों का असली आनंद तब दोगुना हो जाता है जब कड़ी मेहनत के साथ आत्मनिर्भरता का संबल भी जुड़ जाए। बलौदाबाजार के वार्ड क्रमांक 18 में रहने वाली श्रीमती माधुरी पांडे के लिए इस बार की दीपावली कुछ ऐसी ही खास और उत्साह से भरी है। वह अपने हुनर के दम पर मिट्टी के दीये तैयार कर रही हैं, और उनके इस पारंपरिक कुम्हारी कार्य को ‘महतारी वंदन योजना’ से मिल रही आर्थिक मदद ने एक नया संबल दिया है।
पारंपरिक हुनर और बढ़ता आत्मविश्वास
विवाह के बाद से ही माधुरी पांडे अपने पति हरिकिशन पांडे के साथ मिलकर कुम्हारी के पारंपरिक कार्य में हाथ बंटाती आ रही हैं। मिट्टी को संवारकर कलात्मक और उपयोगी वस्तुएं बनाना उनके परिवार की पुश्तैनी पहचान है। हालांकि, पहले अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता था, और सीमित संसाधनों के कारण अपनी इच्छाओं को पूरा करना मुश्किल होता था।
महतारी वंदन योजना से मिला सहारा
छत्तीसगढ़ सरकार की महतारी वंदन योजना के तहत हर महीने मिलने वाली एक हजार रुपये की सहायता राशि ने अब उनकी इन मुश्किलों को आसान कर दिया है। यह मदद केवल वित्तीय रूप से ही नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और खुद के फैसले खुद लेने के हौसले को भी मजबूत कर रही है। अब वह अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और त्योहारों के खर्चों के लिए किसी पर आश्रित नहीं हैं।
लोक परंपराओं को सहेजने का जज्बा
दीपावली नजदीक आते ही माधुरी मिट्टी के दीये बनाने के काम में पूरी शिद्दत से जुट गई हैं। इससे पहले वह पोरा पर्व के अवसर पर पारंपरिक मिट्टी के बैल और जाता भी तैयार कर चुकी हैं। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी इन कलाकृतियों के जरिए वह न केवल अपने पारिवारिक व्यवसाय को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि अपनी कला को भी जीवित रखे हुए हैं।
योजना के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए माधुरी कहती हैं कि इस नियमित सहायता ने उनके जीवन को काफी आसान बना दिया है। दीयों को आकार देते उनके हाथों की यह मेहनत इस बात का प्रमाण है कि सही सहयोग और हौसला मिलने पर महिलाएं कैसे अपने दम पर आत्मनिर्भरता और परंपरा का अनूठा संगम तैयार कर सकती हैं।
















